संभावनाएं अनंत थीं
कल्पनाएं अवश्य ही लेतीं आकार
सपने होते साकार
जो लालच के वृक्ष नहीं उगते
स्वार्थ के नागफणि कुचले जाते
सिर्फ मुनाफे की डोर से
नहीं बंधा होता व्यापार
और बंद होता धर्म का
सियासी इस्तेमाल
पूजा दौलत की नहीं
होती मनुष्यता की
तब वह जार - जार न रोती
न ही तड़पती भूख से
न ठंड से ठिठुरती
तब सचमुच होती
हर सुबह एक नई सुबह
हर साल एक नया साल
---- कुमार सत्येन्द्र
हो वर्ष नव हो हर्ष नव हो सृजन नवल हो गीत नया नव ताल - सुर संगीत नया नूतन जीवन हो रंग नया नव नव विहंग नव नव कलरव नव पुष्प खिलें नव नव पल्लव हो वर्ष नव हो हर्ष नव हालात नए ललकार नई कर ले स्वीकार मत मान हार उम्मीद नई संकल्प नया प्रज्ज्वलित कर एक दीप नया हो तम विनाश हो तम विनाश हो वर्ष नव हो हर्ष नव --- कुमार सत्येन्द्र
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