Skip to main content

मनुआ - 65

मनुआ - 65

मनुआ --" ई तो गजबे हो गया, भइया! "
पांडे -- " अइसा का हुआ, मनुआ  ! "
मनुआ -- " मोदीजी को उनके ही भक्त उनकी जाति का नाम ले - लेके सड़कों पर गरिया रहे हैं। इतना ही नहीं, जेएनयू में जो नारा इनके विरोधियों ने लगाया था-- मोदी तेरी कब्र खुदेगी........, वही नारा ये लोग भी लगा रहे हैं। "
पांडे -- " देखो भाई  ! तुमको तो मालूम है कि जब भक्त का दिल टूटता है तो वह अपने भगवान को भी नहीं छोड़ता, जली - कटी सुना ही देता है। बाकी सनातन धर्म में फूट पड़ना समाज के लिए अच्छा नहीं है। 
तभी मनुआ को किसी ने फोन किया। मनुआ ने फोन बंद करते हुए कहा --" लो पांडे भइया, सुप्रीम कोर्ट ने तुम्हारी सुन ली  । "
" अब क्या हुआ, मनुआ  ? "
" उच्चतम न्यायालय का हथौड़ा यूजीसी के ऊपर पड़ गया। उसने उन नियमों पर रोक लगा दी । "
" ईश्वर को लाख - लाख शुक्रिया......! "
" ईश्वर को नहीं, भइया! जस्टिस सूर्यकांत को शुक्रिया बोलो और बोलो शुक्रिया इस सरकार को । वाह ! मोदीजी वाह  ! क्या खेल खेला है! चित्त भी तेरी और पट भी तेरी। मरते रहें रोहित वेमुला और पायल तड़वी और अनिल कुमार और.......भांड़ में जाए देश की शिक्षा व्यवस्था.....! "
" अब शुरू हो गया तुम्हारा रोना - धोना  ! " पांडे का चेहरा खुशी से चमक रहा था। वह लंबे डग भरते हुए निकल लिया। 
मनुआ ने जोर से चिल्लाते हुए कहा -- " लेकिन भूलो मत, भइया  ! कोर्ट ने सिर्फ रोक लगाई है, उसे रद्द नहीं किया है। लोग उसे लागू करने के लिए भी सड़क पर उतर सकते हैं। "

Comments

Popular posts from this blog

मार्क्सवादी राजनीतिक अर्थशास्त्र

मार्क्सवादी राजनैतिक अर्थशास्त्र!  सवाल ये उठता है कि मार्क्सवादी राजनैतिक अर्थशास्त्र ही क्यूँ? जवाब है कि मार्क्सवादी राजनैतिक अर्थशास्त्र हमें पूँजीवादी व्यवस्था का शोषण, विकास और उसके संकट को समझने में मदद करता है। यह समाज के आर्थिक आधार का अध्ययन करता है और इसीलिए उनके लिए ज़रूरी है जो सामाजिक बदलाव के लिए संघर्ष करते हैं। बुर्ज़ुआ अर्थशास्त्र, जो कि हमारे विश्वविद्यालयों में पढ़ाया जाता है, की तरह मार्क्सवादी अर्थशास्त्र ये दिखावा नहीं करता कि वह सभी सामाजिक व्यवस्थाओं की विश्वव्यापी आर्थिक नियमों   की खोज करने की कोशिश करता है। मार्क्सवादी विश्लेषण के अनुसार हर उत्पादन के तरीक़े का अपना विशिष्ट नियम होता है। इसी कारण मार्क्सवादी विश्लेषण के इस विज्ञान को हम राजनैतिक अर्थशास्त्र कहते हैं।  इस विषय पर मार्क्स से लेकर लेनिन ने बहुत कुछ लिखा है परंतु हम आसान तरीक़े से राजनैतिक अर्थशास्त्र के निम्नलिखित चार सवालों तक ही खुद को सीमित रखेंगे - 1. पूंजीवादी अर्थव्यव्स्था वह उत्पादन का तरीक़ा है जहां पूँजीपति वर्ग उत्पादन के साधनों के मालिक होते हैं वो उत्पादन के लिए म...

हो वर्ष नव

हो वर्ष नव हो हर्ष नव हो ‌‌सृजन नवल हो गीत नया  नव ताल - सुर संगीत नया  नूतन जीवन  हो रंग नया  नव नव विहंग नव नव कलरव नव पुष्प खिलें नव नव पल्लव  हो वर्ष नव हो हर्ष नव हालात नए ललकार नई कर ले स्वीकार  मत मान हार  उम्मीद नई  संकल्प नया  प्रज्ज्वलित कर एक दीप नया  हो तम  विनाश हो तम विनाश हो वर्ष नव हो हर्ष नव --- कुमार सत्येन्द्र

मार्क्सवादी राजनीतिक अर्थशास्त्र

पूँजीपति के मुनाफ़े का सफ़र. अंतिम भाग  हमने ये तो स्थापित कर लिया कि पूँजीपति अपना मुनाफ़ा ना तो कच्चे माल और ना ही उत्पादित वस्तुओं के ख़रीद बिक्री में कमाता है। वह मुनाफ़ा कमाता है उत्पादन के दौरान। लेकिन कैसे? इसको समझने से पहले मैं आपको वापस मार्क्स के दास कैपिटल से एक और शब्द को समझाता हूँ। वह शब्द है “श्रम शक्ति” या “labour power”.  पूँजीपति मज़दूरों से उनके श्रम शक्ति को ख़रीदता है और बदले में उनको मज़दूरी देता है। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि मज़दूरी = श्रम शक्ति।  आपने कभी ये सोचा है कि किस प्रक्रिया से मज़दूरों की न्यूनतम मजदूरी तय होती है। इसे तय करने वाली कमिटी एक लम्बे प्रक्रिया के बाद यह कैल्क्युलेट करती है कि मज़दूर को महज़ अपनी ज़िंदगी जीने के लिए कितना मज़दूरी दी जाए। ये कोई नई बात नहीं है। इतिहास में भी सर्फ़ और ग़ुलामों को उत्पाद का उतना ही हिस्सा दिया जाता था जिस से वो महज़ ज़िंदा रहें। उनका हिस्सा परम्परागत तरीक़े से तय किया जाता था जब कि आज के आधुनिक युग में मजदूरों की मज़दूरी श्रम के डिमांड और सप्लाई पर निर्भर करती है। हालाँकि मज़दूर एक साथ आकर अपनी...