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मनुआ - 13

जब मैं मनुआ के घर पहुँचा तो देखा कि उसके पड़ोसी की गाय के पीछे एक आदमी बड़ा सा बर्तन लिए खड़ा है । मनुआ मुस्कुराते हुए उसकी ओर देख रहा था । मेरी उपस्थिति का आभास हुआ तो मेरी ओर देखते हुए बोला - " आइए बाबूजी , विज्ञान की , ऊ का कहते हैं , हँ ... नई खोज देखिये । "
" यहाँ ! विज्ञान की नई खोज ! मैं कुछ समझा नहीं । "
" ऊहाँ सामने देखिये न .....रघु काका गाय का मूत छानने वास्ते खड़े हैं ....।"
" अरे , उसे गो-मूत्र कहते हैं भाई ! लेकिन इतनी मात्रा मे ? "
" अरे वोही बाबूजी ...कहते हैं ...दवाई बनायेंगे ....सुना है कि कउनो संघी वैज्ञानिक आविष्कार कीहीन है । "
" अच्छा ! वह क्या है भाई ? जरा मैं भी सुनूँ । "
" कहीन है कि गऊ के मूत , गोबर आउर ओकर दूध के बनल सामान यदि चेहरा आउर देह पर लगाया जाए त रंग निखरता है आउर कउनो त्वचा वोला रोग नहीं होता है  । बस सुनइत के साथ हम्मर रघु काका शुरू कर दीहीन ओकर क्रीम बनावे ला ...।"
" क्या पतंजलि वाले भी इसी फॉर्मूले पर क्रीम बनाते हैं ?
" नाहीं बाबूजी , ई बार मरकेटिया बाबा चूक गए । ई शोध जबतक हुआ ,तबतक मरकेटिया बाबा अप्पन क्रीम मारकिट मे ला चूकिन थे ।....अच्छा बाबूजी , आपको पता है कि गाय कउन गैस साँस लेती है आउर कउन गैस छोड़ती है ? "
" क्यों भाई , यह तो सभी जानते हैं कि सारे जीव - जंतु ऑक्सीजन साँस लेते हैं और कार्बन डाय ऑक्साइड छोड़ते हैं । "
मनुआ जोर से हँसा - " फैल.....बाबूजी फैल हो गये ....त आपहूँ नही जानते हैं बाबूजी । "
" क्यों ,क्या मैं गलत हूँ ? "
" सौ फीसदी गलत .....अपने राजस्थान वाले शिक्षा मंत्री के हिसाब से बिलकुले गलत । अभी हाल ही मे ऊ बोलिन है कि पूरे पिरथी पर गाये एगो अइसन परानी है , जे औक्सीजने लेती है आउर औक्सीजने छोड़ती है ....हा....हा.....हा...बाबूजी , अब हमनी के विश्व गुरु बने से कउन रोकेगा ? "
" हँसो मत भाई , यह बहुत ही गंभीर बात है । आखिर हम अपने बच्चों को क्या सिखा रहे हैं ? ....कुछ महीने पहले अपने साहेब ने एक अस्पताल के उद्घाटन करते हुए कहा था कि अपने देश मे वर्षों पहले प्लास्टिक सर्जरी की विधि इतनी विकसित थी कि हम मानव के धड़ मे पशु के सिर भी जोड़ देते थे ....और घोर आश्चर्य वहाँ बैठे किसी डाक्टर ने प्रतिवाद तक नहीं किया । ....फिर किसी व्यक्ति ने कहा कि महाभारत काल मे हमारे ऋषि - मुनियों को स्टेम - सेल की इतनी जानकारी थी कि उन्होंने माँस के एक लोथड़े को सौ टुकड़ों मे बाँटकर सौ कौरव भाइयों को जन्म दिया था । "
" बाबूजी ! ई सब त होयबे न करेगा ।जउन देश मे वैज्ञानिक , ऊ का कहते हैं , मंगल यान के सफल उड़ान खातिर होम - जाप करते हैं ....डागडर लोग आपरेशन से पहिले कलेन्डर वोला भगवान जी के सामने खड़ा होके बिनती करते हैं आउर इंजीनियर लोग न खाली गरह - नछत्तर को पूजते हैं बल्कि गरह - दिशा बदले खातिर तरह - तरह के पत्थर जड़ल अंगूठी पहिनते हैं आउर जउना देश मे लाखों रुपैया खरच कर के इनर भगवान से अरज किया जाता है कि हमरा फसल के पानी देके बचा ल भगवान !....ऊ देश मे कुछो हो सकता है बाबूजी । "
" शायद तुम ठीक कहते हो भाई ....हमलोग एक विचित्र समय मे जी रहे हैं । वैज्ञानिक उपलब्धियों का इस्तेमाल अवैज्ञानिक सोच फैलाने के लिए कर रहे हैं । "
" अतने न है बाबूजी ...एकर खिलाफ बोले पर आपकी दिन दहाड़े मडर भी हो सकता है । ई समय बिचितर नाहीं है बाबूजी , ई समय बहुत ही बरबर आउर खतरनाक है । तरक का जगह आस्था ले लीहिस है आउर धारमिक अडंबरवा ने सभे को अंधा कर दीहिस है । "
" फिर भी हम निराश नहीं हैं भाई , अपने बीच अभी भी सैकड़ों दाभोल्कर , पनसारे और कलबूर्गी जिन्दा हैं । "
" बाबूजी ! आप भले ही कुछो कहें , लेकिन ई जे अभी राज चल रहा है , एकरे जंगल - राज कहते हैं ....कउनो संस्था के स्वायत्तता नाहीं बचा है ....केउ है जे सब के अप्पन अंगुली पर नचा रहिस है । सरबनाश के घड़ी आ रहा है बाबूजी ! "
" हूँ......।" मैं कुछ कहता , उससे पहले उसकी नजर रघु काका पर पड़ी , जो गो-मूत्र बर्तन मे छान रहे थे । उसने हँसते हुए कहा --" बच के रघु काका , गइया लातो मारती है । "
उसकी बात पर सभी लोग हँसने लगे ।

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