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ठगवा

ठगवा फिर दुअरा पर आयल वादा करके खुब भरमयलक पाँच बरिस पर मुँह देखयलक हाथ जोड़ के दाँत निपोरित तनिको न शरमायल ठगवा फिर................. जे कहलक से कुछ न कयलक चढ़ सिंघासन पलटी खयलक पूंजी के गोदी मे बइठल हमनी के लुलुआयल ठगवा फिर.................... चलके हमनी पैदल अइली राह में कतने लाठी खइली भुखले रखलक कोरंटिन में सबहिन के ढनकायल ठगवा फिर .................... जाति-धरम में खुब उलझयलक बस्ती में दंगा करवयलक भाई भाई में लड़वा के सगरे आग लगायल ठगवा फिर..................... देखली ओकर चौकीदारी हो गेल रेहन खेती - बारी चूल्हा में पानी पड़ गेलक नोकरी ला तड़पायल ठगवा फिर....................
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पहचान की राजनीति

## पहचान की राजनीति बनाम वर्गाधारित राजनीति। ## पहचान की राजनीति का मतलब क्या है ? उत्तर आधुनिकता की ही तरह पूंजीवादी सिद्धांतों से निकली पहचान की राजनीति मार्क्सवाद का विकल्प होने का दावा करती है। यह मानती है कि राजनीति और भौतिक परिस्थितियों के बीच कोई रिश्ता नहीं होता। यह एक ऐसे समाज की परिकल्पना करती है जो तमाम तरह के शोषण और आपसी शत्रुता पर टिका है। इसमें यह सोच निहित है कि जातीयता, धर्म, नस्ल या लैंगिकता आदि से जुड़े शोषण व आपसी शत्रुता का भौतिक परिस्थितियों से कोई रिश्ता नहीं होता। यह पूरी तरह से व्यक्तिगत तौर पर महसूस किया जाता है। पहचान एक व्यक्ति द्वारा उसके उत्पीड़न के अनुभव के आधार पर बनती है और पूरी तरह से आत्मपरक और स्वायत्त होती है।  यह किसी भी समाज के वर्ग विभाजन पर आधारित विश्लेषण को अस्वीकार करता है। पहचान की राजनीति के अनुसार समाज में मुख्य विभाजन है -- व्यक्तिगत रूप से उत्पीड़न सहन करने वालों और बाकि सभी उनलोगों के बीच जिन्होंने उत्पीड़न का अनुभव नहीं किया है। उदाहरण के लिए पहचान की राजनीति के सिद्धांतों के अनुसार जातिगत उत्पीड़न का अनुभव करने वाला एक दलित मजदूर...

मकान और घर

मकान और घर एक मकान वह था  जहाँ मेरा बचपन बीता   अभाव ही अभाव था  गरीबी थी  मुफलिसी थी भूख थी  पर, रोटी नहीं नींद थी पर, बिस्तर नहीं दीवार में दरार थे पर दिलों में प्यार था सद्भाव था  सहयोग था साझा सपने थे साझा प्रयास था चैन था, सुकून था वह मकान नहीं हमारा घर था. दूसरा मकान  जहाँ रहता हूँ अब मजबूत दीवारें लोहे का बड़ा फाटक गैरज में लाखों की गाड़ी सोफे, कुर्सियां, खाने का मेज बड़ी - बड़ी आलमारियां जरूरत की सारी चीजों से भरी हुईं आधुनिक कीचन तरह - तरह के व्यंजन पर, भूख नहीं  गद्देदार बिस्तर पर, नींद नहीं बिखरे हुए सपने टूटे हुए अरमान चारो ओर खालीपन दूर तक पसरा सन्नाटा जीवन बोझ सा लगता है यह मकान बड़ा भले ही है अपना घर नहीं लगता है .

मार्क्सवादी राजनीतिक अर्थशास्त्र

एक सदी पहले लेनिन ने वित्तीय पूँजी की बात की थी कि कैसे वो बैंक और इंडस्ट्रीयल पूँजी का गठजोड़ है, एक कुलीन तंत्र इस पूँजी का मालिक है और वही लोग बैंक तथा इंडस्ट्री के निर्देशकों के बोर्ड में बैठे हैं। लेकिन लेनिन की ये अवधारणा साम्राज्यवादी प्रतिद्वंद्विता के संदर्भ में थी, जहां विभिन्न देशों की वित्तीय पूँजी और वित्तीय कुलीनतंत्र अपने अपने देश में रहते थे और “आर्थिक इलाक़ों” के लिए दूसरे विकसित देशों की वित्तीय पूँजी और वित्तीय कुलीनतंत्र से प्रतिस्पर्धा करते थे।  समकालीन पूंजीवाद की विशेषता है कि इसने इस प्रतिस्पर्धा को चुप करा दिया है। यह चुप्पी पूँजीपति वर्ग का कोई आपसी समझौता नहीं है बल्कि अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय पूँजी का उदय इसका कारण है। यह पूँजी किसी एक देश की पूँजी नहीं है और इसीलिए यह दुनिया के देशों में कोई बँटवारा नहीं चाहती। यह चाहती है कि पूरी दुनिया में बिना रोक टोक के यह आ जा सके। समकालीन वित्तीय पूँजी वैश्विक है, यह किसी एक देश का साम्राज्यवादी रणनीति का हिस्सा नहीं है जैसा कि यह लेनिन के जमाने में हुआ करती थी।  समकालीन वित्तीय पूँजी केवल वैश्विक ही नहीं है बल...

