आज जब मैं मनुआ के घर पहुँचा तो देखा कि उसके साथ कुछ लोग मुँह लटकाए बैठे हैं । मुझे देखते ही मनुआ चहक उठा - " आ गए बाबूजी , अब ईहे कोई रास्ता निकालेंगे । "
" क्या हुआ भाई , सब चिन्तित क्यों हैं ? "
" ई सरकार रोज रोज नया फरमान जारी कर के मुँह में दम कर रखा है बाबूजी । अब सब मजूरन के खाता मे भुगतान ...आ जिनका खाता न है उनका ....? "
" तो खाता खुलवा लो....। "
" कइसे खोलवा लें बाबूजी , ई लोगन के ईहाँ कउनो परमामेंट ठिकाना तो है नहीं ...छव महीना ईहाँ निरमान मजूर का काम करते हैं आउर छव महीना गाँव जा के खेत मजूर का काम करते हैं ...।"
" ठीक है तो गाँव में खाता खुलवा लें ...पैसा सीधे घर पहुँच जाएगा । "
" आपहूँ खूब मजाक करते हैं बाबूजी ....त ईहाँ का खेवा - खर्चा कइसे चलेगा ? "
" अरे , ए टी एम से ! कैशलेस इकोनौमी जब लागू हो रहा है तो अब कैश पेमेंट की बात भूल ही जाओ । "
" बाबूजी ! सच कहूँ त ई सरकार पगला गई है ...अइसन अइसन कानून रोज बना रही है कि हमनी जइसन कम पढ़ल - लिखल लोग त उफर पर के मर ही जायेंगे न ।"
" अरे नहीं भाई , सरकार तो तुम्हें सीधे बाईसवीं सदी में ले जा रही है और तुम हो कि ....। "
" खाक बाईसवीं सदी में ले जा रही है ! दूनो वखत की रोटी का त कउनो जुगाड़ नाहीं कर पा रही है ...शिक्षा - वीक्षा ओतने महँगा कि हमनी के बाल बच्चा पढिए न पइहें ....दवा - दारू आउर कपड़ा - लत्ता सब के दाम आकासे छू रहा है ....ई सब से अभी निपटते रहे कि नोटबंदी ......।"
" जरूरी था भाई । कालाधन , भ्रष्टाचार , आतंकवाद से लड़ना जरूरी था कि नहीं ? "
" हँ त लड़िए त लिहिन ....तीनो पर कउनो असर नाहीं पड़ा है ....अभी नयका नोट छपबे किया था कि लूट शुरू ..ई सिस्टम में भ्रष्टाचार पोरेपोर घुसा हुआ है ...आम आदमी के ए टी एम से मात्र दू हजार मिल रहा है आउर किसी के पास लाखों पकड़ा रहा है ।"
" आखिर पकड़ा तो रहा है ....।"
" कुछ नहीं भी पकड़ा रहे होंगे , उनका तो पौ बारह हुआ न ! ई खुद अपनी बात पर तो टिके नहीं रहते । तब से अब तक पचासो नियम बनाए आउर बदले । अभी कल ही घोषणा कीहिन कि अब 30 दिसम्बर तक एक आदमी मात्र पाँच हजार ही जमा करेगा , अधिक जमा करने पर जाँच होगी और कुछ हीं घंटे मे पलटी भी मार दीहिन ।"
" आखिर तुम कहना क्या चाहते हो ? "
" यही कि आँख मे धूल झोंके से काम नहीं चलेगा । ई लोगों को भरमाना छोड़ दें । न्यायालय के एक निर्णय को तो तुरन्त हीं लागू कर देते हैं आउर दूसरे को दरी के नीचे सरका देते हैं ।"
" मतलब ....!"
" अनजान मत बनिए बाबूजी , सिनेमा हाल वाला त तुरंत ही लागू हो गया , बाकि समान काम के समान वेतनवा वाला ....।"
" अरे , मैं तो बात ही बात मे भूल ही गया । आज इसी को लेकर यूनियन का धरना है , चलो चलो हमें वहाँ चलना है ।
मनुआ ने उठते हुए कहा - " चलिए बाबूजी , अपन हक की लड़ाई त लड़ हीं के पड़ी । "
## पहचान की राजनीति बनाम वर्गाधारित राजनीति। ## पहचान की राजनीति का मतलब क्या है ? उत्तर आधुनिकता की ही तरह पूंजीवादी सिद्धांतों से निकली पहचान की राजनीति मार्क्सवाद का विकल्प होने का दावा करती है। यह मानती है कि राजनीति और भौतिक परिस्थितियों के बीच कोई रिश्ता नहीं होता। यह एक ऐसे समाज की परिकल्पना करती है जो तमाम तरह के शोषण और आपसी शत्रुता पर टिका है। इसमें यह सोच निहित है कि जातीयता, धर्म, नस्ल या लैंगिकता आदि से जुड़े शोषण व आपसी शत्रुता का भौतिक परिस्थितियों से कोई रिश्ता नहीं होता। यह पूरी तरह से व्यक्तिगत तौर पर महसूस किया जाता है। पहचान एक व्यक्ति द्वारा उसके उत्पीड़न के अनुभव के आधार पर बनती है और पूरी तरह से आत्मपरक और स्वायत्त होती है। यह किसी भी समाज के वर्ग विभाजन पर आधारित विश्लेषण को अस्वीकार करता है। पहचान की राजनीति के अनुसार समाज में मुख्य विभाजन है -- व्यक्तिगत रूप से उत्पीड़न सहन करने वालों और बाकि सभी उनलोगों के बीच जिन्होंने उत्पीड़न का अनुभव नहीं किया है। उदाहरण के लिए पहचान की राजनीति के सिद्धांतों के अनुसार जातिगत उत्पीड़न का अनुभव करने वाला एक दलित मजदूर...
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