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मनुआ - 65

मनुआ - 65 मनुआ --" ई तो गजबे हो गया, भइया! " पांडे -- " अइसा का हुआ, मनुआ  ! " मनुआ -- " मोदीजी को उनके ही भक्त उनकी जाति का नाम ले - लेके सड़कों पर गरिया रहे हैं। इतना ही नहीं, जेएनयू में जो नारा इनके विरोधियों ने लगाया था-- मोदी तेरी कब्र खुदेगी........, वही नारा ये लोग भी लगा रहे हैं। " पांडे -- " देखो भाई  ! तुमको तो मालूम है कि जब भक्त का दिल टूटता है तो वह अपने भगवान को भी नहीं छोड़ता, जली - कटी सुना ही देता है। बाकी सनातन धर्म में फूट पड़ना समाज के लिए अच्छा नहीं है।  तभी मनुआ को किसी ने फोन किया। मनुआ ने फोन बंद करते हुए कहा --" लो पांडे भइया, सुप्रीम कोर्ट ने तुम्हारी सुन ली  । " " अब क्या हुआ, मनुआ  ? " " उच्चतम न्यायालय का हथौड़ा यूजीसी के ऊपर पड़ गया। उसने उन नियमों पर रोक लगा दी । " " ईश्वर को लाख - लाख शुक्रिया......! " " ईश्वर को नहीं, भइया! जस्टिस सूर्यकांत को शुक्रिया बोलो और बोलो शुक्रिया इस सरकार को । वाह ! मोदीजी वाह  ! क्या खेल खेला है! चित्त भी तेरी और पट भी तेरी। मरते रहें रोहित वेमुल...
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मनुआ - 64

मनुआ - 64   12 फरवरी, 26 को चार लेबर कोड के खिलाफ आहूत अखिल भारतीय हड़ताल को सफल बनाने के लिए हुई गेट मीटिंग से लौटकर मनुआ अभी घर के दरवाजे पर पहुंचा ही था कि पांडे सामने से आते दिखा। पास आते ही मनुआ ने चुटकी ली --- " पुतला दहन करके आ रहे हैं का, पांडे भइया  ? " " पुतला दहन...? कइसा पुतला दहन..? ई सब काम तो तुमलोगों का है...लेकिन ई सरकार पीछे हटने वाली न है बबुआ , लेबर कोड तो लागू होके ही रहेगा " --- पांडे ने हंसते हुए कहा।  " ई लो....शहर के बीचोबीच चौराहे पर चार - चार मंत्री लोग का पुतला दहन हुआ और इनको कुछ....। " " कवन मंत्री लोग का...? हमको सच्चे न मालूम है, मनुआ  ! " " आपके प्रिय प्रधानमंत्री, गृहमंत्री, कानून मंत्री और शिक्षा मंत्री का...। " " अच्छा...! अइसा कौन बेवकूफ लोग कर रहा है...? " " खांटी मोदी भक्त .... हाँ भइया! खांटी भक्त और सनातनी लोग ...! " -- मनुआ ने मजाक के लहजे में मुस्कुराते हुए जवाब दिया।  पांडे को उसकी बातों पर विश्वास न हो रहा था । भला मोदी भक्त मोदी जी का पुतला जलायेंगे ! मनुआ का कटाक्ष उसके ...

ठगवा

ठगवा फिर दुअरा पर आयल वादा करके खुब भरमयलक पाँच बरिस पर मुँह देखयलक हाथ जोड़ के दाँत निपोरित तनिको न शरमायल ठगवा फिर................. जे कहलक से कुछ न कयलक चढ़ सिंघासन पलटी खयलक पूंजी के गोदी मे बइठल हमनी के लुलुआयल ठगवा फिर.................... चलके हमनी पैदल अइली राह में कतने लाठी खइली भुखले रखलक कोरंटिन में सबहिन के ढनकायल ठगवा फिर .................... जाति-धरम में खुब उलझयलक बस्ती में दंगा करवयलक भाई भाई में लड़वा के सगरे आग लगायल ठगवा फिर..................... देखली ओकर चौकीदारी हो गेल रेहन खेती - बारी चूल्हा में पानी पड़ गेलक नोकरी ला तड़पायल ठगवा फिर....................

पहचान की राजनीति

## पहचान की राजनीति बनाम वर्गाधारित राजनीति। ## पहचान की राजनीति का मतलब क्या है ? उत्तर आधुनिकता की ही तरह पूंजीवादी सिद्धांतों से निकली पहचान की राजनीति मार्क्सवाद का विकल्प होने का दावा करती है। यह मानती है कि राजनीति और भौतिक परिस्थितियों के बीच कोई रिश्ता नहीं होता। यह एक ऐसे समाज की परिकल्पना करती है जो तमाम तरह के शोषण और आपसी शत्रुता पर टिका है। इसमें यह सोच निहित है कि जातीयता, धर्म, नस्ल या लैंगिकता आदि से जुड़े शोषण व आपसी शत्रुता का भौतिक परिस्थितियों से कोई रिश्ता नहीं होता। यह पूरी तरह से व्यक्तिगत तौर पर महसूस किया जाता है। पहचान एक व्यक्ति द्वारा उसके उत्पीड़न के अनुभव के आधार पर बनती है और पूरी तरह से आत्मपरक और स्वायत्त होती है।  यह किसी भी समाज के वर्ग विभाजन पर आधारित विश्लेषण को अस्वीकार करता है। पहचान की राजनीति के अनुसार समाज में मुख्य विभाजन है -- व्यक्तिगत रूप से उत्पीड़न सहन करने वालों और बाकि सभी उनलोगों के बीच जिन्होंने उत्पीड़न का अनुभव नहीं किया है। उदाहरण के लिए पहचान की राजनीति के सिद्धांतों के अनुसार जातिगत उत्पीड़न का अनुभव करने वाला एक दलित मजदूर...

