जब मैं मनुआ के घर पहुँचा तो देखा कि वह किसी उधेड़बुन मे पड़ा है । मुझे देखते ही बोला - " आप ही का बाट जोह रहे थे बाबूजी । "
" क्यों भाई ....कुछ खास बात है क्या ? "
" बाबूजी ! आज कय दिन से हम टीविया पर चैनलवा बदल - बदल के देख रहे हैं , बाकि जे हम खोज रहे हैं ' ऊ केहु दिखाइए न रहिन है । "
" क्या जानना चाहते हो भाई ? नोटबंदी का असर ...? "
" अरे नाहीं बाबूजी , ऊ त अब झकाझक साफ दिख रहा है .....ऊ एगो कहाउत है न कि बानर के हाथ मे नरियर ...ऊहे हुआ है ...बिन सोचले बिचारले चाल त चल दीहिन आउर अब ओकर परभाव देख के बोलतीए बन्द है । "
" फिर क्या जानना चाहते हो भाई ? "
" बाबूजी ! पहिले एन डी टीविया पर कुछ कुछ बिसवास हमरा रहे , लेकिन कल ऊ भी , का नाम है , रवीश .....।"
" हाँ ..तो कल रवीश कुमार यू. पी. चुनाव पर चर्चा तो करवा रहे थे । "
" का खाक चरचा करवा रहिन थे ....अच्छा ई बताइए बाबूजी कि जउन सब पार्टिया पर लोग चरचा कर रहिन थे , ओकरा छोड़ के आउर कउनो पार्टी चुनउवा मे नहीं है का ? "
" मतलब ? "
" मतलब कि सपा , बसपा , भाजपा , काँग्रेस अतने पार्टी चुनाव लड़ रहिन है का ? "
" अरे नहीं भाई , और भी पार्टियां हैं ...जैसे रालोद , जदयू , वामपंथी दल ....। "
" ई हे त बात है बाबूजी , फिर जे ललका झंडवा वाली पार्टियां हैं , उनकी चरचा ई लोग काहे नाहीं करते हैं ? "
" पता नहीं भाई । शायद इस प्रदेश मे इनका जनाधार कमजोर है । "
" ईहे बात खाली नहीं है बाबूजी । ई सब कारपोरेट कंपनियां कर रही हैं। सब चैनलवा पर त उन्हीं सब का कब्जा है । ई सब के अउरो कउनो पार्टी से डर नाहीं है , सिरिफ लाल झंडा छोड़ के । "
" लेकिन जनता इस बात को क्यों नहीं समझ रही भाई ? "
" अब बात ई है बाबूजी कि ई लोग जइसा हवा बहा देते हैं , जनता वोही मे बह जाती है । लेकिन ई बात त सभे मानता है बाबूजी कि ई पर्टियन मे ईमानदार नेता लोग है । "
" आज के समय मे यह शब्द बेमानी हो गया है मनुआ , वरना इतने चोर , बेईमान , भ्रष्ट और अपराधी विधायक , सांसद और मंत्री नहीं बनते । "
" अतने न बाबूजी ....हम त सुने हैं कि कई मंत्री , इहां तक कि साहेबो का सार्टीफिकेट जलिया है ...लेकिन एकरा साबिते करना मुश्किल है ....काहे कि ऊ एगो कहाउत है न ...समरथ के नहीं दोस गुंसाईं । "
" नकली सर्टिफिकेट की बात तो बहुत मामूली है मनुआ , अपने देश मे नकली आई.पी.एस , नकली डाक्टर , नकली मास्टर और अब तो लाखों की संख्या मे नकली वकील तक हैं । "
" ईहे सब देख के बड़ा दुख होता है बाबूजी ....हम अप्पन बाल - बच्चा सब के केकर उधारन दें ....जब गंगोतरिए गंदा है त ......।" -- मनुआ के स्वर मे निराशा के भाव थे।
" हमने उसी गंगोत्री को तो साफ करने का बीड़ा उठाया है भाई ....अगर दशरथ माँझी अकेला पहाड़ काटकर रास्ता बना सकता है तो हम लाखों मजदूर - किसान मिलकर इस गंगोत्री को क्यों नहीं साफ कर सकते । जरूरत है जाति , धर्म और क्षेत्र से ऊपर उठकर अपने हित के लिए ईमानदारी से संघर्ष करने की । "
" वोही त नहीं हो पा रहा है बाबूजी ...जहाँ ई जात - धरम की हवा बही , हम ओही मे बह जाते हैं ... भूलिए जाते हैं कि गरीबी की मार सब पर एके जइसन पड़ती है ...ऊ जात - धरम नाहीं देखती है । "
" होगा मनुआ ...देखा नहीं भिलाई मे कितने लोग इकठ्ठा हुए थे ! जब पेट पर लात पड़ता है तो सबको एका बनाना ही पड़ता है । अच्छा , कल का कार्यक्रम याद है कि चुनाव के चक्कर मे भूल गये हो ? "
" कल वोला कारजकरम कइसे भूलेंगे बाबूजी ! एहे दिन त है , जउन दिन बाबा साहेब हमनी के संविधनवा दिए रहिन ...आज ई न होता त हमनी सब एक बराबर हक आउर अधिकार कहँवा पाते । "
" तो चलें , कल की बहुत सारी तैयारी करनी है ! "
" चलिए बाबूजी ...। "
## पहचान की राजनीति बनाम वर्गाधारित राजनीति। ## पहचान की राजनीति का मतलब क्या है ? उत्तर आधुनिकता की ही तरह पूंजीवादी सिद्धांतों से निकली पहचान की राजनीति मार्क्सवाद का विकल्प होने का दावा करती है। यह मानती है कि राजनीति और भौतिक परिस्थितियों के बीच कोई रिश्ता नहीं होता। यह एक ऐसे समाज की परिकल्पना करती है जो तमाम तरह के शोषण और आपसी शत्रुता पर टिका है। इसमें यह सोच निहित है कि जातीयता, धर्म, नस्ल या लैंगिकता आदि से जुड़े शोषण व आपसी शत्रुता का भौतिक परिस्थितियों से कोई रिश्ता नहीं होता। यह पूरी तरह से व्यक्तिगत तौर पर महसूस किया जाता है। पहचान एक व्यक्ति द्वारा उसके उत्पीड़न के अनुभव के आधार पर बनती है और पूरी तरह से आत्मपरक और स्वायत्त होती है। यह किसी भी समाज के वर्ग विभाजन पर आधारित विश्लेषण को अस्वीकार करता है। पहचान की राजनीति के अनुसार समाज में मुख्य विभाजन है -- व्यक्तिगत रूप से उत्पीड़न सहन करने वालों और बाकि सभी उनलोगों के बीच जिन्होंने उत्पीड़न का अनुभव नहीं किया है। उदाहरण के लिए पहचान की राजनीति के सिद्धांतों के अनुसार जातिगत उत्पीड़न का अनुभव करने वाला एक दलित मजदूर...
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