मनुआ - 56
मैं और मनुआ 5 अप्रैल को दिल्ली में होने वाली मजदूर- किसान संघर्ष रैली में जाने की योजना ही बना रहे थे कि पांडे आ टपका.
" कहाँ जाने का पिलान बन रहा है भाई ? "
" दिल्ली जाने का...... आप भी साथ देंगे का ? ", मनुआ ने हंसते हुए कहा.
" दिल्ली...! उहां का हो रहा है? "
" मजदूर - किसान संघर्ष रैली , भइया ! "
" रैली... ! अरे, काहे दीवार पर माथा पटकते रहते हो तुमलोग ? इस सरकार का कुछ नहीं बिगाड़ पाओगे . समझे ? "
"क्यों भइया.....? "
" क्योंकि इसका सुरक्षा कवच बहुत ही तगड़ा है. उस पर तुम चाहे महंगाई का तीर चलाओ या बेरोजगारी का, भ्रष्टाचार का चलाओ या शिक्षा में व्यापार का, किसानों की एमएसपी का चलाओ या मजदूरों के चार लेबर कोड का. सब के सब व्यर्थ साबित होंगे. "
" ई बात ! आखिर वह कौन सा सुरक्षा कवच है पांडे भइया ? "
" वह सुरक्षा कवच है....... सर्वशक्तिमान धर्म का. देश की धर्म परायण जनता के मस्तिष्क में अभी धर्म की आंधी चल रही है, वह धर्म से आगे कुछ भी नहीं सोच रही है ", कहकर पांडे ने जोर का ठहाका लगाया.
" ऐसा नहीं है भइया ! पेट का सवाल सबसे बड़ा सवाल होता है. कहते हैं न कि ... भूखे भजन न होत गोपाला. ", मनुआ ने तर्क दिया.
" दूर बुड़बक ! तुम यह क्यों भूल रहे हो कि मोदीजी ने सभी के पेट में अनाज पहुंचाने का काम किया है. उनकी सरकार द्वारा 80 करोड़ लोगों को फ्री राशन दिया जा रहा है. उज्ज्वला योजना में फ्री गैस सिलिंडर , रोग दिखाने के लिए आयुष्मान कार्ड..... गर्भवती महिलाओं को .... "
" बस करो भइया! जनता को मूर्ख समझने की भूल मत करो. उन्हें मालूम हो चुका है कि यह सरकार एक हाथ से जनता को लूट रही है और दूसरे हाथ से सदाबरत बांट रही है . साढ़े चार सौ का गैस सिलेंडर साढ़े ग्यारह सौ का हो गया.... पेट्रोल - डीजल - किरासन तेल का दाम दुगुना हो गया , फल, तेल और दाल आम लोगों की पहुँच से बाहर हो रहे हैं, अभी कल ही सरकार ने जरूरी दवाइयों की कीमतों में 11 - 12 ℅ की बढ़ोतरी की है....."
" भोंभा लगाकर ई कुल बजाते रहो, जनता पर इसका कोई असर नहीं होने वाला. न विश्वास है तो जाकर देख लो बाजार में, रामनवमी का कितना विशाल जुलूस निकला है. पूरा शहर भगवा रंग में रंगाया हुआ है. नौजवानों की फौज " जय श्री राम " का जयघोष कर रही है, गजब के उत्साह और उल्लास का वातावरण है....", पांडे ने ललकारते हुए कहा.
" धार्मिक आयोजनों में लोगों का शामिल होना, कोई नई बात नहीं है भइया ! पर्व - त्योहार पर उल्लसित होना, खुशियाँ मनाना तो आम बात है. किंतु, इससे रोजीरोटी का सवाल हल नहीं हो जाएगा, महंगाई की मार कम नहीं हो जाएगी, शिक्षा की बदइंतज़ामी दुरुस्त नहीं हो जाएगी. गरीबों के बच्चों के लिए उच्च शिक्षा और नौकरी के दरवाजे किस तरह धीरे धीरे बंद किये जा रहे हैं, अब यह सबको पता है..... "
" दूर बुड़बक ! जब देखो लगता है भाषण देने. अरे, यदि जनता को इन सब चीजों की परवाह होती तो वह सड़क पर नहीं उतर जाती , सरकार का कामकाज नहीं ठप्प कर देती. लेकिन, वह तो इस सरकार से पूरी तरह संतुष्ट है.... "
" ऐसा नहीं है भइया ! शुतुरमुर्ग मत बनिए. अभी साल भर पहले ही तो जनशक्ति ने इस सरकार को झुकाया है. तीनों कृषि कानून रद्द करने पड़े और एमएसपी के लिए एक कमिटी बनानी पड़ी. हलांकि, किसानों की मांगें अब भी पूरी नहीं हुई हैं और जल्द ही उनका विशाल आंदोलन शुरू होने वाला है. 5 अप्रैल की रैली भी उन्हीं सारी मांगों को लेकर हो रही है. लीजिए, इस पर्चे में सारी मांगें दर्ज हैं. ", मनुआ एक पर्चा पांडे की ओर बढ़ाता है.
" अरे, रखो ई अपना अर्चा - पर्चा ! तुमलोगों का नाटक जनता खूब बढ़िया से समझ गई है . चाहे जितनी जोर लगा लो, यह सरकार हिलने वाली नहीं है. अंगद का पांव है. क्या समझे....? ", कहते हुए पांडे उठा और चल दिया . हम अपनी योजना बनाने में जुट गए.
मार्क्सवादी राजनैतिक अर्थशास्त्र! सवाल ये उठता है कि मार्क्सवादी राजनैतिक अर्थशास्त्र ही क्यूँ? जवाब है कि मार्क्सवादी राजनैतिक अर्थशास्त्र हमें पूँजीवादी व्यवस्था का शोषण, विकास और उसके संकट को समझने में मदद करता है। यह समाज के आर्थिक आधार का अध्ययन करता है और इसीलिए उनके लिए ज़रूरी है जो सामाजिक बदलाव के लिए संघर्ष करते हैं। बुर्ज़ुआ अर्थशास्त्र, जो कि हमारे विश्वविद्यालयों में पढ़ाया जाता है, की तरह मार्क्सवादी अर्थशास्त्र ये दिखावा नहीं करता कि वह सभी सामाजिक व्यवस्थाओं की विश्वव्यापी आर्थिक नियमों की खोज करने की कोशिश करता है। मार्क्सवादी विश्लेषण के अनुसार हर उत्पादन के तरीक़े का अपना विशिष्ट नियम होता है। इसी कारण मार्क्सवादी विश्लेषण के इस विज्ञान को हम राजनैतिक अर्थशास्त्र कहते हैं। इस विषय पर मार्क्स से लेकर लेनिन ने बहुत कुछ लिखा है परंतु हम आसान तरीक़े से राजनैतिक अर्थशास्त्र के निम्नलिखित चार सवालों तक ही खुद को सीमित रखेंगे - 1. पूंजीवादी अर्थव्यव्स्था वह उत्पादन का तरीक़ा है जहां पूँजीपति वर्ग उत्पादन के साधनों के मालिक होते हैं वो उत्पादन के लिए म...
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