जब मैं मनुआ के घर पहुँचा तो वह पांडे के साथ बहस मे उलझा हुआ था ।
" अब चाहे कुछ भी कहो पांडे भाई , कल के भाषण मे ऊ बात नहीं था । हाँ, जुमलाबाजी खूब कीहिन । नोटबंदिया से का नफा-नुकसान हुआ , ऊ पर त चुप्पी साध लीहिन ।"
" अरे, अब आउर केतना बताते । कह तो दीहिन कि जेतना काला धन मार्किट मे रहा , ऊ सब बैंक मे आ गया । तभिए त गरीब जनता को राहत देने मे सुविधा हो रही है ।"
" राहत - सुविधा नाहीं , मजाक कीहिन है । जेकरा पास जमीन ही नहीं है , ऊ लोन लेके मकान कहाँ बनायेगा ? नोटबंदी के कारण मार्केट मे अतना मंदी है कि आउर लोन कोई छोटा बेपारी नाहीं लेगा । वोही हाल छोटका उद्यमी सबके है । सबके भट्ठा बइठा दीहिन है ।"
" गरभवती महिलाओं को त 6000/- रुपये दे रहे हैं न ? आउर किसान के करजा पर 60 दिन के सूद माफ कर दीहिन , वरिष्ठ नागरिक के जमा पइसा पर सूद दर बढ़ा दीहिन । "
" अरे भाई , ई सब.घोषणा के नोटबंदी से का संबंध ? ई त बजटवा मे भी कर सकते थे । कैश की कमी से अभियो लोग परेशान हैं । कल ही देखा न कि छत्तीसगढ़ मे किसानों को सब्जियों का दाम बहुत ही कम मिल रहा था , त उन लोगन ने मुफ्ते मे बाँट दीहिन । लम्बी लम्बी लाइन लगी थी । "
" ईहे से त साहब कैशलेस की.....।"
" फिर वोही बकवास ! ऊ तो होइए रहा है भाई ! मरता का न करता । लेकिन ईहे कैशलेस तरीका से पार्टियो सब चंदा लें ....ई बात पर साँप काहे सूँघ जाता है , बोलो । ई पर साहेब काहे न कुछ बोलिन ?"
पांडे के पास इसका कोई जवाब नहीं था । उसने पलट वार करते हुए कहा - " ठीक है ऊ नहीं बोलिन ... बाकि जो विरोधी दल हैं , ऊहे लोग काहे न माँग कीहिन कि चंदा भी कैशलेस हो ? "
" ऊ सबके त साहेब बेईमान घोषित कर ही दीहिन है । देख , पावर इनके पास है - बना दें कानून , लावें अध्यादेश ।"
" ऊहो होगा ...! " पांडे ने उठते हुए कहा - " चलें , अब कुछ घर का काम भी निपटायें । "
तभी मनुआ को मेरा ख्याल आया ।
" और बाबूजी , किधर से आना हो रहा है । "
" सुभाष चौक से आ रहा हूँ भाई ! और सुनाओ , कैसा चल रहा है ? "
" ठीक ही है । पेंशन तथा समान काम का समान वेतन के सवाल पर मजदूरों को लामबंद किया जा रहा है । "
" अच्छी बात है भाई , वगैर संघर्ष के तो कुछ भी नहीं मिलने वाला । "
" हाँ बाबूजी ! आने वाले दिन और भी कठिन होंगे । "
## पहचान की राजनीति बनाम वर्गाधारित राजनीति। ## पहचान की राजनीति का मतलब क्या है ? उत्तर आधुनिकता की ही तरह पूंजीवादी सिद्धांतों से निकली पहचान की राजनीति मार्क्सवाद का विकल्प होने का दावा करती है। यह मानती है कि राजनीति और भौतिक परिस्थितियों के बीच कोई रिश्ता नहीं होता। यह एक ऐसे समाज की परिकल्पना करती है जो तमाम तरह के शोषण और आपसी शत्रुता पर टिका है। इसमें यह सोच निहित है कि जातीयता, धर्म, नस्ल या लैंगिकता आदि से जुड़े शोषण व आपसी शत्रुता का भौतिक परिस्थितियों से कोई रिश्ता नहीं होता। यह पूरी तरह से व्यक्तिगत तौर पर महसूस किया जाता है। पहचान एक व्यक्ति द्वारा उसके उत्पीड़न के अनुभव के आधार पर बनती है और पूरी तरह से आत्मपरक और स्वायत्त होती है। यह किसी भी समाज के वर्ग विभाजन पर आधारित विश्लेषण को अस्वीकार करता है। पहचान की राजनीति के अनुसार समाज में मुख्य विभाजन है -- व्यक्तिगत रूप से उत्पीड़न सहन करने वालों और बाकि सभी उनलोगों के बीच जिन्होंने उत्पीड़न का अनुभव नहीं किया है। उदाहरण के लिए पहचान की राजनीति के सिद्धांतों के अनुसार जातिगत उत्पीड़न का अनुभव करने वाला एक दलित मजदूर...
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