मनुआ -- 69 भीषण गर्मी से परेशान मनुआ शाम में अपने घर के बाहर बैठा था। तपती दुपहरी के बाद शाम का तापमान थोड़ा कम हुआ था। परन्तु, घर के अंदर अब भी ऊमस भरी गर्मी थी। बाहर पुरवा हवा धीमी - धीमी चल रही थी। बाहर गली में आकर उसने थोड़ी राहत महसूस की। तभी रघु महतो बड़बड़ाते हुए पहुंचे। अस्पष्ट शब्दों में वे अपनी खीझ निकाल रहे थे। मनुआ ने जिज्ञासावश पूछ दिया -- " क्या हुआ रघु काका ? कहाँ से आ रहे हैं ? कोई झर - झमेला ....? " रघु महतो को मानो ऐसे ही किसी व्यक्ति का इंतजार था, जिससे बोलकर वे अपनी भड़ास निकाल सकें। वे फट पड़े --- " नहीं जाना चाहिए था..... गलती मेरी ही है। धरम के नाम पर राजनीति... हिन्दू सम्मेलन के नाम पर अपनी राजनीति चमकाने आ गए...! मुझे क्या मालूम था , चला गया देखने - सुनने .... ! पर, वहाँ तो धार्मिक प्रवचन की जगह राजनीतिक भाषण चल रहा था.....! " वे अपनी रौ में बोले जा रहे थे। मनुआ को समझते देर न लगी कि वे कहाँ से आ रहे हैं। पिछले कुछ महीनों से मोहल्ले के छोटे से मैदान में एक संगठन के कुछ नौजवान मोहल्ले के छोटे - छोटे बच्चों को व्यायाम और कसरत के नाम पर इकट...
मनुआ - 68 " अरी , सुनती हो...? ", घर में घुसते ही मनुआ ने पत्नी को आवाज दी। " हाँ, सुनती हूँ...अभी बहरी न हुई हूँ...!....का हुआ, बहुते खुश नजर आ रहे हो? " -- पत्नी ने तवे पर रोटी पलटते हुए पूछा । " आज मोदी जी ने गजबे संदेश दिया है....। " " फिर नोटबंदी - वोटबंदी कर दिया का ? " , पत्नी ने बीच में ही बात काटते हुए कहा । दरअसल नोटबंदी के समय उसके बक्से में हजार हज़ार के तीन नोट साड़ी के तह में छिपे रह गए थे , जिन्हें वह बदल नहीं पाई थी। उस नुकसान के लिए वह मोदी जी को आज भी दोषी मानती है । " अरे, नहीं .... ऊ बात नहीं है। आज ऊ बोलिन है कि साल भर देश के लोग सोना या सोने का गहना न खरीदें......! " " वैसे कौन सा लोग रोज सोना खरीद रहे हैं। घर में भुंजी भांग न, ड्योढ़ी पर नाच। उनको न मालूम है कि लोग 5 किलो अनाज पर जीवन खेप रहे हैं ! " " एतने न , बोलिन है कि दाल - सब्जी में कम से कम तेल खर्चा करें। " " वैसे भी ई महंगाई में किसके चौका में छनर - मनर हो रहा है ? दो बूंद से दाल छौंका रहा है और चार बूंद से सब्जी। इनके राज...