Skip to main content

मनुआ - 6

जब मैं मनुआ के घर पहुँचा तो वह कुछ मायूस सा दिख रहा था ।मेरे पूछने पर बोला - " बाबूजी ! ईहे अंगूठवा को लेके परेशान हूँ ।"
" क्यों , कोई घाव ....? "
" अरे नाहीं बाबूजी ! कल टीविया पर अपने साब जी अंगूठा दिखा रहिन थे । "
अच्छा तो यह बात ! " - मैने मुस्कुराते हुये कहा , " दरअसल वे कह रहे थे कि अब 'एप' और 'ई-वैलेट' से भी हमारी तकनीक आगे विकसित हो गई है । अब तक विश्व मे कहीं नहीं है । बस अंगूठा लगाइए और आपका लेन - देन हो गया । "
" बूझ रहे हैं बाबूजी  " उसके स्वर मे गहन उदासी थी । " ईहे अंगूठा के चक्कर मे हमरा बाप-दादा बर्बाद हुए थे आउर अब हमनी सब के बारी है । कउनो ढ़ेर जमीन-जजात तो नाहीं रहा , ऊ भी बाबू लोगन के आँख मे खटकता रहा आउर जइसे-तइसे ईहे अंगूठवा लगवा - लगवा के बाबू लोगन ले लीहिन । "
" इसमे ऐसी कोई बात नहीं है भाई ! एक लेन-देन की मशीन है , जो अंगूठे की पहचान पर काम करेगी ।"
" बाबूजी ! कागज हो चाहे मशीन , लेन-देन की बात वोही पर न लिखायेगा आउर हमरा जइसा अनपढ़ लोग वगैर समझे-बूझे अंगूठवा लगा देगा - बस माल एने से ओने ।"
अचानक मेरे जेहन मे एक लेखक मित्र की छवि कौंध गई , जो अब इस दुनिया मे नहीं है । उसकी एक लघुकथा थी - " अंगूठा " । ......बचपन मे वह अंगूठा चूसता था । बाद मे जीवन भर अंगूठा उसे चूसता रहा , क्योंकि उसने मुखिया के खिलाफ अंगूठा लगाया था .....।
" का सोचने लगे बाबूजी ...? "
" ऊँ ...हाँ...तो मै कह रहा था कि डरने की कोई बात नहीं है । पहले मशीन तो आने दो । हमलोग कोई मूर्ख हैं क्या ,  जाँच-परख कर उसका ...।"
" अरे बाबूजी , हम जाँच-वाच का खाक करेंगे ! करिया अच्छर भईंस बरोबर ! अंगरेजी त अंगरेजी , इहां त हिन्दिओ न बुझाता है । अभीए सुनते हैं कि , ऊ का कहते हैं , आन लाइन लेन-देन मे कोई गड़बड़ी हो जाती है वा कोई आदमी , ऊ का कहते हैं , खतवा मे से पइसा उड़ा लेता है त बैंकवा कहता है कि हम का करें , तुम्हरे गलती से अइसा हुआ है। ई त ऊहे कहाउत हुआ न कि बिच्छी के मंतरे न मालूम आ साँप के बिल मे हाथ डाले चले ।"
" अरे भाई , चिन्ता मत करो । सरकार सबको सिखाने की व्यवस्था करने जा रही है ।"
" सरकार का खाक बेवस्था करेगी बाबूजी ! अभीए न एतना बड़ा फैसला आनन-फानन मे ले लीहिन ....समूचे देश के लाइन लगवा दीहिन ...बाकि हुआ का ? एगो बड़का चोर नाहीं धराया ...सभे चिकनिया पार ..... अरे इनको जे करना रहा , ऊ हो गया । सब कैश बैंक मे पहुँच गया.. बैंक दिवलिया होय से बच गए ..आउर अडानी-अंबानी के करजा देवे खातिर ढ़ेरे पइसा हो गया ।"
" अरे वाह ! तुम तो काफी समझदार हो गए मनुआ ! यहाँ तो अच्छे-अच्छे पढ़े- लिखे लोग भी इतनी समझ नहीं दिखाते । बस लकीर के फकीर बने हुए हैं । न तर्क , न ही स्वस्थ बहस - मुबाहिसा ।....खैर , छोड़ो इन्हें । कल का प्रोग्राम याद है न ? "
" कल का....का प्रोग्राम बाबूजी ? "
" भूल गए ..... कल सफदर का शहादत दिवस .....।"
" धत् तेरी के ! हम त फिर आज भूल गए रहे । बाबूजी ! ई ऊहे सफदर भाई हैं न , जिनका गीत है ...पढ़ना-लिखना सीखो , ओ मेहनत करने वालों ...।"
" हाँ भाई , वही सफदर हाशमी , जिनकी हत्या दिल्ली मे नुक्कड़ नाटक करने के दौरान कांग्रेसी गुंडों ने कर दी थी । तो हम कार्यालय चलें ? "
" चलो बाबूजी ! "

