पूँजीपति के मुनाफ़े का सफ़र. अंतिम भाग
हमने ये तो स्थापित कर लिया कि पूँजीपति अपना मुनाफ़ा ना तो कच्चे माल और ना ही उत्पादित वस्तुओं के ख़रीद बिक्री में कमाता है। वह मुनाफ़ा कमाता है उत्पादन के दौरान। लेकिन कैसे? इसको समझने से पहले मैं आपको वापस मार्क्स के दास कैपिटल से एक और शब्द को समझाता हूँ। वह शब्द है “श्रम शक्ति” या “labour power”.
पूँजीपति मज़दूरों से उनके श्रम शक्ति को ख़रीदता है और बदले में उनको मज़दूरी देता है। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि मज़दूरी = श्रम शक्ति।
आपने कभी ये सोचा है कि किस प्रक्रिया से मज़दूरों की न्यूनतम मजदूरी तय होती है। इसे तय करने वाली कमिटी एक लम्बे प्रक्रिया के बाद यह कैल्क्युलेट करती है कि मज़दूर को महज़ अपनी ज़िंदगी जीने के लिए कितना मज़दूरी दी जाए। ये कोई नई बात नहीं है। इतिहास में भी सर्फ़ और ग़ुलामों को उत्पाद का उतना ही हिस्सा दिया जाता था जिस से वो महज़ ज़िंदा रहें। उनका हिस्सा परम्परागत तरीक़े से तय किया जाता था जब कि आज के आधुनिक युग में मजदूरों की मज़दूरी श्रम के डिमांड और सप्लाई पर निर्भर करती है। हालाँकि मज़दूर एक साथ आकर अपनी मज़दूरी बढ़वा सकते हैं लेकिन वो भी उतनी ही रहेगी जिस से वो एक संतोषजनक ज़िंदगी जी सकें।
श्रम शक्ति या लेबर पॉवर मनुष्य के काम करने की क्षमता को कहते हैं। पूँजीपति इसी लेबर पॉवर को एक ख़ास समय के लिए उसके वैल्यू के बराबर मज़दूरी देकर ख़रीदता है। इस लेबर पॉवर की क़ीमत या मज़दूरी कितनी होगी? उतनी ही जो क़ीमत उस लेबर पॉवर को पैदा करने में वस्तु या सेवाओं की लागत होगी। साथ ही साथ इस लेबर पॉवर की क़ीमत में मज़दूर के परिवार का भरण पोषण भी शामिल होगा ताकि मज़दूर अपने जैसा ही एक मज़दूर इस दुनिया को देकर जाए।
सीधे शब्दों में अगर कहें तो एक क्लर्क की मज़दूरी उतनी होगी जितनी लागत उस क्लर्क को अपना काम सिखाने में लगी है। इसके अलावा उसकी मज़दूरी में अपने परिवार का भरण पोषण शामिल रहेगा और उसका स्तर बस इतना ही रहेगा कि अपनी ज़िंदगी के बाद वह अपने जैसा एक क्लर्क इस दुनिया को देकर जाए।
हमने जिस पूँजीपति का उदाहरण लिया था उसने बीस लाख खर्च किए थे लेबर पॉवर ख़रीदने में। उसने इतने खर्च इसलिए किए क्यूँ कि उस लेबर पॉवर की क़ीमत ही उतनी थी।
अब आते हैं अपने मूल प्रश्न पर। हमने ये पता लगा लिया कि मुनाफ़ा उत्पादन के समय ही कमाया जाता है। उत्पादन में तीन वस्तुओं का योगदान था, कच्चा माल, मशीन और लेबर पॉवर। इसमें से किसी एक वस्तु में वो ख़ास बात है जो कि खुद की क़ीमत से ज़्यादा क़ीमत पैदा कर सकता है।
अब कच्चा माल और मशीन तो अपनी क़ीमत से ज़्यादा क़ीमत उत्पादन के समय पैदा कर नहीं सकते। तो वो वस्तु है लेबर पॉवर। सामन्तवादी व्यवस्था में सर्फ़ का आवश्यक श्रम समय (necessary labour time) दो दिन था। बाक़ी के चार दिन जो वो ज़मींदार के लिए काम करता था वो था उसका अतिरिक्त श्रम (surplus labour)। आधुनिक समय में जब मज़दूर उन्नत तकनीकों और मशीनों से काम कर रहा है तो आवश्यक श्रम समय (necessary labour time) बहुत कम होगा और अतिरिक्त श्रम बहुत ज़्यादा। पूँजीपति मज़दूर को उसके श्रम शक्ति के क़ीमत के बराबर मज़दूरी देता है ना कि श्रम के बराबर जो वह उत्पादन में लगाता है।
आसान शब्दों में अगर आप ये सोच रहें हैं कि आप जो श्रम करते हो और आपको मज़दूरी उसके बराबर मिलती है तो आप ग़लत सोचते हो। आपको मज़दूरी मिलती है आपके लेबर पॉवर की क़ीमत के बराबर। और वो कैसे निर्धारित होती है आपको बता चुका हूँ। पूँजीपति मज़दूरों को सिर्फ़ आवश्यक श्रम समय की मज़दूरी देता है जो कि कुल श्रम समय का एक बहुत छोटा हिस्सा है।
दूसरे शब्दों में अतिरिक्त मूल्य = श्रम शक्ति द्वारा उत्पादित मूल्य — श्रम शक्ति का मूल्य।
यही है मार्क्स का “The surplus value theory”
पूँजीपति जो पूँजी लगाता है उसका एक हिस्सा ,जो कि उत्पादन के साधनों में लगा होता है जैसे की मशीनों में, एक स्थायी अनुपात के रूप में उत्पादित वस्तु के क़ीमत में जुड़ा होता है। इसीलिए इसको स्थायी पूँजी कहते हैं (C). इसके विपरीत जो पूँजी मज़दूरों को रखने पर खर्च होती है वो उत्पादित वस्तु में अतिरिक्त मूल्य (S) के साथ आती है और इसीलिए इसे अस्थायी पूँजी कहते हैं (V). वस्तु की क़ीमत होती है C+V+S.
इन तीनों से आप मज़दूरों के शोषण की मात्रा और मुनाफ़े के रेट दोनो पता कर सकते हैं।
शोषण की मात्रा = S/V *100
मुनाफ़े का रेट = S/C +V *100
अब आप ये मत समझ लेना कि कारख़ाने में पैदा किया गया इस पूरे अतिरिक्त मूल्य को पूँजीपति अकेले हज़म कर जाता है। नहीं! इसका एक हिस्सा बैंक को, जिसने कारख़ाना लगाने में मदद की, सूद के रूप में ; एक हिस्सा कमीशन के रूप में व्यापारी को, जो उत्पाद बेचने में मदद करता है; एक हिस्सा ज़मीन के मालिक को जिस से लीज़ पर ज़मीन ली गई है आदि आदि सबको दिया जाता है।
राजनैतिक अर्थशास्त्र उन नियमों की भी जाँच करता है जिसके तहत ये हिस्से निर्धारित होते हैं।
इस प्रकार हम देखते हैं कि पूँजीपति अपना मुनाफ़ा मज़दूरों के श्रम से ही कमाता है।
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