मैं और मनुआ पिछले दिन हुए गेट मीटिंग की चर्चा कर ही रहे थे कि पांडे का आगमन हुआ । मनुआ ने पांडे को छेड़ने के ख्याल से पूछा - " का हो पांडे भइया , गेट मीटिंगवा मे कल दिखे नहीं ? कहँवा फँसे रह गए थे ? "
" कहँइ नहीं गए थे भाई । बस समझो कि कउनो उनियन पर अब भरोसा नाहीं रहा । "
" वइसे भी आपका उनियन त अब सरकारी उनियन हो गया है न ....सरकार के खिलाफ कइसे जायेगी ? "
" सच बात त तीते लगता है न ...लेकिन तुम ही बताओ न ...आज मजदूर का भरोसा कउनो उनियन पर है का ? "
" ए पांडे भइया , ई जुमलवा अब बहुते पुराना हो गया है । गये साल का 2 सितम्बर भूलिये गए का , जब सभे उनियन मिलके सरकार के नानी याद दिला दीहिन थे । "
" लेकिन ईहाँ , अपने पलांट मे त नहिए सफल हुआ था न ? "
मनुआ को कोई जवाब नहीं सूझ रहा था । उसने मेरी ओर देखा ।
" यह सच है कि यहाँ सफलता नहीं मिली थी । इसके भी अनेक कारण हैं भाई । इस शहर मे लगभग 35 - 40 वर्षों से हम रह रहे हैं , है कि नहीं ? "
" हाँ बाबूजी , हट्ठा - कट्ठा देह आउर कुच कुच करिया चूल लेकर आए रहे , आ अब देह मे सिरिफ हड्डी रह गया है आउर चूल त चूल मोंछो - दाढ़ी झक्क उज्जर हो गया है ...का हो पांडे भइया ? "
" अरे हाँ भाई .... ठेका मजदूर मे जवाईन किए रहे कि कभी त परमामेंट नोकरी होइये जायेगी । लेकिन......। "
" सपना तो ठीक ही देखा था भाई , किन्तु पूरा कैसे होगा ...इस पर विचार कभी न किया । सरकार की नीतियों के कारण न तो इस शहर मे और उद्योग लगे और न हमारे स्टील प्लांट की ही क्षमता बढ़ी । ऊपर से सरकार ने परमानेंट मजदूरों की संख्या घटाकर काम को ठेके पर देना शुरू कर दिया और हमलोग जाति , धर्म और क्षेत्र के नाम पर चल रही राजनीति मे उलझ कर उनका काम आसान करते रहे ।"
" ईहे त हुआ है बाबूजी । अब त पलंटवा मे परमामेंट मजदूर के दुगुना ठेके मजदूर सब है । "
" अब उस पर भी गाज गिर रहा है भाई । संघर्ष के बल पर जो काम की गारंटी उन्हें मिली थी , वह भी ठेकेदार और प्रबंधन ने छीन ली है । जिन मजदूरों से उन्हें खतरा महसूस होता है , उसे बाहर का रास्ता दिखा देते हैं । "
"लेकिन हमर पांडे भइया के कउनो चिंता करे के बात नहीं है । "
" क्यों भाई ? "
" काहे कि पांडे भइया का त जोगाड़ हो गया है । " मनुआ ने हँसते हुए कहा ।
" हमरा कउन जोगाड़ हो गया है भाई ? "
" बाबूजी ! ई शहरिया पर जरा नजर दौड़ाइए ....पलांट भले ही डूब रहा हो , लेकिन दू रकम के दूकान सगरे पसरा हुआ है । "
" समझा नहीं भाई ! "
" हद हो गया बाबूजी , आपहूं नहीं समझे .....आज से 35 - 40 साल पहिले ई शहर मे कै ठो धर्मस्थल था आउर कै ठो शराब का दूकान ? "
" मतलब ? "
" भाग के कोस , ईश्वर आ अल्ला मियां के दरवाजा खटखटाव आउर इच्छा नाहीं पूर्ति होये त दारू पी के सो जा । "
" देख मनुआ , ईहे सब बतिया जे तू बोलता है न , हमरा तनिको नहीं सोहाता है । " -- पांडे ने आवेश मे कहा ।
मनुआ ने हँसते हुए कहा - " पांडे भइया ! बुरा मत मानिए ! ई भी हमनी के जिनगी के सचाई है । कतनो पढ - लिख के डागडर - इंजीनियर बन जाएं , लेकिन अपन बुद्धि आ शक्ति पर विश्वास नहिए न है । हमर समाज हमेशा एक ठो जादूगर के परतीछा करता है , जे आएगा , जादुई छड़ी घुमाएगा आउर हमरा दुख दरिद्दर भगाएगा । "
" ओही होता ही है । जब जब पिरथी पर धरम के हानि होता है , परभु कउनो न कउनो रूप धर के आते हैं आउर हमनी के उद्धार करते हैं । "
मनुआ को फिर चुहल सूझा - " त आप सभीन के विचार से परभु आइए गये हैं न , अप्पन साहेब के भेष मे ? "
पांडे ने खीझ कर कहा - " आइए गए हैं आउर देखना हमरा पूरा विश्वास है कि ........। "
" अच्छा दिन आ के रहेगा ....आ एकर सबसे बड़ उधारन त नोटबंदिये है , का पांडे भइया ? "
" अरे ई त बानगी है .....आगे आगे देख न कि का ..का होता है । "
" देखिये त रहे हैं पांडे भइया .....कल्हे गान्ही बाबा के हटा के उनका जगह साहेब बइठ गए । "
" त ई मे गलत का हुआ है ? "
" ईहे हमनी के बुझा जाता त आज देश के ईहे हाल होता । अच्छा , ई बताव कि 19 जनवरी के भिलाई चलब न ? "
" भिलाई ! उहाँ का हो रहा है ? कउनो साधु महातमा जग करा रहिन है का ? "
मनुआ ने हँसते हुए कहा - " हाँ भइया , बड़का जग शुरू होखे के है ....सभे उनियन मिल के स्टील पलांट बचावे के लड़ाई शुरू करेंगे । "
" तू जा भाई , हमरा त घर ही से फुरसत नाही है । "
" आ जग - वग होते रहता त फुरसत मिल जाता , है न पांडे भइया ? " -- कहते हुए मनुआ ने मेरी ओर देखा । पांडे ने भागना ही उचित समझा और उठकर चल दिया । हमलोग भिलाई जाने की योजना बनाने लगे ।
हो वर्ष नव हो हर्ष नव हो सृजन नवल हो गीत नया नव ताल - सुर संगीत नया नूतन जीवन हो रंग नया नव नव विहंग नव नव कलरव नव पुष्प खिलें नव नव पल्लव हो वर्ष नव हो हर्ष नव हालात नए ललकार नई कर ले स्वीकार मत मान हार उम्मीद नई संकल्प नया प्रज्ज्वलित कर एक दीप नया हो तम विनाश हो तम विनाश हो वर्ष नव हो हर्ष नव --- कुमार सत्येन्द्र
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