मकान और घर

मकान और घर एक मकान वह था  जहाँ मेरा बचपन बीता   अभाव ही अभाव था  गरीबी थी  मुफलिसी थी भूख थी  पर, रोटी नहीं नींद थी पर, बिस्तर नहीं दीवार में दरार थे पर दिलों में प्यार था सद्भाव था  सहयोग था साझा सपने थे साझा प्रयास था चैन था, सुकून था वह मकान नहीं हमारा घर था. दूसरा मकान  जहाँ रहता हूँ अब मजबूत दीवारें लोहे का बड़ा फाटक गैरज में लाखों की गाड़ी सोफे, कुर्सियां, खाने का मेज बड़ी - बड़ी आलमारियां जरूरत की सारी चीजों से भरी हुईं आधुनिक कीचन तरह - तरह के व्यंजन पर, भूख नहीं  गद्देदार बिस्तर पर, नींद नहीं बिखरे हुए सपने टूटे हुए अरमान चारो ओर खालीपन दूर तक पसरा सन्नाटा जीवन बोझ सा लगता है यह मकान बड़ा भले ही है अपना घर नहीं लगता है .

मार्क्सवादी राजनीतिक अर्थशास्त्र

एक सदी पहले लेनिन ने वित्तीय पूँजी की बात की थी कि कैसे वो बैंक और इंडस्ट्रीयल पूँजी का गठजोड़ है, एक कुलीन तंत्र इस पूँजी का मालिक है और वही लोग बैंक तथा इंडस्ट्री के निर्देशकों के बोर्ड में बैठे हैं। लेकिन लेनिन की ये अवधारणा साम्राज्यवादी प्रतिद्वंद्विता के संदर्भ में थी, जहां विभिन्न देशों की वित्तीय पूँजी और वित्तीय कुलीनतंत्र अपने अपने देश में रहते थे और “आर्थिक इलाक़ों” के लिए दूसरे विकसित देशों की वित्तीय पूँजी और वित्तीय कुलीनतंत्र से प्रतिस्पर्धा करते थे।  समकालीन पूंजीवाद की विशेषता है कि इसने इस प्रतिस्पर्धा को चुप करा दिया है। यह चुप्पी पूँजीपति वर्ग का कोई आपसी समझौता नहीं है बल्कि अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय पूँजी का उदय इसका कारण है। यह पूँजी किसी एक देश की पूँजी नहीं है और इसीलिए यह दुनिया के देशों में कोई बँटवारा नहीं चाहती। यह चाहती है कि पूरी दुनिया में बिना रोक टोक के यह आ जा सके। समकालीन वित्तीय पूँजी वैश्विक है, यह किसी एक देश का साम्राज्यवादी रणनीति का हिस्सा नहीं है जैसा कि यह लेनिन के जमाने में हुआ करती थी।  समकालीन वित्तीय पूँजी केवल वैश्विक ही नहीं है बल...

मार्क्सवादी राजनीतिक अर्थशास्त्र

साम्राज्यवाद- पूंजीवाद का उच्चतम चरण  जैसा कि हमने पहले देखा कि पूँजीवादी प्रतिद्वंद्विता अक्षम कम्पनियों को दिवालिया कर देती है। संकट के समय यह एक महामारी बन जाती है। इसके कारण कुछ कम्पनियाँ प्रभुत्व वाली बन जाती हैं और उनका एकाधिकार हो जाता है। साधारणतः वस्तुओं का मूल्य बाज़ार में माँग और पूर्ति के आधार पर होता है। कोई एक उत्पादक या ख़रीददार मूल्य को प्रभावित नहीं कर सकता।लेकिन जब किसी पूँजीवादी संस्थान का एकाधिकार हो जाता है तो वह मूल्यों को नियंत्रित कर सकता है। वह वस्तुओं के मूल्यों को बढ़ाकर और उत्पादन को घटा कर अपना मुनाफ़ा बढ़ाएगा।  इसीलिए पूँजीपतियों की आपसी प्रतिद्वंद्विता एकाधिकार की तरफ़ लेकर जाती है। उन्नीसवीं सदी के अंत में लेनिन ने यह गौर किया कि एकाधिकार पूंजीवाद का एक प्रमुख विशेषता बन गया है। अलग अलग पूँजीवादी देशों में एकाधिकार अलग अलग इंडस्ट्रीयल सेक्टर में उत्पादन को नियंत्रित करने लगा है। पूंजीवाद खुले प्रतिद्वंद्विता से आगे जाकर एकाधिकार के चरण तक पहुँच चुका है।  एकाधिकार के अलावा पूंजीवाद की दूसरी विशेषता थी वित्तीय पूँजी का उदय। पहले पूँजी या तो व...