जब मैं मनुआ के घर पहुँचा तो वह कुछ मायूस सा दिख रहा था ।मेरे पूछने पर बोला - " बाबूजी ! ईहे अंगूठवा को लेके परेशान हूँ ।"
" क्यों , कोई घाव ....? "
" अरे नाहीं बाबूजी ! कल टीविया पर अपने साब जी अंगूठा दिखा रहिन थे । "
अच्छा तो यह बात ! " - मैने मुस्कुराते हुये कहा , " दरअसल वे कह रहे थे कि अब 'एप' और 'ई-वैलेट' से भी हमारी तकनीक आगे विकसित हो गई है । अब तक विश्व मे कहीं नहीं है । बस अंगूठा लगाइए और आपका लेन - देन हो गया । "
" बूझ रहे हैं बाबूजी " उसके स्वर मे गहन उदासी थी । " ईहे अंगूठा के चक्कर मे हमरा बाप-दादा बर्बाद हुए थे आउर अब हमनी सब के बारी है । कउनो ढ़ेर जमीन-जजात तो नाहीं रहा , ऊ भी बाबू लोगन के आँख मे खटकता रहा आउर जइसे-तइसे ईहे अंगूठवा लगवा - लगवा के बाबू लोगन ले लीहिन । "
" इसमे ऐसी कोई बात नहीं है भाई ! एक लेन-देन की मशीन है , जो अंगूठे की पहचान पर काम करेगी ।"
" बाबूजी ! कागज हो चाहे मशीन , लेन-देन की बात वोही पर न लिखायेगा आउर हमरा जइसा अनपढ़ लोग वगैर समझे-बूझे अंगूठवा लगा देगा - बस माल एने से ओने ।"
अचानक मेरे जेहन मे एक लेखक मित्र की छवि कौंध गई , जो अब इस दुनिया मे नहीं है । उसकी एक लघुकथा थी - " अंगूठा " । ......बचपन मे वह अंगूठा चूसता था । बाद मे जीवन भर अंगूठा उसे चूसता रहा , क्योंकि उसने मुखिया के खिलाफ अंगूठा लगाया था .....।
" का सोचने लगे बाबूजी ...? "
" ऊँ ...हाँ...तो मै कह रहा था कि डरने की कोई बात नहीं है । पहले मशीन तो आने दो । हमलोग कोई मूर्ख हैं क्या , जाँच-परख कर उसका ...।"
" अरे बाबूजी , हम जाँच-वाच का खाक करेंगे ! करिया अच्छर भईंस बरोबर ! अंगरेजी त अंगरेजी , इहां त हिन्दिओ न बुझाता है । अभीए सुनते हैं कि , ऊ का कहते हैं , आन लाइन लेन-देन मे कोई गड़बड़ी हो जाती है वा कोई आदमी , ऊ का कहते हैं , खतवा मे से पइसा उड़ा लेता है त बैंकवा कहता है कि हम का करें , तुम्हरे गलती से अइसा हुआ है। ई त ऊहे कहाउत हुआ न कि बिच्छी के मंतरे न मालूम आ साँप के बिल मे हाथ डाले चले ।"
" अरे भाई , चिन्ता मत करो । सरकार सबको सिखाने की व्यवस्था करने जा रही है ।"
" सरकार का खाक बेवस्था करेगी बाबूजी ! अभीए न एतना बड़ा फैसला आनन-फानन मे ले लीहिन ....समूचे देश के लाइन लगवा दीहिन ...बाकि हुआ का ? एगो बड़का चोर नाहीं धराया ...सभे चिकनिया पार ..... अरे इनको जे करना रहा , ऊ हो गया । सब कैश बैंक मे पहुँच गया.. बैंक दिवलिया होय से बच गए ..आउर अडानी-अंबानी के करजा देवे खातिर ढ़ेरे पइसा हो गया ।"
" अरे वाह ! तुम तो काफी समझदार हो गए मनुआ ! यहाँ तो अच्छे-अच्छे पढ़े- लिखे लोग भी इतनी समझ नहीं दिखाते । बस लकीर के फकीर बने हुए हैं । न तर्क , न ही स्वस्थ बहस - मुबाहिसा ।....खैर , छोड़ो इन्हें । कल का प्रोग्राम याद है न ? "
" कल का....का प्रोग्राम बाबूजी ? "
" भूल गए ..... कल सफदर का शहादत दिवस .....।"
" धत् तेरी के ! हम त फिर आज भूल गए रहे । बाबूजी ! ई ऊहे सफदर भाई हैं न , जिनका गीत है ...पढ़ना-लिखना सीखो , ओ मेहनत करने वालों ...।"
" हाँ भाई , वही सफदर हाशमी , जिनकी हत्या दिल्ली मे नुक्कड़ नाटक करने के दौरान कांग्रेसी गुंडों ने कर दी थी । तो हम कार्यालय चलें ? "
" चलो बाबूजी ! "
## पहचान की राजनीति बनाम वर्गाधारित राजनीति। ## पहचान की राजनीति का मतलब क्या है ? उत्तर आधुनिकता की ही तरह पूंजीवादी सिद्धांतों से निकली पहचान की राजनीति मार्क्सवाद का विकल्प होने का दावा करती है। यह मानती है कि राजनीति और भौतिक परिस्थितियों के बीच कोई रिश्ता नहीं होता। यह एक ऐसे समाज की परिकल्पना करती है जो तमाम तरह के शोषण और आपसी शत्रुता पर टिका है। इसमें यह सोच निहित है कि जातीयता, धर्म, नस्ल या लैंगिकता आदि से जुड़े शोषण व आपसी शत्रुता का भौतिक परिस्थितियों से कोई रिश्ता नहीं होता। यह पूरी तरह से व्यक्तिगत तौर पर महसूस किया जाता है। पहचान एक व्यक्ति द्वारा उसके उत्पीड़न के अनुभव के आधार पर बनती है और पूरी तरह से आत्मपरक और स्वायत्त होती है। यह किसी भी समाज के वर्ग विभाजन पर आधारित विश्लेषण को अस्वीकार करता है। पहचान की राजनीति के अनुसार समाज में मुख्य विभाजन है -- व्यक्तिगत रूप से उत्पीड़न सहन करने वालों और बाकि सभी उनलोगों के बीच जिन्होंने उत्पीड़न का अनुभव नहीं किया है। उदाहरण के लिए पहचान की राजनीति के सिद्धांतों के अनुसार जातिगत उत्पीड़न का अनुभव करने वाला एक दलित मजदूर...
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