Skip to main content

मनुआ - 7

जब मैं मनुआ के घर पहुँचा तो वह पांडे के साथ बहस मे उलझा हुआ था ।
" अब चाहे कुछ भी कहो पांडे भाई , कल के भाषण मे ऊ  बात नहीं था । हाँ, जुमलाबाजी खूब कीहिन । नोटबंदिया से का नफा-नुकसान हुआ , ऊ पर त चुप्पी साध लीहिन ।"
" अरे, अब आउर केतना बताते । कह तो दीहिन कि जेतना काला धन मार्किट मे रहा , ऊ सब बैंक मे आ गया । तभिए त गरीब जनता को राहत देने मे सुविधा हो रही है ।"
" राहत - सुविधा नाहीं , मजाक कीहिन है । जेकरा पास जमीन ही नहीं है , ऊ लोन लेके मकान कहाँ बनायेगा ? नोटबंदी के कारण मार्केट मे अतना मंदी है कि आउर लोन कोई छोटा बेपारी नाहीं लेगा । वोही हाल छोटका उद्यमी सबके है । सबके भट्ठा बइठा दीहिन है ।"
" गरभवती महिलाओं को त 6000/- रुपये दे रहे हैं न ? आउर किसान के करजा पर 60 दिन के सूद माफ कर दीहिन , वरिष्ठ नागरिक के जमा पइसा पर सूद दर बढ़ा दीहिन । "
" अरे भाई , ई सब.घोषणा के नोटबंदी से का संबंध ? ई त बजटवा मे भी कर सकते थे । कैश की कमी से अभियो लोग परेशान हैं । कल ही देखा न कि छत्तीसगढ़ मे किसानों को सब्जियों का दाम बहुत ही कम मिल रहा था , त उन लोगन ने मुफ्ते मे बाँट दीहिन । लम्बी लम्बी लाइन लगी थी । "
" ईहे से त साहब कैशलेस की.....।"
" फिर वोही बकवास ! ऊ तो होइए रहा है भाई ! मरता का न करता । लेकिन ईहे कैशलेस तरीका से पार्टियो सब चंदा लें ....ई बात पर साँप काहे सूँघ जाता है , बोलो । ई पर साहेब काहे न कुछ बोलिन ?"
पांडे के पास इसका कोई जवाब नहीं था । उसने पलट वार करते हुए कहा - " ठीक है ऊ नहीं बोलिन ... बाकि जो विरोधी दल हैं , ऊहे लोग काहे न माँग कीहिन कि चंदा भी कैशलेस हो ? "
" ऊ सबके त साहेब बेईमान घोषित कर ही दीहिन है । देख , पावर इनके पास है - बना दें कानून , लावें अध्यादेश ।"
" ऊहो होगा ...! " पांडे ने उठते हुए कहा - " चलें , अब कुछ घर का काम भी निपटायें । "
तभी मनुआ को मेरा ख्याल आया ।
" और बाबूजी , किधर से आना हो रहा है । "
" सुभाष चौक से आ रहा हूँ भाई ! और सुनाओ , कैसा चल रहा है ? "
" ठीक ही है । पेंशन तथा समान काम का समान वेतन के सवाल पर मजदूरों को लामबंद किया जा रहा है । "
" अच्छी बात है भाई , वगैर संघर्ष के तो कुछ भी नहीं मिलने वाला । "
" हाँ बाबूजी ! आने वाले दिन और भी कठिन होंगे । "

Comments

Popular posts from this blog

हो वर्ष नव

हो वर्ष नव हो हर्ष नव हो ‌‌सृजन नवल हो गीत नया  नव ताल - सुर संगीत नया  नूतन जीवन  हो रंग नया  नव नव विहंग नव नव कलरव नव पुष्प खिलें नव नव पल्लव  हो वर्ष नव हो हर्ष नव हालात नए ललकार नई कर ले स्वीकार  मत मान हार  उम्मीद नई  संकल्प नया  प्रज्ज्वलित कर एक दीप नया  हो तम  विनाश हो तम विनाश हो वर्ष नव हो हर्ष नव --- कुमार सत्येन्द्र

मार्क्सवादी राजनीतिक अर्थशास्त्र

मार्क्सवादी राजनैतिक अर्थशास्त्र!  सवाल ये उठता है कि मार्क्सवादी राजनैतिक अर्थशास्त्र ही क्यूँ? जवाब है कि मार्क्सवादी राजनैतिक अर्थशास्त्र हमें पूँजीवादी व्यवस्था का शोषण, विकास और उसके संकट को समझने में मदद करता है। यह समाज के आर्थिक आधार का अध्ययन करता है और इसीलिए उनके लिए ज़रूरी है जो सामाजिक बदलाव के लिए संघर्ष करते हैं। बुर्ज़ुआ अर्थशास्त्र, जो कि हमारे विश्वविद्यालयों में पढ़ाया जाता है, की तरह मार्क्सवादी अर्थशास्त्र ये दिखावा नहीं करता कि वह सभी सामाजिक व्यवस्थाओं की विश्वव्यापी आर्थिक नियमों   की खोज करने की कोशिश करता है। मार्क्सवादी विश्लेषण के अनुसार हर उत्पादन के तरीक़े का अपना विशिष्ट नियम होता है। इसी कारण मार्क्सवादी विश्लेषण के इस विज्ञान को हम राजनैतिक अर्थशास्त्र कहते हैं।  इस विषय पर मार्क्स से लेकर लेनिन ने बहुत कुछ लिखा है परंतु हम आसान तरीक़े से राजनैतिक अर्थशास्त्र के निम्नलिखित चार सवालों तक ही खुद को सीमित रखेंगे - 1. पूंजीवादी अर्थव्यव्स्था वह उत्पादन का तरीक़ा है जहां पूँजीपति वर्ग उत्पादन के साधनों के मालिक होते हैं वो उत्पादन के लिए म...

पहचान की राजनीति

## पहचान की राजनीति बनाम वर्गाधारित राजनीति। ## पहचान की राजनीति का मतलब क्या है ? उत्तर आधुनिकता की ही तरह पूंजीवादी सिद्धांतों से निकली पहचान की राजनीति मार्क्सवाद का विकल्प होने का दावा करती है। यह मानती है कि राजनीति और भौतिक परिस्थितियों के बीच कोई रिश्ता नहीं होता। यह एक ऐसे समाज की परिकल्पना करती है जो तमाम तरह के शोषण और आपसी शत्रुता पर टिका है। इसमें यह सोच निहित है कि जातीयता, धर्म, नस्ल या लैंगिकता आदि से जुड़े शोषण व आपसी शत्रुता का भौतिक परिस्थितियों से कोई रिश्ता नहीं होता। यह पूरी तरह से व्यक्तिगत तौर पर महसूस किया जाता है। पहचान एक व्यक्ति द्वारा उसके उत्पीड़न के अनुभव के आधार पर बनती है और पूरी तरह से आत्मपरक और स्वायत्त होती है।  यह किसी भी समाज के वर्ग विभाजन पर आधारित विश्लेषण को अस्वीकार करता है। पहचान की राजनीति के अनुसार समाज में मुख्य विभाजन है -- व्यक्तिगत रूप से उत्पीड़न सहन करने वालों और बाकि सभी उनलोगों के बीच जिन्होंने उत्पीड़न का अनुभव नहीं किया है। उदाहरण के लिए पहचान की राजनीति के सिद्धांतों के अनुसार जातिगत उत्पीड़न का अनुभव करने वाला एक दलित मजदूर...