जब मैं मनुआ के घर पहुँचा तो वह किसी के साथ गुफ्तगू में लीन था ।मुझे देखा तो बोला -" आइए बाबूजी , इससे मिलिए । मेरा भतीजा , चुनचुन । गाजियाबाद के एक फैक्ट्री मे काम करता है ।" नवयुवक ने अपने सुसंस्कार का परिचय देते हुए प्रणाम किया ।आशीष देते हुए मैंने प्रश्न किया - " छुट्टी मे आये हो ? "
" अरे नहीं बाबूजी , इसकी छुट्टी कर दी गई है । नोटबंदी का , ऊ का कहते हैं , साइड इफेक्ट ।"
बात गंभीर थी , किन्तु कहने के अंदाज के कारण हँसी आ गई ।
" हमारी जान पर पड़ी है और आपको....।"
" बुरा मत मानो भाई ! हमारी जिंदगी वैसे भी कहाँ खुशहाल थी । ऊपर से इस नोटबंदी ने और भी मुश्किलें पैदा कर दी है । "
" हाँ सो तो है सर ! किन्तु जो भी सरकार ने किया है , देश के भले के लिए ही किया है । कुछ दिनों मे सबकुछ नार्मल हो जाएगा । कालाधन निकालने के लिए यह कदम उठाना जरूरी था शायद ।"
चुनचुन की बात पर मनुआ लाल-पीला हो गया ।
" कइसा मूरख है ! नौकरी चली गई ।रोटी के लाले पड़े हैं और ई सरकार के जुमलाबाजिए मे फँसल है । अरे , लौक न रहा है कि आम-अवाम के केतना परेशानी हो रही है । कितनो ने जान गँवा दी । इससे का हुआ ? केतना कालाधन बाहर हुआ ? अब आप ही समझाइए बाबूजी , सुना है आज एक ठो आउर नया कानून आया है ।"
" ठीक ही सुना है भाई । कर- चोरों और कालाबाजारियों को सरकार एक और मौका दे रही है - धन सफेद करने का ..।"
" ई सब दिखावा है बाबूजी । हमनी सब के मूरख बनाया जा रहा है । अरे जवन कालाधन के हिंडोला चढ़ के आए हैं , ओकरे में आगि लगायेंगे का ! अच्छा , त ई बताइये कि अबकी का शिगूफा छोड़े हैं ।"
" शिगूफा नहीं , कर कानून मे संसोधन लाए हैं । अब भी यदि कोई अपना कालाधन घोषित करता है तो सरकार उसका स्रोत नहीं पूछेगी और उसे घोषित रकम का 25% तुरंत सफेद कर देगी और 25 % जनहित खाता मे रखेगी , जिसे वह चार साल के बाद निकाल सकेगा ।"
" यानी आधा पैसा सफेद ! वाह रे सरकार ! पहले तो बोला कि 30 सितंबर के बाद कउनो चानस नहीं मिलेगा ....सब पर कानूनी कारवाई होगी .....अरे यही करना था तो हमिन सबके कतार मे खड़ा कर के परेशान काहे कीहीन । "
" ए चाचा , नोटबंदी से अउरो दू ठो काम हुआ है । एक त नकली नोट खतम आउर दोसर कि अतंकवदियन - नसलइटवन के नोट सब के सब रद्दी । पकिस्तान मे जे नकली नोट के करखाना रहे , सब बेकार ....।"
" अच्छा ! त ई बात है ! लगता है कि तू खाली दिल्ली मे करम कूट रहा है । अरे बबुआ , ऊ सब के पैसा आनलाइन आउर हवाला से आता है , ई नहीं मालूम । अच्छा बाबूजी , ई बताइये कि इस नोटबंदी का असर व्यापार आ उद्योग पर कितना पड़ा है ?"
" बहुत ज्यादा । नगदी के कमी से सभी जूझ रहे हैं । इसी का मारा हुआ चुनचुन भी है । इसका फैक्ट्री क्यों बंद हुआ , नगदी की कमी के कारण । इसका असर बाजार पर भी काफी पड़ा है । छोटे व्यापारी भले ही विरोध न करें , लेकिन उनकी हालत पस्त है ।"
" तो ई सरकार जब चोरवन को राहत के लिए सोंच सकती है तो 30 दिसंबर तक सबको पुराने नोट क्यों नहीं चलाने देती ?"
" यही माँग तो हम कर रहे हैं कि आम अवाम को 30 दिसम्बर तक पुराने नोट चलाने की इजाजत मिले । जब नये नोट पर्याप्त मात्रा मे छप जायें , तो पुराने को बंद कर दिया जाए । "
" अरे बाबूजी , इस माँग के समर्थन मे आज अपना प्रदर्शन भी है न ? "
" अरे हाँ ....मैं तो तुम्हें वहीं चलने के लिए कहने आया था ।"
" ई तो वही कहाउत हो गई , ऊ का कहते हैं कि आये थे हरि भजन को , ओटन लगे कपास ।"
मनुआ की बात पर हम सभी ठठाकर हँस दिये ।
मार्क्सवादी राजनैतिक अर्थशास्त्र! सवाल ये उठता है कि मार्क्सवादी राजनैतिक अर्थशास्त्र ही क्यूँ? जवाब है कि मार्क्सवादी राजनैतिक अर्थशास्त्र हमें पूँजीवादी व्यवस्था का शोषण, विकास और उसके संकट को समझने में मदद करता है। यह समाज के आर्थिक आधार का अध्ययन करता है और इसीलिए उनके लिए ज़रूरी है जो सामाजिक बदलाव के लिए संघर्ष करते हैं। बुर्ज़ुआ अर्थशास्त्र, जो कि हमारे विश्वविद्यालयों में पढ़ाया जाता है, की तरह मार्क्सवादी अर्थशास्त्र ये दिखावा नहीं करता कि वह सभी सामाजिक व्यवस्थाओं की विश्वव्यापी आर्थिक नियमों की खोज करने की कोशिश करता है। मार्क्सवादी विश्लेषण के अनुसार हर उत्पादन के तरीक़े का अपना विशिष्ट नियम होता है। इसी कारण मार्क्सवादी विश्लेषण के इस विज्ञान को हम राजनैतिक अर्थशास्त्र कहते हैं। इस विषय पर मार्क्स से लेकर लेनिन ने बहुत कुछ लिखा है परंतु हम आसान तरीक़े से राजनैतिक अर्थशास्त्र के निम्नलिखित चार सवालों तक ही खुद को सीमित रखेंगे - 1. पूंजीवादी अर्थव्यव्स्था वह उत्पादन का तरीक़ा है जहां पूँजीपति वर्ग उत्पादन के साधनों के मालिक होते हैं वो उत्पादन के लिए म...
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