मार्क्सवादी राजनीतिक अर्थशास्त्र

साम्राज्यवाद- पूंजीवाद का उच्चतम चरण  जैसा कि हमने पहले देखा कि पूँजीवादी प्रतिद्वंद्विता अक्षम कम्पनियों को दिवालिया कर देती है। संकट के समय यह एक महामारी बन जाती है। इसके कारण कुछ कम्पनियाँ प्रभुत्व वाली बन जाती हैं और उनका एकाधिकार हो जाता है। साधारणतः वस्तुओं का मूल्य बाज़ार में माँग और पूर्ति के आधार पर होता है। कोई एक उत्पादक या ख़रीददार मूल्य को प्रभावित नहीं कर सकता।लेकिन जब किसी पूँजीवादी संस्थान का एकाधिकार हो जाता है तो वह मूल्यों को नियंत्रित कर सकता है। वह वस्तुओं के मूल्यों को बढ़ाकर और उत्पादन को घटा कर अपना मुनाफ़ा बढ़ाएगा।  इसीलिए पूँजीपतियों की आपसी प्रतिद्वंद्विता एकाधिकार की तरफ़ लेकर जाती है। उन्नीसवीं सदी के अंत में लेनिन ने यह गौर किया कि एकाधिकार पूंजीवाद का एक प्रमुख विशेषता बन गया है। अलग अलग पूँजीवादी देशों में एकाधिकार अलग अलग इंडस्ट्रीयल सेक्टर में उत्पादन को नियंत्रित करने लगा है। पूंजीवाद खुले प्रतिद्वंद्विता से आगे जाकर एकाधिकार के चरण तक पहुँच चुका है।  एकाधिकार के अलावा पूंजीवाद की दूसरी विशेषता थी वित्तीय पूँजी का उदय। पहले पूँजी या तो व...

मार्क्सवादी राजनीतिक अर्थशास्त्र

पूंजीवाद का आवधिक संकट  हम सबने अपने जीवनकाल में 2008 के आर्थिक संकट को देखा है। लेकिन अगर आप इतिहास पर नज़र डालेंगे तो आप पाएँगे कि पूंजीवाद समय समय पर आर्थिक संकट से गुज़रते - उबरते रहता है। ये एक चक्र है। आइए इसको समझते हैं। पूंजीवाद में आर्थिक संकट तभी आता है जब बाज़ार में उत्पादित वस्तुओं की बिक्री कम हो जाती है। जैसा कि पिछले पोस्ट में आपको समझाया था कि पूँजीपति अपने मुनाफ़े को वापस उत्पादन में लगाता है और उसे विस्तारित पुनरुत्पादन कहते हैं। लेकिन विस्तारित पुनरुत्पादन को तभी आगे बढ़ाया जा सकता है जब पहले के उत्पादित सभी वस्तु बाज़ार में बिक जाएँ । बुर्ज़ुआ अर्थशास्त्री कहते हैं कि वस्तु बाज़ार में बिना बिके रहेगी ही नहीं क्यूँ कि पूर्ति अपनी माँग खुद पैदा करेगी।  अगर किसी वस्तु का उत्पादन पहले साल में 100 था और उसकी माँग भी 100 थी तो बाज़ार में बिना बिका हुआ कोई माल नहीं रहेगा। अगर दूसरे साल में उत्पादन 120 थी और माँग भी उतनी ही थी, तो भी बिना बिका माल कुछ नहीं बचेगा। हर साल अगर उत्पादन और माँग एक जैसे रहे तो बाज़ार में वस्तुओं का संचय नहीं होगा।  लेकिन मार्क्स कहत...

मार्क्सवादी राजनीतिक अर्थशास्त्र

संचय और वृद्धि (Accumulation and growth) दिहाड़ी मजदूरी या किसी भी प्रकार की मज़दूरी के अंतर्गत मुनाफ़े के उद्देश्य से वस्तुओं के उत्पादन की व्यवस्था को ही पूंजीवाद कहते हैं। मुनाफ़ा तभी मिलेगा जब बाज़ार में वस्तुओं को उनकी क़ीमत पर बेचा जाएगा। पूंजीवाद वह व्यवस्था है जहां बाज़ार में सफलता उत्पादकों के आपसी प्रतिद्वंद्विता से तय होता है। और ये इस पर निर्भर करेगा कि उत्पादन की क्षमता और निपुणता किसमें कितनी है। ज़्यादा क्षमता के लिए बेहतर तकनीक, बड़ा पैमाना और ज़्यादा निवेश चाहिए होता है। जो पूँजीपति ज़्यादा निवेश नहीं कर पाते और अपने उत्पादन को बढ़ा नहीं पाते वो दिवालिया हो जाते हैं। इसीलिए, बाज़ार की प्रतिद्वंद्विता हर पूँजीपति को शोषण को बढ़ाने और मुनाफ़े को वापस निवेश करने पर बाध्य करती है ताकि उत्पादन को बढ़ाया जा सके। ये पूँजीवादी व्यवस्था की सबसे विशेष बात है जिसका कोई उदाहरण इतिहास में नहीं मिलता। मुनाफ़े को वापस निवेश करने के प्रक्रिया को ही संचय कहते हैं।  समाज लगातार उत्पादन के बिना जीवित नहीं रह सकता। जब पुनरुत्पादन एक ही पैमाने पर होते रहता है तो उसे सामान्य पुनरुत्पादन...