Comments

Popular posts from this blog

हो वर्ष नव

हो वर्ष नव हो हर्ष नव हो ‌‌सृजन नवल हो गीत नया  नव ताल - सुर संगीत नया  नूतन जीवन  हो रंग नया  नव नव विहंग नव नव कलरव नव पुष्प खिलें नव नव पल्लव  हो वर्ष नव हो हर्ष नव हालात नए ललकार नई कर ले स्वीकार  मत मान हार  उम्मीद नई  संकल्प नया  प्रज्ज्वलित कर एक दीप नया  हो तम  विनाश हो तम विनाश हो वर्ष नव हो हर्ष नव --- कुमार सत्येन्द्र

मार्क्सवादी राजनीतिक अर्थशास्त्र

मार्क्सवादी राजनैतिक अर्थशास्त्र!  सवाल ये उठता है कि मार्क्सवादी राजनैतिक अर्थशास्त्र ही क्यूँ? जवाब है कि मार्क्सवादी राजनैतिक अर्थशास्त्र हमें पूँजीवादी व्यवस्था का शोषण, विकास और उसके संकट को समझने में मदद करता है। यह समाज के आर्थिक आधार का अध्ययन करता है और इसीलिए उनके लिए ज़रूरी है जो सामाजिक बदलाव के लिए संघर्ष करते हैं। बुर्ज़ुआ अर्थशास्त्र, जो कि हमारे विश्वविद्यालयों में पढ़ाया जाता है, की तरह मार्क्सवादी अर्थशास्त्र ये दिखावा नहीं करता कि वह सभी सामाजिक व्यवस्थाओं की विश्वव्यापी आर्थिक नियमों   की खोज करने की कोशिश करता है। मार्क्सवादी विश्लेषण के अनुसार हर उत्पादन के तरीक़े का अपना विशिष्ट नियम होता है। इसी कारण मार्क्सवादी विश्लेषण के इस विज्ञान को हम राजनैतिक अर्थशास्त्र कहते हैं।  इस विषय पर मार्क्स से लेकर लेनिन ने बहुत कुछ लिखा है परंतु हम आसान तरीक़े से राजनैतिक अर्थशास्त्र के निम्नलिखित चार सवालों तक ही खुद को सीमित रखेंगे - 1. पूंजीवादी अर्थव्यव्स्था वह उत्पादन का तरीक़ा है जहां पूँजीपति वर्ग उत्पादन के साधनों के मालिक होते हैं वो उत्पादन के लिए म...

पहचान की राजनीति

## पहचान की राजनीति बनाम वर्गाधारित राजनीति। ## पहचान की राजनीति का मतलब क्या है ? उत्तर आधुनिकता की ही तरह पूंजीवादी सिद्धांतों से निकली पहचान की राजनीति मार्क्सवाद का विकल्प होने का दावा करती है। यह मानती है कि राजनीति और भौतिक परिस्थितियों के बीच कोई रिश्ता नहीं होता। यह एक ऐसे समाज की परिकल्पना करती है जो तमाम तरह के शोषण और आपसी शत्रुता पर टिका है। इसमें यह सोच निहित है कि जातीयता, धर्म, नस्ल या लैंगिकता आदि से जुड़े शोषण व आपसी शत्रुता का भौतिक परिस्थितियों से कोई रिश्ता नहीं होता। यह पूरी तरह से व्यक्तिगत तौर पर महसूस किया जाता है। पहचान एक व्यक्ति द्वारा उसके उत्पीड़न के अनुभव के आधार पर बनती है और पूरी तरह से आत्मपरक और स्वायत्त होती है।  यह किसी भी समाज के वर्ग विभाजन पर आधारित विश्लेषण को अस्वीकार करता है। पहचान की राजनीति के अनुसार समाज में मुख्य विभाजन है -- व्यक्तिगत रूप से उत्पीड़न सहन करने वालों और बाकि सभी उनलोगों के बीच जिन्होंने उत्पीड़न का अनुभव नहीं किया है। उदाहरण के लिए पहचान की राजनीति के सिद्धांतों के अनुसार जातिगत उत्पीड़न का अनुभव करने वाला एक दलित मजदूर...