## पहचान की राजनीति बनाम वर्गाधारित राजनीति। ##
पहचान की राजनीति का मतलब क्या है ? उत्तर आधुनिकता की ही तरह पूंजीवादी सिद्धांतों से निकली पहचान की राजनीति मार्क्सवाद का विकल्प होने का दावा करती है। यह मानती है कि राजनीति और भौतिक परिस्थितियों के बीच कोई रिश्ता नहीं होता। यह एक ऐसे समाज की परिकल्पना करती है जो तमाम तरह के शोषण और आपसी शत्रुता पर टिका है। इसमें यह सोच निहित है कि जातीयता, धर्म, नस्ल या लैंगिकता आदि से जुड़े शोषण व आपसी शत्रुता का भौतिक परिस्थितियों से कोई रिश्ता नहीं होता। यह पूरी तरह से व्यक्तिगत तौर पर महसूस किया जाता है। पहचान एक व्यक्ति द्वारा उसके उत्पीड़न के अनुभव के आधार पर बनती है और पूरी तरह से आत्मपरक और स्वायत्त होती है।
यह किसी भी समाज के वर्ग विभाजन पर आधारित विश्लेषण को अस्वीकार करता है। पहचान की राजनीति के अनुसार समाज में मुख्य विभाजन है -- व्यक्तिगत रूप से उत्पीड़न सहन करने वालों और बाकि सभी उनलोगों के बीच जिन्होंने उत्पीड़न का अनुभव नहीं किया है। उदाहरण के लिए पहचान की राजनीति के सिद्धांतों के अनुसार जातिगत उत्पीड़न का अनुभव करने वाला एक दलित मजदूर अन्य सभी मजदूरों से अलग है जो दलित नहीं है और जिन्हें दलित नहीं होने के कारण विरोधी माना जाता है।
पहचान की राजनीति का मानना है कि केवल वह लोग ही जो विशिष्ट उत्पीड़न का सीधे अनुभव करते हैं, इसे परिभाषित कर सकते हैं और इसके खिलाफ लड़ सकते हैं। इसलिए यह संकीर्ण पहचानों के आधार पर बिखरे हुए आंदोलनों की वकालत करता है, जिसमें आपसी टकराव होते हैं और इसीलिए बेहद विभाजनकारी भी होते हैं।
पहचान की राजनीति मानती है कि राज्य निष्पक्ष और स्वायत्त है। दूसरे शब्दों में, उस राज्य का, जो कि विशेष वर्गीय हितों का प्रतिनिधित्व करता है, जिनकी वजह से पूंजीवादी समाज में बड़े पैमाने पर शोषण और दमन होता है, पहचान की राजनीति का सिद्धांत मूलभूत तौर पर बचाव करता है। अतः यह वर्गाधारित राजनीति राजनीति के खिलाफ है।
हलांकि यह स्वाभाविक है कि एक दलित मजदूर जातिगत भेदभाव को, एक दलित के रूप में अपनी पहचान को गैर - दलित मजदूर की तुलना में बहुत अधिक तीब्रता से महसूस करेगा। दलितों, आदिवासियों या महिलाओं जैसे सामाजिक रूप से उत्पीड़ित वर्ग अपने उत्पीड़न के एक खास पहलू से भेदभाव को सबसे सीधे तौर पर महसूस करते हैं। एक शोषित सामूहिक पहचान के साथ जुड़ाव आत्मचेतना और आत्मविश्वास की भावना जरूर प्रदान करता है। यह कुछ विशिष्ट मुद्दों को उजागर करने का भी काम करता है। पूंजीवादी व्यवस्था में जहाँ विभिन्न सामाजिक समूहों को खास तरह के उत्पीड़न का सामना करना पड़ता है, वहाँ पहचान के आधार पर समूहों का बनना लाजिमी है।
जन्म आधारित शोषण की जाति व्यवस्था की भयावहता को पूंजीवाद ने अपना लिया। खासतौर से नव उदारवादी दौर में दलित और आदिवासी पहचान की राजनीति के लिए उसने एक उपजाऊ जमीन प्रदान की। जाति व्यवस्था ऐतिहासिक रूप से उस तरह से अंतर्निहित है, जिस तरह से उत्पादन संबंध पूरे समाज को प्रभावित करते हुए विकसित हुए हैं। जाति को सुपर स्ट्रक्चर का अंग मानना या एक पूंजीवाद से पहले की संरचना समझना या यह मान लेना कि यह सामंती व्यवस्था के अवशेष है, जिसे आधुनिक पूंजीवादी उत्पादन संबंधों द्वारा खत्म किया जा सकता है, जाति की एक यांत्रिक समझ है और वैचारिक तथा सैद्धांतिक तौर