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मार्क्सवादी राजनीतिक अर्थशास्त्र

मार्क्सवादी राजनैतिक अर्थशास्त्र! 
सवाल ये उठता है कि मार्क्सवादी राजनैतिक अर्थशास्त्र ही क्यूँ? जवाब है कि मार्क्सवादी राजनैतिक अर्थशास्त्र हमें पूँजीवादी व्यवस्था का शोषण, विकास और उसके संकट को समझने में मदद करता है। यह समाज के आर्थिक आधार का अध्ययन करता है और इसीलिए उनके लिए ज़रूरी है जो सामाजिक बदलाव के लिए संघर्ष करते हैं। बुर्ज़ुआ अर्थशास्त्र, जो कि हमारे विश्वविद्यालयों में पढ़ाया जाता है, की तरह मार्क्सवादी अर्थशास्त्र ये दिखावा नहीं करता कि वह सभी सामाजिक व्यवस्थाओं की विश्वव्यापी आर्थिक नियमों  
की खोज करने की कोशिश करता है। मार्क्सवादी विश्लेषण के अनुसार हर उत्पादन के तरीक़े का अपना विशिष्ट नियम होता है। इसी कारण मार्क्सवादी विश्लेषण के इस विज्ञान को हम राजनैतिक अर्थशास्त्र कहते हैं। 
इस विषय पर मार्क्स से लेकर लेनिन ने बहुत कुछ लिखा है परंतु हम आसान तरीक़े से राजनैतिक अर्थशास्त्र के निम्नलिखित चार सवालों तक ही खुद को सीमित रखेंगे -
1. पूंजीवादी अर्थव्यव्स्था वह उत्पादन का तरीक़ा है जहां पूँजीपति वर्ग उत्पादन के साधनों के मालिक होते हैं वो उत्पादन के लिए मज़दूरी पर मजदूरों को रखते हैं। मज़दूरों को मज़दूरी मिलती है और पूँजीपति को मुनाफ़ा। लेकिन ये मुनाफ़ा आता कहाँ से है? क्या पूँजीपति वर्ग भी सामंतो और ग़ुलाम के मालिकों की तरह एक शोषक वर्ग है? इस पूँजीवादी शोषण का रहस्य क्या है? 

2. पुराने उत्पादन के तरीक़ों के विपरीत पूँजीवादी तरीके की पहचान ये है कि इसने बहुत तेज़ी से विकास किया है। इसका मतलब यह है कि पूँजीपति अपने मुनाफ़े को बचाते हैं और उसको वापस निवेश करते हैं। वो कौन सी बाध्यता है जो पूँजीपतियों को इतने बड़े पैमाने पर उत्पादन करने के लिए प्रेरित करती है जो कि आजतक इतिहास में नहीं देखा गया? 

3. हम यह देखते हैं कि हालाँकि पूंजीवाद बहुत तेज़ी से बढ़ता है लेकिन समय समय पर ये संकट से गुजरता ही है।वस्तुओं और सेवाओं का  जो उत्पादन होता है वो बिकता नहीं और बेरोज़गारी तथा ग़रीबी बढ़ती जाती है। तरक़्क़ी अपने उलट ग़रीबी को जन्म देती है। ऐसी परिस्थिति पहले सोची भी नहीं जा सकती थी। इस विरोधाभास को आप कैसे समझा सकते हैं? 

4. पूँजीपतियों की आपसी प्रतिस्पर्धा ने एकाधिकार, पूँजी का निर्यात, औपनिवेशिक और नव-औपनिवेशिक वैश्विक व्यवस्था और वैश्विक वित्तीयकरण को जन्म दिया है। यह पूँजीवादी विकास का नया चरण है - साम्राज्यवाद । हम संक्षेप में इस साम्राज्यवाद के मुख्य बिंदुओं पर चर्चा करेंगे । 
क्रमशः 
#PoliticalEconomy

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मार्क्सवादी राजनीतिक अर्थशास्त्र

पूँजीपति के मुनाफ़े का सफ़र. अंतिम भाग  हमने ये तो स्थापित कर लिया कि पूँजीपति अपना मुनाफ़ा ना तो कच्चे माल और ना ही उत्पादित वस्तुओं के ख़रीद बिक्री में कमाता है। वह मुनाफ़ा कमाता है उत्पादन के दौरान। लेकिन कैसे? इसको समझने से पहले मैं आपको वापस मार्क्स के दास कैपिटल से एक और शब्द को समझाता हूँ। वह शब्द है “श्रम शक्ति” या “labour power”.  पूँजीपति मज़दूरों से उनके श्रम शक्ति को ख़रीदता है और बदले में उनको मज़दूरी देता है। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि मज़दूरी = श्रम शक्ति।  आपने कभी ये सोचा है कि किस प्रक्रिया से मज़दूरों की न्यूनतम मजदूरी तय होती है। इसे तय करने वाली कमिटी एक लम्बे प्रक्रिया के बाद यह कैल्क्युलेट करती है कि मज़दूर को महज़ अपनी ज़िंदगी जीने के लिए कितना मज़दूरी दी जाए। ये कोई नई बात नहीं है। इतिहास में भी सर्फ़ और ग़ुलामों को उत्पाद का उतना ही हिस्सा दिया जाता था जिस से वो महज़ ज़िंदा रहें। उनका हिस्सा परम्परागत तरीक़े से तय किया जाता था जब कि आज के आधुनिक युग में मजदूरों की मज़दूरी श्रम के डिमांड और सप्लाई पर निर्भर करती है। हालाँकि मज़दूर एक साथ आकर अपनी...