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मनुआ - 15

मैं और मनुआ 28 जनवरी को बिरसा चौक पर ट्रेड यूनियन मोर्चे की ओर से  आयोजित संयुक्त प्रदर्शन की चर्चा ही कर रहे थे कि पांडे और रघु आ धमके । पांडे ने हँसते हुए पूछा - " त सर जी , ई जे पाँच राज्यों मे चुनाव हो रहे हैं , उसमें आप लोगन की का इस्थिती है ? "
" आप नाहीं पांडे भइया , हमलोगन की । "
" न रे भाई , हम त डूबते नाव पर सवार न होंगे ... का रघु ? " रघु ने भी धीरे से अपना सर हिला दिया ।
" बहुत अफसोस होता है पांडे भइया , जब तू लोग ई बतिया बोलते हो । काहे कि हमर - तोर स्थिति एके है ...हमनी दूनो त ठेके मजूर हैं ... ठेकेदार चाहे हमरा जात के रहे वा कि तुम्हरा जात के मजूरिया बढ़ा के त नहीं देता है न....ऊ कहाउत है न कि बड़की मछरिया छोटकी मछरिया के निगल जाती है । "
रघु जो अब तक चुप बैठा था , बोला - " ऊ सब त ठीक है भाई , लेकिन बेटी - रोटी खातिर त अदमी अपने समाज मे न जाता है । "
" जाता है रघु काका , लेकिन ऊँहां भी लोग , ऊ का कहते हैं , स्टेटसवे देख के नेह - नाता जोड़ते हैं । हमनी अब तक ऊहे मे उलझे हुए हैं  आउर उधर मालिक लोग सब एक होके हमनी के सोसन कर रहिन है । "
" देख मनुआ , बुरा मत मानना ...ईहाँ भी त हम देखते हैं कि सभे नेतवन ऊँचे जात के हैं ...आज तक ई पर्टियन मे हमनी के समाज से केहू बड़का नेता काहे न हुआ ? "
" हुँ ...आजकल ई बात खूबे उठ रहा है ...देखो काका ,  जनम लेना त केहू के हाथ मे नाहीं है कि के कउना जात मे जनम लेगा ...अब रहा करम करे के बात कि कउन का करता है ... केकर पछ मे काम करता है ....ईहाँ त अइसन भी नेता हैं जे कि जनम त लीहिन दलित जात मे आउर जब नेता बन गए त जाके उनके गोदी मे बइठ गए , जे मजूर - किसान के लहू पी रहिन है । "
" अरे ऊ हम समझते हैं ...हमको ई बताओ कि लाल झंडा वोली पर्टिया मे हम्मर समाज के कोई बड़का नेता काहे न है ? "
" काहे कि ऊहाँ जात देख के नेता न चुनाता है काका ....जे भी पारटी के लाइन पर चल के गरीब मानुस ला काम करता है , वोही नेता होता है ....ऊहाँ नीति परमुख है , नेता नाहीं ....न त जोति बसु पी.एम. नहीं बन जाते ....। "
" लेकिन बाद मे ऊहो बोलिन थे कि पार्टी बलंडर गलती कीहिस है । "
" हाँ , बोलिन थे ...बाकि पार्टी आजतक अइसा नहीं मानती है ...आउर जहाँ तक तुम्हारे सवाल की बात है , एकर त ईहे जवाब है कि पार्टी मे अब ऊ बात न है , सभे जात के नेता हैं आउर जब हैं त आज न कल बड़का नेता भी ऊहे बनेंगे । लेकिन सच त ई है कि ऊ का कहते हैं , कीचड़ कीचड़ से न धोवाता है ..... जात - पात खतम करना है त जात - पात के अधार पर पार्टियो न चले के चाहीं । "
" अरे भाई , जात - धरम त सास्वत सत है , ई त कल्हो थे , आजो हैं आउर कल्हो रहेंगे । " -- पांडे ने गर्व के साथ घोषणा की । यह सुनकर रघु को भी थोड़ा झटका लगा । उसने प्रतिवाद किया - " नाहीं पांड़े , अब जात के ई खाईं त पट के रहेगी । "
" कइसे पटेगी रघु काका ? अभिए त तुम अप्पन जात के नेता खोज रहे थे....आ जब बात जात की आती है त हम बूझिए नहीं पाते हैं कि कहँवा जा के रुकें । हमनी जे पिछड़ी वा अनुसूचित जात के लोग हैं , ओकरो मे त कई - कई छोटे - बड़े खाने हैं ... हमलोग ई के त आजतक पाट नहीं पाये । "
" तुम ठीक कहते हो भाई , एकरे फयदा त उठाते हैं ई सोसक लोग ..। " --- रघु ने कुछ सोचते हुए कहा - " लूटेरा चाहे अप्पन जात के ही काहे न हो , आखिर है त लूटेरे न ! "
" अरे काका ई जाति आउर धरम के दल-दल मे फँसे रहे के कारण त हमरी दुरगति हो रही है ....देखो बाबा साहेब बोलिन थे कि अपने देस मे एक आदमी ..एक भोट आउर एक भोट ..एक भैलू त हो गया है , लेकिन एक आदमी ..एक भैलू जब तक न होगा , ई जनतंत्र खतरे मे रहेगा । "
" एकर का मतलब ? "
" एकर मतलब कि समाज से सब तरह के ऊँच - नीच वोला भेद मिटेगा .... आदमी - आदमी मे कउनो फरक नहीं रहेगा ...तभी लोकतंत्र बचेगा। "
" ई त दिने मे सपना देखता है । " --- पांडे ने हँसते हुए मनुआ का मजाक उड़ाया ।
" हँसी - मजाक न करो पांड़े ! मनुआ के बात मे दम है । " रघु ने पांडे का विरोध किया ।
" हँ काका , तभी त हमलोग सब तरह के सोसन - दमन का बिरोध करते हैं आउर सब केहू के बराबर हकवा ला लड़ते हैं ....आ एकरा ला जरूरी है कि जात - पाँत से ऊपरे होके अप्पन हित यानी कि मजूर - किसान के हित मे जउन पार्टी काम करे , ओकरे हमलोग साथ दें । "
" वाह मनुआ ! तुम ई सब बात कहँवा से सीखा रे ...हम त भौंचक हैं ! "
" ई सब बाबूजी आउर , ऊ का कहते हैं , अप्पन सीटू उनियन के सोहबत का नतीजा है काका । " मनुआ ने मेरी ओर इशारा किया । मैने हँसते हुए कहा - " अरे नहीं भाई , यह सब मनुआ की मेहनत का फल है । अपनी ड्यूटी और घर के काम से जब वह फुर्सत पाता है , तब पार्टी या यूनियन के दफ्तर जाता है और वहाँ अखबार या किताब पढ़ता है । अगर मन मे कुछ शंका रहता है तो साथियों से चर्चा कर समाधान ढूंढता है । "
" ई बात ...त अब हमलोग भी एकरा साथ आयेंगे , का हो पांड़े चलोगे न ? " रघु की बात पर सभी लोग हँस पड़े ।

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