जब मैं मनुआ के घर पहुँचा तो बाहर कुछ नये चेहरे को देखकर हैरत मे पड़ गया ।मै पूछता , उसके पहले ही मनुआ ने मुस्कुरा कर कहा - " बाबूजी ! ई सब मेरे भाई-भतीजा हैं ..... गांव से आज ही आए हैं ....रोजी-रोजगार के चक्कर में ...।"
" क्यों भाई , अब गांव मे काम - वाम नहीं रहा क्या ? "
" है क्यों नहीं बाबूजी ....लेकिन उहाँ काम का दाम बहुते कम मिल रहा है ...आउर ई जे नोटबंदिया साहेब कीहीन न ....ऊ त कमरे तोड़ दीहिस है । हमलोगन के पास खुद का जमीन-जजात त है नहीं बाबूजी ... आजकल बबुआन लोग खेती - बारी छोड़ के शहर पकड़ लीहिन त उनके खेत बर - बटाई लेके हमलोग जोत रहे हैं । "
" चलो , अच्छा हुआ । खेत उसके पास आ गया जो खटकर खाता है , माटी मे लोटता - पोटता है ।"
" का खाक अच्छा हुआ बाबूजी ! किसान को फसल का दाम नहीं मिल रहा ...मजूर को काम नहीं ...आ ई नोटबंदिया का नाग त सबके डँस दीहिस ....ई हमर भाई पाँच बिगहा मे टमाटर लगाए रहिन ....खूबे उपजल था ....लेकिन ....।"
" लेकिन क्या मनुआ ? "
" सब खेतवे मे छोड़ दीहिन .....मर - मजूरी भी नाहीं निकल रहा था .....कुछो कहिए बाबूजी , खट के खाए वोला के जान आफते मे है ।"
तभी गांव से आया एक नौजवान बोला - " बाबूजी ! हम त ठहरे अपढ़ - गंवार ....ईहे न बूझा रहा है कि ईसे केकरा का फायदा हुआ ? "
" अरे भाई , एकर पीछे की राजनीति का है , उसको समझो न ! ....चुनउवा मे जे बड़का बड़का कंपनिया पइसवा देता है ...ऊ वसूलबो त करेगा न । ...उनकर बनावल सरकार उनके हित न साधी त हमरा - तोरा ला सोची ? "
" ई त अब हमरो बूझा रहा है मनु भइया ! ....ईहे साहेब चुनउवा से पहिले कहिन थे कि खेती-बारी खातिर एक ठो कलेन्डर बनायेंगे.... फसल का दाम लागत से कम से कम दुगुना देंगे ....लेकिन आज तक कुछो न कीहिन ।"
" देखो भाई , पिछले कई वर्षों से इस देश मे किसान के हित मे कोई नीति नहीं बन रही है । क्रेडिट कार्ड और फसल वीमा जैसी कुछ बातें ऊपर - ऊपर की जाती हैं । बीज - खाद के लिए ही नहीं , अपनी फसल को बेचने के लिए भी किसान बिचौलियों पर निर्भर है । प्राकृतिक आपदा से फसल की बर्बादी पर किसानों को उचित मुआवजा नहीं मिलता । जो सरकार उद्योगपतियों का करोड़ों रुपये का ऋण माफ कर देती है , किसानों की कुर्की-जब्ती कर के वसूल करती है । किसानों की आत्महत्या तक को झुठलाने का प्रयास करती है । "
" आउर हम हैं कि बार-बार इनके द्वारा छले जाते हैं , क्यों बाबूजी ? " -- मनुआ ने मुस्कुराते हुए कहा ।
" लेकिन ई बात अब हर कोई बूझने लगा है बाबूजी ,...फिर ई गलती किसान ....।"
" न करी ...।"-- मनुआ ने बीच मे ही बात काट दी -- " अरे भाई फिरो करी ....आ तब तक करी जब तक किसान जात- धरम से ऊपरे उठ के अप्पन हित न समझी । "
" मनुआ ठीक कह रहा है । हम सबको अपना हित - अहित तो समझना हीं होगा । "
" अच्छा बाबूजी , ई बताइए कि नोटबंदिया से कालाधन आ जाली नोट कुछ पकड़ाया कि नहीं ? "
" पढ़ - सुनकर अचंभा होता है भाई ,.....सुनते हैं कि जितना पाँच सौ - हजार का नोट प्रचलन मे था , उससे भी अधिक बैंकों मे जमा हो गया है । किन्तु सरकार नहीं स्वीकार कर रही है । रिजर्व बैंक का यह हाल है कि उसे यही नहीं मालूम कि उसने अब तक कितने 2000 के नए नोट छापे हैं ।"
" जय हो ! जय हो कुलबोरना सरकार की ! " -- मनुआ ने कुछ इस अंदाज़ मे जयकारा लगाया कि सभी लोग ठठाकर हँस पड़े ।
मार्क्सवादी राजनैतिक अर्थशास्त्र! सवाल ये उठता है कि मार्क्सवादी राजनैतिक अर्थशास्त्र ही क्यूँ? जवाब है कि मार्क्सवादी राजनैतिक अर्थशास्त्र हमें पूँजीवादी व्यवस्था का शोषण, विकास और उसके संकट को समझने में मदद करता है। यह समाज के आर्थिक आधार का अध्ययन करता है और इसीलिए उनके लिए ज़रूरी है जो सामाजिक बदलाव के लिए संघर्ष करते हैं। बुर्ज़ुआ अर्थशास्त्र, जो कि हमारे विश्वविद्यालयों में पढ़ाया जाता है, की तरह मार्क्सवादी अर्थशास्त्र ये दिखावा नहीं करता कि वह सभी सामाजिक व्यवस्थाओं की विश्वव्यापी आर्थिक नियमों की खोज करने की कोशिश करता है। मार्क्सवादी विश्लेषण के अनुसार हर उत्पादन के तरीक़े का अपना विशिष्ट नियम होता है। इसी कारण मार्क्सवादी विश्लेषण के इस विज्ञान को हम राजनैतिक अर्थशास्त्र कहते हैं। इस विषय पर मार्क्स से लेकर लेनिन ने बहुत कुछ लिखा है परंतु हम आसान तरीक़े से राजनैतिक अर्थशास्त्र के निम्नलिखित चार सवालों तक ही खुद को सीमित रखेंगे - 1. पूंजीवादी अर्थव्यव्स्था वह उत्पादन का तरीक़ा है जहां पूँजीपति वर्ग उत्पादन के साधनों के मालिक होते हैं वो उत्पादन के लिए म...
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