पर गलत है। पूंजीवाद के तहत विकसित हो रहे आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक संबंधों में जाति को शामिल किया गया है। देश में बुर्जुआ - जमींदारी व्यवस्था वर्गीय शोषण और जातीय उत्पीड़न पर टिकी हुई है और सामाजिक ऊंच - नीच का उपयोग उनके वर्चस्व को बनाए रखने के लिए किया जाता है। यह सच है कि पूंजीवादी विकास के क्रम में जाति और वर्ग के बीच संबंध बदलते रहे हैं। आदिवासियों एवं अनुसूचित जातियों एक वर्ग में भी वर्ग विभेद देखा जाता है। हलांकि, मजदूर वर्गों और मुख्य रूप से ग्रामीण सर्वहारा वर्ग की सामाजिक संरचना में सबसे बड़ा हिस्सा दलित और आदिवासी सामाजिक समूह का है।
पूंजीवादी शोषण और जातिगत उत्पीड़न की अपनी भौतिक स्थितियों से जुड़ी दलितों और आदिवासियों की पहचान के दावे में एक जनवादी पहलू है। लेकिन पहचान की राजनीति उनकी दुर्दशा के लिए जिम्मेदार व्यवस्था के खिलाफ संघर्ष को कमजोर करती है। इतना ही नहीं, पहचान आधारित विभाजन जाति व्यवस्था और मनुवादी संस्कृतियों के खिलाफ एकजुट और व्यापक संघर्ष को कमजोर करता है।
वर्गीय शोषण के खिलाफ लड़ाई में सामाजिक उत्पीड़न के खिलाफ विशिष्ट लड़ाई भी शामिल है। हमारे देश में पूंजीवादी विकास के भीतर निहित जाति व्यवस्था जैसी व्यवस्थित संरचनाओं के माध्यम से वर्गीय शोषण को मजबूत किया गया है। इसलिए वर्गीय शोषण से लड़ने और मेहनतकशों की एकता कायम करने के लिए दोनों के खिलाफ संघर्ष को जोड़ना होगा।
वर्गाधारित राजनीति के संदर्भ में बात करते हुए हम स्पष्टतः दो गलत प्रवृत्तियों से रू ब रू होते हैं। पहला है -- वर्ग एवं वर्ग संघर्ष की यांत्रिक समझ। अक्सर हम इस बात को भूल जाते हैं कि मजदूर वर्ग और ग्रामीण सर्वहारा की सामाजिक संरचना का एक बड़ा हिस्सा दलित और आदिवासी है जो अतिरिक्त मूल्य की उगाही के लिए जातिगत शोषण का अतिरिक्त बोझ ढो रहा है। तथाकथित नीची जातियों को उनकी जाति की वजह से सबसे कम मजदूरी वाले काम दिये जाते हैं। शहरी और खासकर ग्रामीण भारत में इसके कई उदाहरण हैं। अतएव, जाति व्यवस्था के खिलाफ एक मजबूत संघर्ष तैयार किये बिना वर्गीय एकता नहीं कायम की जा सकती है।
दूसरी प्रवृत्ति है, पहचान की राजनीति का पिछलग्गू बन जाना। कुछ उत्पीड़ित वर्गों, वर्ग समूहों और समुदायों का पहचान की राजनीति का पिछलग्गू बन जाना वर्गाधारित राजनीति को कमजोर करता है। वर्गाधारित राजनीति के नेताओं या प्रवक्ताओं को उन वर्गों के लोगों से बातचीत कर उन्हें कनविंस करना होगा कि पहचान की राजनीति से उनकी समस्याओं का हल नहीं निकलेगा। उन्हें उस राजनीति से अलग करना होगा। साथ ही, इन उत्पीड़ित वर्गों के समक्ष उपस्थित विशिष्ट सामाजिक और जातिगत बाधाओं को दूर कर के वर्गीय एकता के निर्माण का रास्ता प्रशस्त करना होगा। आदिवासियों, दलितों और अल्पसंख्यकों के बीच जाकर उनके ज्वलंत मुद्दों पर उन्हें संगठित करते हुए संयुक्त आंदोलन से उन्हें जोड़ना होगा। अगर इन तबकों में संयुक्त और समन्वित काम को विकसित किया जाए तो वे निश्चित ही पहचान की राजनीति छोड़कर व्यापक जनवादी और वर्गीय आंदोलन से जुड़ेंगे। वर्गीय शोषण के खिलाफ संघर्ष और सामाजिक उत्पीड़न के खिलाफ संघर्ष को प्रभावी ढंग से जोड़ना होगा, तभी पहचान की राजनीति की जगह वर्गाधारित राजनीति की जमीन तैयार होगी।
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