जब मैं मनुआ के घर पहुँचा , तो वह मोबाईल फोन मे कुछ देख रहा था । पास ही एक व्यक्ति खड़ा था । मैने पूछा - " क्या हो रहा है भाई ? "
" अच्छा समय पर आये बाबूजी । ई हैं हमरे रामू भाई । कल इनको का मन मे आया कि कारड से मोटरसाइकिल मे तेल भरवा लीहिन । तेल लीहिन एक हजार के बाकि बैंकवा काट लीहिस एक हजार अठ्ठाइस रुपया । अब ई हमरा से पूछ रहिन है कि ई काहे हुआ ? हमहूं चेक किए त सही मे ....।"
" अरे भाई , अधिक जो कटा है वह ट्रांजैक्शन चार्ज है । "
" लेकिन साहेब त टीविया पर बोलिन थे कि ....।"
" कोई चार्ज नहीं लगेगा , यही न ? आगे यह भी बोले थे कि 30 दिसंबर तक , न कि सब दिन । कल मैं एक दूकान मे कुछ खरीदने गया था । उसके पास स्वाइप मशीन था , सो मैने कहा कि चलो भाई आज मैं भी कार्ड से ही भुगतान कर देता हूँ । इस पर उसने झिझकते हुए कहा कि सर , अगर कैश है तो ...। मैने पूछा कि इसमें क्या हर्ज है , तो कहने लगा कि सर बैंक इसका चार्ज काट लेता है ...कोई डेढ़ से दो परसेंट ...अब आप ही बताइए कि हम अपने मुनाफा से क्या क्या और कितने तरह का टैक्स दें । "
" एकर मतलब कि इहो फेल ! बाबूजी ! अब तक सरकार ने ई त नहिये बताया कि केतना कालाधन पकड़ाया । बाकि अपन पीठ खूबे थपथपा रहिन है , जइसे कि कउनो बड़का तीर मार दीहिन है । "
" भाई ! इन्होंने ऐसी राजनीति शुरू की है कि विरोधी दल के लिए मुश्किल हो रहा है । मीडिया के समर्थन से अपने विरोधी को देश का विरोधी बना दे रहे हैं ....यहाँ तक कि देशद्रोही भी कहवा रहे हैं । प्रचार तंत्र इतना तगड़ा कि लोग पूरी तरह भ्रमित हैं । उन्हें विश्वास हो गया है कि इसके बाद कुछ अच्छा होने वाला है । "
" अइसा नहीं है बाबूजी ....लोग भीतरे भीतर उबल रहे हैं , बस मौके की तलाश है । "
" तो मौका भी आ ही गया है मनुआ । पाँच राज्यों मे चुनाव होने जा रहे हैं । अगर जनता सचमुच त्रस्त है तो इन्हें सबक जरूर सिखायेगी । "
" ऊ त है बाबूजी ...लेकिन विकल्पो चाहीं न ! "
मनुआ के मन मे संशय के भाव थे । विकल्प का अर्थ वैकल्पिक नीतियों से था , न कि विपक्षी दल से ।
" क्यों , इतनी सारी पार्टियां हैं ....क्या वे विकल्प नहीं हैं ? "
" नहीं बाबूजी , इन सबहन की आर्थिक नीतियां एक हीं है - मजदूर - किसान विरोधी । "
" तो क्या एक भी पार्टी मजदूर - किसान समर्थक नहीं है ? "
" है क्यों नहीं बाबूजी । लेकिन ओकर परभाव जनता पर जे चाहीं ,ऊ नाहीं है । आउर ईहे भारी चिन्ता के बात है ।"
" कारण क्या है भाई ? "
" एकरे पड़ताल त करे के है बाबूजी ! आखिर आइसन काहे है कि जौन पार्टी के सब नेता साफ - सुथरा छबि के हैं आउर जे हमेशा मजदूर - किसान के संघर्ष मे रह हे , ओकरा पर जनता के भरोसा काहे न है ? "
" बहुत ही उचित सवाल है तुम्हारा भाई और मैं सोचता हूँ कि इस प्रश्न से बहुत सारे हमारे नेता टकरा रहे होंगे । खैर , यह बताओ कि कल मजदूर मैदान मे जो कन्वेंशन होने जा रहा है , उसकी जानकारी तुम्हें है न ? "
" बिलकुल है बाबूजी ...कल ग्यारह बजे , है न ? "
" हाँ तो सभी साथियों को सूचित कर देना ,.ठीक है । "
" सुन लिये न रामू भाई , कल चलना है । "
" कल ऊहाँ कउना चीज पर बात होना है ? "
" हमनी के पेंशन आउर समान कमवा के समान वेतनवा पर बातचीत होगी ...आउर आगे के लड़ाई पर भी विचार होगा । "
" ई बात , तब त चलना ही होगा न । "
मार्क्सवादी राजनैतिक अर्थशास्त्र! सवाल ये उठता है कि मार्क्सवादी राजनैतिक अर्थशास्त्र ही क्यूँ? जवाब है कि मार्क्सवादी राजनैतिक अर्थशास्त्र हमें पूँजीवादी व्यवस्था का शोषण, विकास और उसके संकट को समझने में मदद करता है। यह समाज के आर्थिक आधार का अध्ययन करता है और इसीलिए उनके लिए ज़रूरी है जो सामाजिक बदलाव के लिए संघर्ष करते हैं। बुर्ज़ुआ अर्थशास्त्र, जो कि हमारे विश्वविद्यालयों में पढ़ाया जाता है, की तरह मार्क्सवादी अर्थशास्त्र ये दिखावा नहीं करता कि वह सभी सामाजिक व्यवस्थाओं की विश्वव्यापी आर्थिक नियमों की खोज करने की कोशिश करता है। मार्क्सवादी विश्लेषण के अनुसार हर उत्पादन के तरीक़े का अपना विशिष्ट नियम होता है। इसी कारण मार्क्सवादी विश्लेषण के इस विज्ञान को हम राजनैतिक अर्थशास्त्र कहते हैं। इस विषय पर मार्क्स से लेकर लेनिन ने बहुत कुछ लिखा है परंतु हम आसान तरीक़े से राजनैतिक अर्थशास्त्र के निम्नलिखित चार सवालों तक ही खुद को सीमित रखेंगे - 1. पूंजीवादी अर्थव्यव्स्था वह उत्पादन का तरीक़ा है जहां पूँजीपति वर्ग उत्पादन के साधनों के मालिक होते हैं वो उत्पादन के लिए म...
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