जब मैं मनुआ के घर पहुँचा तो वह पांडे के साथ बहस मे उलझा हुआ था ।साहब पर लगे आरोप को पांडे सिरे से नकार रहा था और मनुआ जाँच कराने पर जोर दे रहा था ताकि दूध का दूध और पानी का पानी हो जाए । मुझे देखते ही बोला - " आप ही बताइये बाबूजी , क्या जाँच नहीं होनी चाहिए ? "
" बिल्कुल होनी चाहिए । "
" ईहे तो हमहूँ कह रहे हैं । अरे भाई , साँच को आँच का ! अगिन परीछा दे देंगे त सीता मइया के तरह पवित्तर साबित हो जायेंगे , हाँ ! "
" त अकेले वो ही काहे परीछा देंगे , जिनका जिनका नाम है , सबके जाँच हो । सुना है कि हमाम मे सबे नंगा है ...सब दल के लोगों के नाम हैं। "
" देख भाई , अब एके झाड़ू से सबके मत बहार .....हमरा वामपंथी दल के कोई नेता के नाम नहीं है । "
" अरे छोड़ न , ई दल त कुल खतमे होय के कगार पर है ...। "
" आ गए अपनी असलियत पर ....झूठे बोलना आउर लोगों को बरगलाना तो आपलोगों का कामे है । दू - दू राज्य मे जिसकी सरकार है , करोड़ों करोड़ जिसके समर्थक हैं , वो खतम हो रहा है ! अरे भाई , जबतक दुनिया मे शोषण रहेगा , तबतक ई लाल झंडा आकाश मे लहराता रहेगा । का समझे ? "
" मनुआ ठीक कह रहा है पांडे , आप अभी तक गफलत मे हो । मजदूर होकर भी अपना वर्ग हित नहीं समझते हो ।मजदूरी, भत्ता और बोनस की लड़ाई तो लाल झंडे के नीचे रहकर लड़ते हो , किन्तु चुनाव के समय जाति और धर्म के प्रवाह मे बह जाते हो ।" ---मैने हस्तक्षेप किया ।
" वइसे तो आपकी बात ठीके लगता है सर जी , आखिर हमहूँ तो मजदूरे हैं , किन्तु ........।"
" संस्कार आड़े आ जाता है ।सामाजिक बुनावट ने हमारी मानसिकता बदल दी है । शोषक - शासक जाति मे जन्म लेने के कारण हमारी प्रवृत्ति और सोच भी वही हो जाते हैं , है न ? किन्तु यह हमारी भूल है । हम मजदूर - किसान जिस दिन अपने हित के बारे मे जाति - धर्म से ऊपर उठकर सोचेंगे , उसी दिन हम गरीबों की , मजदूरों - किसानों की सरकार बन जायेगी । "
" समझे पांडे भाई ! इसीलिए कहता हूँ कि कबो - कबो हमरे पार्टियो आफिस मे चलो । " -- मनुआ ने हँसते हुए कहा । पांडे असहज महसूस करने लगा था ।
" ठीक है भाई । समय क्या हुआ ? "
" ग्यारह बज गए बाबूजी .... क्यों कोई खास बात ? "
" ..तो तुम भूल गए !.....अरे आज डिब्बा कलेक्शन के लिए ....।"
" अरे हाँ बाबूजी !...... धत् तेरी के ...हम त सचमुच भूल गए थे ।"--- मनुआ ने सिर खुजलाते हुए कहा । जब हम दोनों चलने लगे तो मनुआ ने हँसते हुए पांडे से कहा - " चल हो पांडे भइया , आज ही से हमनी से जुड़ जा ! "
" अरे अभी नाहीं भइया , आज घर मे ढेरे काम है । " -- पांडे ने घबराते हुए कहा । उसकी घबराहट देखकर हम जोर से हँस पड़े ।
मार्क्सवादी राजनैतिक अर्थशास्त्र! सवाल ये उठता है कि मार्क्सवादी राजनैतिक अर्थशास्त्र ही क्यूँ? जवाब है कि मार्क्सवादी राजनैतिक अर्थशास्त्र हमें पूँजीवादी व्यवस्था का शोषण, विकास और उसके संकट को समझने में मदद करता है। यह समाज के आर्थिक आधार का अध्ययन करता है और इसीलिए उनके लिए ज़रूरी है जो सामाजिक बदलाव के लिए संघर्ष करते हैं। बुर्ज़ुआ अर्थशास्त्र, जो कि हमारे विश्वविद्यालयों में पढ़ाया जाता है, की तरह मार्क्सवादी अर्थशास्त्र ये दिखावा नहीं करता कि वह सभी सामाजिक व्यवस्थाओं की विश्वव्यापी आर्थिक नियमों की खोज करने की कोशिश करता है। मार्क्सवादी विश्लेषण के अनुसार हर उत्पादन के तरीक़े का अपना विशिष्ट नियम होता है। इसी कारण मार्क्सवादी विश्लेषण के इस विज्ञान को हम राजनैतिक अर्थशास्त्र कहते हैं। इस विषय पर मार्क्स से लेकर लेनिन ने बहुत कुछ लिखा है परंतु हम आसान तरीक़े से राजनैतिक अर्थशास्त्र के निम्नलिखित चार सवालों तक ही खुद को सीमित रखेंगे - 1. पूंजीवादी अर्थव्यव्स्था वह उत्पादन का तरीक़ा है जहां पूँजीपति वर्ग उत्पादन के साधनों के मालिक होते हैं वो उत्पादन के लिए म...
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