मनुआ के घर के सामने भीड़ सी लगी थी । अनहोनी की आशंका के कारण मेरे कदम तेज हो गए । ऊंची आवाज मे बहस हो रह थी । मनुआ और पांडे बहस मे उलझे थे ।
मनुआ - " हमरा त ऊ तेज बहदुरा के लेके चिन्ता हो रही है भाई .... सिस्टम से न टकरा गया है । जानते हैं ....ई सिस्टम का वसूल है कि एकरा कहँइ से न तोड़ ...न दरकाव , एकरे से बिनती कर कि ए भइया ! तनिका सुधर जा ....हमरो के हुकहुका के जिये द....! "
" तुम्हरा ई सिस्टम ..फिस्टम हम नाहीं जानते हैं । ई बात बहुत गंभीर है कि ऊ बुड़बक जवान अनुशासन तोड़िस है आउर आपन देश का जग हँसाई कीहिस है ।" - पांडे जी के नथुने क्रोध से फड़क रहे थे ।
" वाह रे भाई वाह ! जब हमरे जरनैल साहेब जर - जमीन के घपला मे पकड़ाते हैं , हवाई सेना के सबसे बड़का साहेब दलाली मे फँसते हैं , कतने छोटका साहेब आ जवान लोग , ऊ का कहते हैं , तस्करी मे पकड़ाते हैं ....त हमर देश का कवनो जग हँसाई नाहीं होता है बाकि दुर्गम सीमा पर तैनात कउनो जवान बढ़िया खाना माँग दीहिस त .....। " तभी उसकी नजर मुझ पर पड़ी । " ..आइये बाबूजी ! आपहूँ त फउज मे रहे हैं न , त आप ही फैसला कीजिए कि के सही आउर के गलत है । "
" आपहूं फौज मे थे ! कउना फौज मे ? " - पांडे ने आश्चर्य चकित होकर पूछा ।
" हाँ भाई , जल सेना मे था । " सुनते ही उस छोटी भीड़ की निगाहें मुझ पर जम गईं ।
" पहले तो तुमलोग यह समझो कि बी एस एफ पूरी तरह फौज की श्रेणी मे नहीं आता , वह सी आर पी एफ और सी आई एस एफ की भांति अर्द्ध-सैनिक बल है और यह अपने आप मे हास्यास्पद है , क्योंकि यह सैन्य-बल सदैव सीमा पर तैनात रहता है और उन सारी जिम्मेवारियों को निभाता है ,जो आर्मी निभाती है । किन्तु इस बल के लोग सेना के समकक्ष न तो वेतन पाते हैं और नाहीं सुविधाएं ।"
" ऊ सब त जे है से ठीके है सर जी , ई बताइए कि ई जवान जौन काम कीहिस , ऊ सही है कि गलत ? " - मेरी बात का रुख मोड़ते हुए पांडे ने पूछा ।
" फौज के नजरिए से गलत । "
मनुआ ने चौंक कर मेरी ओर देखा । पांडे के चेहरे पर विजय के भाव थे ।
" लेकिन मै जानता हूँ कि किन परिस्थितियों मे कोई जवान यह कदम उठाता है । यह जानते हुए भी कि उसे आर. आई. , कोर्टमार्शल , यहाँ तक कि नौकरी से बर्खास्तगी , कुछ भी हो सकता है ....वह क्यों ऐसा कदम उठाता है ? .....यही विचारणीय बिन्दु है ।"
" बाबूजी ! कुछ देर ले मान लीजिए कि ऊ जवान सेना मे है आउर ऊँहा ई गलती कीहिस है , त का होता ? "
" देखो भाई , सेना मे अमूमन ऐसी घटना नही घटती या यूँ कहो कि नहीं घट सकती । कारण कि वहाँ अफसरों और जवानों को समय-समय पर अँग्रेजों द्वारा लिखित " आर्टीकल आफ वार " पढ़ कर सुनाया जाता है । सेना के तीनों अंगों मे ऐसा होता है या नहीं ,मै दावे से नहीं कह सकता , किन्तु जल सेना मे होता है । "
" ऊ का है बाबूजी ? " - मनुआ की जिज्ञासा बढ़ गई थी ।
" वैसे तो वह अंग्रेजी मे है ....एक आर्टीकल कहता है कि यदि कोई नेभी का व्यक्ति अपने से ऊपर वाले का आदेश का उल्लंघन करता है यानी अनुशासन तोड़ता है तो उसे ....फांसी , तीन महीने का कैद या यहाँ वर्णित कोई भी सजा दी जा सकती है । "
" सर जी ! पहली बात त ई है कि वो के खाना-पीना आउर रहने-उहने के लेके कोई सवाल उठावे के न है , काहे कि ऊ लोग भरतिए होए के वखत कसम खाते हैं ..।"
" हाँ भाई , हर जवान भर्ती के समय शपथ लेता है कि उसे जल,थल या हवाई मार्ग से जहाँ भी भेजा जाएगा , वह जाएगा ; खाने के लिए जो भी मिलेगा , वह खाएगा ....। "
" शपथवा को छोड़िये न बाबूजी .....ई हमरे मंत्री - मुख्यमंत्री संविधान का शपथ नाहीं खाते हैं , लेकिन निभयबो करते हैं का ? ...ऊ एगो यू पी के मुख्यमंत्री रहिन ....का दो नाम रहा .....हँ ..कल्याण सिंह , शपथ के लाज रखिन थे का ? "
" तुम ठीक कहते हो भाई और इसीलिए आज हर कोई कानून और संविधान की जड़ खोदने मे लगा है । कल ही नोटबंदी को लेकर नया खुलासा हुआ है ।"
" सो का बाबूजी ?"
