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मनुआ - 11

मैं और मनुआ पिछले दिन हुए गेट मीटिंग की चर्चा कर ही रहे थे कि पांडे का आगमन हुआ । मनुआ ने  पांडे को छेड़ने के ख्याल से पूछा - " का हो पांडे भइया , गेट मीटिंगवा मे कल दिखे नहीं ? कहँवा फँसे रह गए थे ? "
" कहँइ नहीं गए थे भाई । बस समझो कि कउनो उनियन पर अब भरोसा नाहीं रहा । "
" वइसे भी आपका उनियन त अब सरकारी उनियन हो गया है न ....सरकार के खिलाफ कइसे जायेगी ? "
" सच बात त तीते लगता है न ...लेकिन तुम ही बताओ न ...आज मजदूर का भरोसा कउनो उनियन पर है का ? "
" ए पांडे भइया , ई जुमलवा अब बहुते पुराना हो गया है । गये साल का 2 सितम्बर भूलिये गए का , जब सभे उनियन मिलके सरकार के नानी याद दिला दीहिन थे । "
" लेकिन ईहाँ , अपने पलांट मे त नहिए सफल हुआ था न ? "
मनुआ को कोई जवाब नहीं सूझ रहा था । उसने मेरी ओर देखा ।
" यह सच है कि यहाँ सफलता नहीं मिली थी । इसके भी अनेक कारण हैं भाई । इस शहर मे लगभग 35 - 40 वर्षों से हम रह रहे हैं , है कि नहीं ? "
" हाँ बाबूजी , हट्ठा - कट्ठा देह आउर कुच कुच करिया चूल लेकर आए रहे , आ अब देह मे सिरिफ हड्डी रह गया है आउर चूल त चूल मोंछो - दाढ़ी झक्क उज्जर हो गया है ...का हो पांडे भइया ? "
" अरे हाँ भाई .... ठेका मजदूर मे जवाईन किए रहे कि कभी त परमामेंट नोकरी होइये जायेगी । लेकिन......। "
" सपना तो ठीक ही देखा था भाई , किन्तु पूरा कैसे होगा ...इस पर विचार कभी न किया । सरकार की नीतियों के कारण न तो इस शहर मे और उद्योग लगे और न हमारे स्टील प्लांट की ही क्षमता बढ़ी । ऊपर से सरकार ने परमानेंट मजदूरों की संख्या घटाकर काम को ठेके पर देना शुरू कर दिया और हमलोग जाति , धर्म और क्षेत्र के नाम पर चल रही राजनीति मे उलझ कर उनका काम आसान करते रहे ।"
" ईहे त हुआ है बाबूजी । अब त पलंटवा मे परमामेंट मजदूर के दुगुना ठेके मजदूर सब है । "
" अब उस पर भी गाज गिर रहा है भाई । संघर्ष के बल पर जो काम की गारंटी उन्हें मिली थी , वह भी ठेकेदार और प्रबंधन ने छीन ली है । जिन मजदूरों से उन्हें खतरा महसूस होता है , उसे बाहर का रास्ता दिखा देते हैं । "
"लेकिन हमर पांडे भइया के कउनो चिंता करे के बात नहीं है । "
" क्यों भाई ? "
" काहे कि पांडे भइया का त जोगाड़ हो गया है । " मनुआ ने हँसते हुए कहा ।
" हमरा कउन जोगाड़ हो गया है भाई ? "
" बाबूजी ! ई शहरिया पर  जरा नजर दौड़ाइए ....पलांट भले ही डूब रहा हो , लेकिन दू रकम के दूकान सगरे पसरा हुआ है । "
" समझा नहीं भाई ! "
" हद हो गया बाबूजी , आपहूं नहीं समझे .....आज से 35 - 40 साल पहिले ई शहर मे कै ठो धर्मस्थल था आउर कै ठो शराब का दूकान ? "
" मतलब ? "
" भाग के कोस , ईश्वर आ अल्ला मियां के दरवाजा खटखटाव आउर इच्छा नाहीं पूर्ति होये त दारू पी के सो जा । "
" देख मनुआ , ईहे सब बतिया जे तू बोलता है न , हमरा तनिको नहीं सोहाता है । " -- पांडे ने आवेश मे कहा ।
मनुआ ने हँसते हुए कहा - " पांडे भइया ! बुरा मत मानिए ! ई भी हमनी के जिनगी के सचाई है । कतनो पढ - लिख के डागडर - इंजीनियर बन जाएं , लेकिन अपन बुद्धि आ शक्ति पर विश्वास नहिए न है । हमर समाज हमेशा एक ठो जादूगर के परतीछा करता है , जे आएगा , जादुई छड़ी घुमाएगा आउर हमरा दुख दरिद्दर भगाएगा । "
" ओही होता ही है । जब जब पिरथी पर धरम के हानि होता है ,  परभु कउनो न कउनो रूप धर के आते हैं आउर हमनी के उद्धार करते हैं । "
मनुआ को फिर चुहल सूझा - " त आप सभीन के विचार से परभु आइए गये हैं न , अप्पन साहेब के भेष मे ? "
पांडे ने खीझ कर कहा - " आइए गए हैं आउर देखना हमरा पूरा विश्वास है कि ........। "
" अच्छा दिन आ के रहेगा ....आ एकर सबसे बड़ उधारन त नोटबंदिये है , का पांडे भइया ? "
" अरे ई त बानगी है .....आगे आगे देख न कि का ..का होता है । "
" देखिये त रहे हैं पांडे भइया .....कल्हे गान्ही बाबा के हटा के उनका जगह साहेब बइठ गए । "
" त ई मे गलत का हुआ है ? "
" ईहे हमनी के बुझा जाता त आज देश के ईहे हाल होता । अच्छा , ई बताव कि 19 जनवरी के भिलाई चलब न ? "
" भिलाई ! उहाँ का हो रहा है ? कउनो साधु महातमा जग करा रहिन है का ? "
मनुआ ने हँसते हुए कहा - " हाँ भइया , बड़का जग शुरू होखे के है ....सभे उनियन मिल के स्टील पलांट बचावे के लड़ाई शुरू करेंगे । "
" तू जा भाई , हमरा त घर ही से फुरसत नाही है । "
" आ जग - वग होते रहता त फुरसत मिल जाता , है न  पांडे भइया ? " -- कहते हुए मनुआ ने मेरी ओर देखा । पांडे ने भागना ही उचित समझा और उठकर चल दिया । हमलोग भिलाई जाने की योजना बनाने लगे ।

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