कुछ बोलो माँ
वह कौन रौंद रहा है ,
सभ्यता और संस्कृति ,
पूछ रहीं गुरुवर,नजरुल की रूहें.
बेटियों को भी ,
पुकारते हैं जहाँ माँ कहकर ,
कौन कर रहा उनकी इज्जत तार-तार,
दु:शासन भी हो रहा शर्मसार
भीषण अत्याचार
रक्त से सनी माटी
मचा हाहाकार
गाँव -गाँव में मस्तानो की दहाड़
जनतंत्र के पहरुए
घोट रहे जनतंत्र का गला
परिवर्तन का यह भयावह रूप !
कभी सोचा था तुमने ?
कुछ बोलो माँ !
क्यों हो तुम खामोश ?
तुम्हारी चुप्पी------
कहीं मूक समर्थन तो नहीं
या कि भीष्म की तरह
तुम भी बंधे हो सिंहासन से,
शर-शय्या पर पड़ी
कर रही हो इंतजार
युद्ध की समाप्ति का
पर सोचो जरा
क्या बचेगा शेष
माँ-माटी-मानुष ?
सबका विनाश !
सर्वनाश !
आनेवाली पीढियां
पूछेंगी तुमसे
क्या दोगी जवाब ?
कुछ बोलो माँ !
अब भी वक्त है
कुछ तो बोलो.
वह कौन रौंद रहा है ,
सभ्यता और संस्कृति ,
पूछ रहीं गुरुवर,नजरुल की रूहें.
बेटियों को भी ,
पुकारते हैं जहाँ माँ कहकर ,
कौन कर रहा उनकी इज्जत तार-तार,
दु:शासन भी हो रहा शर्मसार
भीषण अत्याचार
रक्त से सनी माटी
मचा हाहाकार
गाँव -गाँव में मस्तानो की दहाड़
जनतंत्र के पहरुए
घोट रहे जनतंत्र का गला
परिवर्तन का यह भयावह रूप !
कभी सोचा था तुमने ?
कुछ बोलो माँ !
क्यों हो तुम खामोश ?
तुम्हारी चुप्पी------
कहीं मूक समर्थन तो नहीं
या कि भीष्म की तरह
तुम भी बंधे हो सिंहासन से,
शर-शय्या पर पड़ी
कर रही हो इंतजार
युद्ध की समाप्ति का
पर सोचो जरा
क्या बचेगा शेष
माँ-माटी-मानुष ?
सबका विनाश !
सर्वनाश !
आनेवाली पीढियां
पूछेंगी तुमसे
क्या दोगी जवाब ?
कुछ बोलो माँ !
अब भी वक्त है
कुछ तो बोलो.
Comments
Post a Comment