आज मनुआ बहुत खुश दिख रहा था ।मुझे देखते ही बोला - " बाबूजी , पिछले दो दिनों का तजुर्बा बड़ा ही अच्छा रहा । "
" सो क्या ? "
" हमलोग , ऊ का कहते हैं , मास कलेक्शन करने गए ...हा..हा..हा..बहुत मजा आया ...मरकेटवा मे सब आँख फाड़ - फाड़ के अपना लाल झंडवा को देखते रहे । एगो घुसते ही पूछ दीहिस - काहे का चंदा कर रहे हो भाई ? हमरे मुँह से निकल गया कि नोटबंदी के खिलाफ कार्यक्रम होगा पारटी का । "
" मैने सुना था । तभी तुमको बोला था कि कोई पुचकारे या दुत्कारे हँस कर टाल देना है , क्योंकि ये लोग भ्रमवश सत्ताधारी पार्टी को ही अपनी पार्टी मानते हैं और उससे बहुत ही आस लगाए हुए हैं । अत: चोट खा कर भी उफ् न करेंगे । "
" ऊ त देखबे किया बाबूजी ! कुछ तो भीतरे से कराह रहे थे बाकि ऊपरे से अपने साब के समर्थन कर रहे थे ....कइयों ने कहा कि का चंदा दें भाई ...अबहीं त बोहनी - बट्टा भी नहीं हुआ है ...दुपहर तक बेचारा माछिये मारता रहा ! ...आउर एगो से जब हमने कहा कि नोटबंदिया का ढेरे असर पड़ गया दिखता है ....त ऊ बोला - हाँ , अभी थोड़ी परेशानी है ...लेकिन कुछ अच्छा पाने के लिए कुछ खोना भी तो पड़ता है ।"
" पर यह नहीं बताया कि पाने क्या जा रहा है ? ....रिटेल मे शत-प्रतिशत विदेशी निवेश ही न ? "
" ऊ लोग चाहे जो भी कहे , लेकिन असर तो पड़ा है बाबूजी ।"
" अरे कैसे नहीं पड़ेगा भाई ! कैश की कमी या कहो कि कैश की हदबंदी के कारण सारे छोटे - छोटे उद्योग बंदी के कगार पर हैं ....लाखों मजदूरों की छंटनी हो गई है ....दिहाड़ी और निर्माण मजदूर दर - दर भटक रहे हैं ...जब लोगों की जेबें खाली हैं , तब बाजार मे रौनक कैसे होगी । इससे भी बुरा हाल किसानों की है ।"
" ई सब के बाद भी.कुछ लोग आस लगाए बैठे हैं कि अच्छे दिन जरूर आयेंगे ! "
" इस नोटबंदी का रहस्य तो अब जग जाहिर हो चुका है भाई ! जिनके अच्छे दिन आने थे , आ गए और बुरे दिन वाले कतार मे खड़े हैं । जिनकी चिन्ता सरकार करती है , उनके लिए बंदी के बाद पचासो नियम बदले गए । आखिर मे अघोषित आय को खाता मे जमा करने की छूट 50 - 50 पर दे दी गई । राजनीतिक दलों को भी खाते मे पुराने 500 - 1000/- रू. की नोट जमा करने की छूट दे दी गई । "
" इहे सब हमरा एतराज है बाबूजी ! इन दलों को ई छूट काहे ? अरे हम तो कहते हैं कि कारपोरेटवा से जो चंदा इनका सब के मिलता है , ऊ भी चेक से मिले के चाहीं , ताकि पता तो चले कउन केकरा केतना दिया ।"
" यह पारदर्शिता तो शायद ही आए ! अरे भाई , ये लोग तो विदेशी फंडिंग के मामले मे फँसे तो चुपके से मिलजुल कर विदेशी कंपनी की परिभाषा ही बदल डाले ।"
" कउन - कउन फँसा रहा बाबूजी ? "
" काँग्रेस और बीजेपी । दिल्ली हाईकोर्ट ने इन्हें एफ सी आर ए के उल्लंघन का दोषी भी करार दिया था और उसके खिलाफ ये दोनों पार्टियां सुप्रीम कोर्ट भी गईं थीं।किन्तु इसी साल मई मे सरकार ने फाइनेंस ऐक्ट - 2016 , धारा - 233 के माध्यम से विदेशी कंपनी की परिभाषा ही बदल दिया और उसे सितम्बर,2010 से लागू कर के उस केस को ही खारिज करा दिया । "
" ई त हदे हो गया बाबूजी ! एकरे न कहते हैं - चोर चोर मौसेरा भाई । " मनुआ के कहने के ढंग पर मुझे हँसी आ गई ।
" अच्छा भाई , अब हमें पार्टी आफिस चलना चाहिए । कल और परसों की तैयारी करनी है ।"
" सो क्या बाबूजी ? "
" क्यों , भूल गए क्या ? कल शाम बिरसा चौक पर सरकार का पुतला दहन है और परसों उपायुक्त कार्यालय पर धरना का .......।"
" अरे हाँ बाबूजी ! धत् तेरी के , आज फिर हम भूल गए थे ।" ---- मनुआ ने सिर खुजलाते हुए कहा और मेरे साथ चल दिया ।
मार्क्सवादी राजनैतिक अर्थशास्त्र! सवाल ये उठता है कि मार्क्सवादी राजनैतिक अर्थशास्त्र ही क्यूँ? जवाब है कि मार्क्सवादी राजनैतिक अर्थशास्त्र हमें पूँजीवादी व्यवस्था का शोषण, विकास और उसके संकट को समझने में मदद करता है। यह समाज के आर्थिक आधार का अध्ययन करता है और इसीलिए उनके लिए ज़रूरी है जो सामाजिक बदलाव के लिए संघर्ष करते हैं। बुर्ज़ुआ अर्थशास्त्र, जो कि हमारे विश्वविद्यालयों में पढ़ाया जाता है, की तरह मार्क्सवादी अर्थशास्त्र ये दिखावा नहीं करता कि वह सभी सामाजिक व्यवस्थाओं की विश्वव्यापी आर्थिक नियमों की खोज करने की कोशिश करता है। मार्क्सवादी विश्लेषण के अनुसार हर उत्पादन के तरीक़े का अपना विशिष्ट नियम होता है। इसी कारण मार्क्सवादी विश्लेषण के इस विज्ञान को हम राजनैतिक अर्थशास्त्र कहते हैं। इस विषय पर मार्क्स से लेकर लेनिन ने बहुत कुछ लिखा है परंतु हम आसान तरीक़े से राजनैतिक अर्थशास्त्र के निम्नलिखित चार सवालों तक ही खुद को सीमित रखेंगे - 1. पूंजीवादी अर्थव्यव्स्था वह उत्पादन का तरीक़ा है जहां पूँजीपति वर्ग उत्पादन के साधनों के मालिक होते हैं वो उत्पादन के लिए म...
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