" आज के हालात में हम देख रहे हैं कि अपने साथ अब भी हो रहे सामाजिक उत्पीड़न के खिलाफ सामाजिक रूप से पिछड़े तबकों तथा दलितों के बीच जागरूकता बढ़ रही है।यह बहुत ही सकारात्मक लक्षण है।दूसरी ओर हम इस तरह के प्रयासों का प्रवृति भी देख रहे हैं कि इस बढती हुई जागरूकता को सम्बंधित जातिगत या सामाजिक पहचान के दायरे में ही बांध कर रखा जाये।इस तरह इन तबकों को आज जनतांत्रिक आंदोलनों से काटने की कोशिश की जाती है।इसमें सामाजिक रूप से उत्पीड़ित एक तबके को दूसरे के खिलाफ खड़ा किये जाने का खतरा भी रहता है।इसलिए ये ऐसे नकारात्मक रुझान हैं जो अपने शासन को मजबूत करने के सत्ताधारी वर्ग के प्रयासों को ही मजबूत करेंगे।"
"मेरे स्वर में भर दो घनगरज
ताकि मैं इस नरभक्षी को लताड़ सकूँ
जिसकी जघन्य भूख
न मां को छोड़ती है ,न बच्चे को "----रवीन्द्रनाथ टैगोर
"मेरे स्वर में भर दो घनगरज
ताकि मैं इस नरभक्षी को लताड़ सकूँ
जिसकी जघन्य भूख
न मां को छोड़ती है ,न बच्चे को "----रवीन्द्रनाथ टैगोर
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