जब मैं मनुआ के घर पहुँचा तो वह पांडे के साथ कल पेश हुए बजट पर चर्चा कर रहा था ।पांडे बहुत ही जोश मे दिख रहा था - " अब एकरा से बढ़िया बजट का होता , बोलो ? गाँव के विकास खातिर पइसा बढ़ा दीहिन ......मनरेगवा मे त ढेरे बढ़ाइन हैं... पटवन खातिर अबतक 10 लाख पोखरा - पोखरी बनवाइन है आउर ई साल 5 लाख बने के जोजना है .....किसान , गरीब , दलित , महिला , छात्र - नौजवान सबके खातिर कुछ न कुछ कीहिन है इंतजाम ..आ सबसे बड़ बात त ई है कि रेलवा के भाड़ा नहीं बढ़ाइन है ...।"
" रेल का भाड़ा का रोजे बढ़ायेंगे !...अब त ऊ साल मे कभियो बढ़ जाता है .... बाकि ई न बताओ कि ओह के चलावे मे जे सुरक्षा चाहीं , ऊ पर खर्चा कर रहिन है कि न ...कोच , वैगन आउर गाड़ियों की संख्या केतना बढ़ाइन है ..ई नोटबंदिया मे जे छोटे - छोटे उद्योगपति, किसान परभावित हुए ...लाखों लोगों का रोजगार गया , ऊ पर कुछ बोलिन ...कोई राहत दीहिन कि न ? ...आउर ऊ का कहते हैं , बैंकवा के पइसा लेके जे बाबू लोग बइठे हैं , ओकरा असूले खातिर का कर रहिन है ? ...मालूम है कि नहीं ई साल का कुल बजटवा लगभग 24 लाख करोड़ का है आउर बैंकवा का खाली सात - आठ कंपनी पर बकाया लगभग 11 लाख करोड़ है ...ओतने असूल लेते त .....।"
" ऊ भी वसूलेंगे भाई ...ई दफा पूरा जोर गांव आ किसान पर है । "
" अच्छा , त किसान का करजा माफ हो गया का ? "
" शायद 60 दिन का जे सूद था , ऊ माफ कीहिन है , बाकि सिंचाई आउर बीमा का परबंध कीहिन है । "
" अरे भाई , अइसन घोषणा हर साल होता है । लेकिन बाद मे कोई जिक्रे नहीं करता कि काम हुआ केतना । अब ईहे तलबवा को लो न ...10 लाख के माने कि हर गांव मे एक या दू ठो....पर अइसा कहीं दिखता है का ...एकर रेकाड खाली कागजे पर त न है । "
" अरे , आउर एक ठो बड़का काम हुआ है ..... आय कर मे छूट दीहिन है ...। "
" अरे पांडे भइया , ई से हमरा तोरा का फायदा हुआ ? हँ.. ई बताओ कि समान काम के समान वेतनवा दे रहिन है का .....हमनी सब के कम से कम महीना मे 18000/- रु. वेतन करवा दीहिन का ? वइसे ई ससुरा आय कर वोला हिसबवा हमरा कुछो न बुझाता है । ई बारे मे बाबूजी कुछ बतावें त हमहूं समझें । "
" देखो भाई , 3 लाख से 5 लाख तक के आय पर छूट दी गई है - 5 % ही आयकर होगा और इसके कारण सरकार के राजस्व मे लगभग 20 हजार करोड़ रुपये की कमी होगी , किन्तु इसकी भरपाई सरकार अप्रत्यक्ष कर , जैसे सर्विस टैक्स, कस्टम और एक्साइज ड्यूटी बढ़ाकर करेगी और अनुमान है कि अप्रत्यक्ष कर से सरकार को 60 हजार करोड़ रुपए राजस्व की प्राप्ति होगी ... जानते हो , इस अप्रत्यक्ष कर का बोझ कौन उठाता है ? ....आम आदमी यानी कि हम सब । "
" ऊ त हर साल बजटवा मे ईहे होता है ....अच्छा बाबूजी , रोजी - रोजगार , शिक्षा - स्वास्थ्य के लिए कुछ खास है कि नहीं ई बजटवा मे ? "
" देखो भाई , रोजी - रोजगार की व्यवस्था का मतलब है कि सरकार कल - कारखाना खोले , खर - खदान चालू करे , इन क्षेत्रों मे निवेश करे । किन्तु सरकार तो निवेश के लिए देशी - विदेशी निजी पूंजी की ओर ताक रही है । अपनी यानी जनता की पूंजी से लगे कल - कारखानों व खदानों को बेंच रही है , तो ऐसे मे हम क्या उम्मीद करें । "
" एकर मतलब कि रोजगार खातिर मारा मारी आउर बढ़ेगी .... त ई अब साफे दिख रहा है कि समान काम का समान बेतनवा त दूर ई सरकार 18 हजार वेतन भी नहीं करेगी .... का पांडे भइया , कुछ बुझा रहा है कि नहीं ? "
" अरे भाई , देश चलावे खातिर एतना बड़े - बड़े दिमाग लगे हैं त हम फालतू मे अप्पन खून काहे जरावें । " ----पांडे ने उठते हुए जवाब दिया ।
" खून जरावे के बात छोड़ भइया ...ऊ त हम रोजे जराते हैं ....आ ओकरा से जे फायदा होता है , ऊ सब मालिक आउर ठीकदार के जेब मे चल जाता है । "
" एकरे नसीब कहते हैं मनुआ .....। " --- कहते हुए पांडे चल दिया ।
" नसीब न पांडे भइया ...ईहे है सोसन आउर एकरे खिलाफ हमरी लड़ाई है । "--- मनुआ ने हँसते हुए कहा ।
मैने मनुआ की पीठ थपथपाई और हम दोनों यूनियन ऑफिस की ओर चल दिये ।
## पहचान की राजनीति बनाम वर्गाधारित राजनीति। ## पहचान की राजनीति का मतलब क्या है ? उत्तर आधुनिकता की ही तरह पूंजीवादी सिद्धांतों से निकली पहचान की राजनीति मार्क्सवाद का विकल्प होने का दावा करती है। यह मानती है कि राजनीति और भौतिक परिस्थितियों के बीच कोई रिश्ता नहीं होता। यह एक ऐसे समाज की परिकल्पना करती है जो तमाम तरह के शोषण और आपसी शत्रुता पर टिका है। इसमें यह सोच निहित है कि जातीयता, धर्म, नस्ल या लैंगिकता आदि से जुड़े शोषण व आपसी शत्रुता का भौतिक परिस्थितियों से कोई रिश्ता नहीं होता। यह पूरी तरह से व्यक्तिगत तौर पर महसूस किया जाता है। पहचान एक व्यक्ति द्वारा उसके उत्पीड़न के अनुभव के आधार पर बनती है और पूरी तरह से आत्मपरक और स्वायत्त होती है। यह किसी भी समाज के वर्ग विभाजन पर आधारित विश्लेषण को अस्वीकार करता है। पहचान की राजनीति के अनुसार समाज में मुख्य विभाजन है -- व्यक्तिगत रूप से उत्पीड़न सहन करने वालों और बाकि सभी उनलोगों के बीच जिन्होंने उत्पीड़न का अनुभव नहीं किया है। उदाहरण के लिए पहचान की राजनीति के सिद्धांतों के अनुसार जातिगत उत्पीड़न का अनुभव करने वाला एक दलित मजदूर...
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