एक सदी पहले लेनिन ने वित्तीय पूँजी की बात की थी कि कैसे वो बैंक और इंडस्ट्रीयल पूँजी का गठजोड़ है, एक कुलीन तंत्र इस पूँजी का मालिक है और वही लोग बैंक तथा इंडस्ट्री के निर्देशकों के बोर्ड में बैठे हैं। लेकिन लेनिन की ये अवधारणा साम्राज्यवादी प्रतिद्वंद्विता के संदर्भ में थी, जहां विभिन्न देशों की वित्तीय पूँजी और वित्तीय कुलीनतंत्र अपने अपने देश में रहते थे और “आर्थिक इलाक़ों” के लिए दूसरे विकसित देशों की वित्तीय पूँजी और वित्तीय कुलीनतंत्र से प्रतिस्पर्धा करते थे।
समकालीन पूंजीवाद की विशेषता है कि इसने इस प्रतिस्पर्धा को चुप करा दिया है। यह चुप्पी पूँजीपति वर्ग का कोई आपसी समझौता नहीं है बल्कि अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय पूँजी का उदय इसका कारण है। यह पूँजी किसी एक देश की पूँजी नहीं है और इसीलिए यह दुनिया के देशों में कोई बँटवारा नहीं चाहती। यह चाहती है कि पूरी दुनिया में बिना रोक टोक के यह आ जा सके। समकालीन वित्तीय पूँजी वैश्विक है, यह किसी एक देश का साम्राज्यवादी रणनीति का हिस्सा नहीं है जैसा कि यह लेनिन के जमाने में हुआ करती थी।
समकालीन वित्तीय पूँजी केवल वैश्विक ही नहीं है बल्कि यह वैश्विक उत्पादन के लिए स्थितियाँ पैदा करती हैं जैसे कि उत्पादन को विकसित देशों से तीसरी दुनिया के देशों में ले जाना जहां श्रम सस्ता है, तीसरी दुनिया पर नव उदारवादी नीतियों को IMF और विश्व बैंक के द्वारा थोपना।
दो विश्वयुद्धों ने साम्राज्यवादी ताक़तों को कमजोर कर दिया था और समाजवादी विचारधारा की बढ़ती हुई ताक़त ने इन देशों को कल्याणकारी स्टेट का रूप इख़्तियार करने पर बाध्य कर दिया था। जब ये शक्तियाँ समाजवादी ताक़तों से शीत युद्ध कर रहीं थीं तब अमेरिका और यूरोप के बैंकों में बहुत बड़ी वित्तीय पूँजी जमा हो रही थी और ये मुनाफ़ा कमाने के लिए वैश्विक होना चाह रहीं थीं।
dirigiste रेज़ीम ( राज्य के हस्तक्षेप की सकारात्मक भूमिका पर जोर देते हुए आर्थिक विकास के लिए एक दृष्टिकोण) के विरोधाभास,जिनके कारण इन विकसित देशों में मुद्रा स्फीति की दर काफ़ी बढ़ गई थी, का इन वित्तीय पूँजी के मालिकों ने भरपूर फ़ायदा उठाया और dirigiste रेज़ीम को काफ़ी बदनाम कर नव उदारवादी नीतियों को दुनिया पर थोपा। ये एक तरह से पुराना और स्वच्छंद पूंजीवाद का वापस आना था जो कि स्वतः स्फूर्त था। इस नव उदारवादी काल में dirigiste रेज़ीम की कई वर्किंग क्लास के लिए ली गई नीतियों को उलट दिया गया।
इस नव उदारवादी व्यवस्था ने वस्तुओं, सेवाओं, वित्तीय पूँजी को एक देश से दूसरे देश में बेरोक टोक आने जाने को सुनिश्चित किया। इसका अर्थ ये है कि इस व्यवस्था ने
राष्ट्र-राज्य की अवधारणा को चुनौती दी जिसका एक ही नतीजा निकलना था और वो था कि राष्ट्र-राज्य को वैश्विक वित्तीय पूँजी की हर बात माननी थी ताकि निवेशकों का विश्वास बना रहे और देश से पूँजी का पलायन नहीं हो।इस से राज्य की संप्रभुता की हानि होती है, राज्य के वर्ग अभिविन्यास का संकुचन होता है और लोकतंत्र का ह्रास होता है।
राज्य की संप्रभुता की हानि इस तरह होती है कि इस नव उदारवादी व्यवस्था में राज्य वित्तीय पूँजी की हर माँग को मानता है बिना ये जाने कि ये पूँजी किस देश की है!
उसी तरह लोकतंत्र का ह्रास होता है क्यूँकि किसी भी राजनीतिक दल (मार्क्सवादी दलों को छोड़ कर) में ये हिम्मत नहीं होती कि वो वैश्विक वित्तीय पूँजी के चक्र को तोड़ सकें। इसी कारण लोगों के पास असल में वैकल्पिक आर्थिक नीतियों को चुनने की कोई आज़ादी नहीं होती। जनता किसी भी दल को चुने वो काम उन्हीं वैश्विक वित्तीय पूँजी के लिए करेगी।
क्रमशः
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