" राज्य सभा मे एक मंत्री बोले थे कि आर बी आई के सुझाव पर सरकार ने यह कदम उठाया था और आज आर.बी.आई. ने अपने जवाब मे पी ए सी को लिखा है कि सरकार ने इस बावत सुझाव देने को कहा था । "
" बाबूजी ! लोग त कहते हैं कि ई सब साहेबे के दिमाग के ऊपज है ....न केहू से राय लीहिन ...नाही मशविरा कीहिन ....अभियो कहाँ मान रहिन है कि गलती हुई है । एकर विरोध करे वोला के कालाधन के समर्थक बोल रहिन है ।"
"अरे भाई , अब तो लगभग सारे 500-1000के नोट , जो चलन मे थे , सिस्टम मे आ गए । "
" हँ त अब सरकार के बतावे के चाहीं कि केतना जलिया नोट पकड़ाया आउर केतना कालाधन ।"
" जैसा कि रिपोर्ट है कि सरकार सारे नोटों की जाँच बड़े बड़े मशीनों से कर रही है और इसमें डेढ़ से दो साल लगेंगे ...।"
" आउर अतने समय लगेगा ई पता करे मे कि केतना कालाधन पकड़ाइस है ।" -- मनुआ ने हँसते हुए कहा , " आउर इधर 35 लाख मजदूर काम से बेदखल आउर किसान के कतने टन टमाटर-पियाज-सब्जी सड़ - गल के स्वाहा । "
" इस पर तो कोई बहस ही नहीं हो रही है भाई । अगर कुछ कहो तो भक्त लोग तुरन्त तुम्हें देशद्रोही करार कर देंगे । खैर , छोड़ो इसे । कल का कार्यक्रम याद है न ? "
" अबकी नाहीं भूले हैं बाबूजी । कल्हू नया मोड़वा पर मजदूर मोरचा का परदर्शन है , यही न ? "
" हाँ भाई ! तो कल सभी साथियों को लेकर पहुँच जाना ।"
" सभे लोग आयेंगे बाबूजी । का हो पांडे भइया , चलिएगा न ? " - मनुआ ने पांडे को छेड़ा ।
पांडे ने जाते - जाते जवाब दिया - " अब कल का कल देखेंगे भाई ।"
पांडे की बात पर सभी लोग हँस पड़े ।
मार्क्सवादी राजनैतिक अर्थशास्त्र! सवाल ये उठता है कि मार्क्सवादी राजनैतिक अर्थशास्त्र ही क्यूँ? जवाब है कि मार्क्सवादी राजनैतिक अर्थशास्त्र हमें पूँजीवादी व्यवस्था का शोषण, विकास और उसके संकट को समझने में मदद करता है। यह समाज के आर्थिक आधार का अध्ययन करता है और इसीलिए उनके लिए ज़रूरी है जो सामाजिक बदलाव के लिए संघर्ष करते हैं। बुर्ज़ुआ अर्थशास्त्र, जो कि हमारे विश्वविद्यालयों में पढ़ाया जाता है, की तरह मार्क्सवादी अर्थशास्त्र ये दिखावा नहीं करता कि वह सभी सामाजिक व्यवस्थाओं की विश्वव्यापी आर्थिक नियमों की खोज करने की कोशिश करता है। मार्क्सवादी विश्लेषण के अनुसार हर उत्पादन के तरीक़े का अपना विशिष्ट नियम होता है। इसी कारण मार्क्सवादी विश्लेषण के इस विज्ञान को हम राजनैतिक अर्थशास्त्र कहते हैं। इस विषय पर मार्क्स से लेकर लेनिन ने बहुत कुछ लिखा है परंतु हम आसान तरीक़े से राजनैतिक अर्थशास्त्र के निम्नलिखित चार सवालों तक ही खुद को सीमित रखेंगे - 1. पूंजीवादी अर्थव्यव्स्था वह उत्पादन का तरीक़ा है जहां पूँजीपति वर्ग उत्पादन के साधनों के मालिक होते हैं वो उत्पादन के लिए म...
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