जब मैं मनुआ के घर पहुँचा तो उसे बहुत ही परेशान पाया । देखते ही बोला - " बाबूजी ! कल रतिए से होश मे नहीं हैं...ऊ का हुआ कि कल सरसती जी के मूर्ति का भसान था ...भसान समझते हैं न ...ऊ का कहते हैं ...विसरजन था । पहिले जे पूजा खाली स्कूलिया मे होती थी , अब गलिए - गलिए लड़िकन कर रहिन है । त कल संझिया मे ओकरे जुलूस निकलल रहिस ..अरे जुलूस का था बाबूजी ....बस समझिए कि लड़िकन का लफंगई था ..ई कउनो पूजा-पाठ का तरीका है कि तीन - चार दिन खूब जोर - जोर से लाऊडस्पीकर पर असलील गाना आउर कनफोड़वा मुजिक बजाव ,...हमरा त बुझाता है कि अइसन बाताबरन मे सरसती आयेंगी का , उलटे भाग जायेंगी ।"
" आखिर हुआ क्या भाई , तुम क्यों परेशान हो ? "
" हुआ ई बाबूजी कि जुलूसवा मे गाना के धुन पर लड़िकन सब उछल - कूद कर रहिन थे ..ईहे बीच दू ठो लड़िकन आपसे मे भीड़ गए ....आउर देखते - देखते लड़िकन का दू ठो ग्रुप हो गया । "
" फिर...? "
" फिर का जम के ईंटा -ढेला चला । पूजा के नाम पर खूबे लफंगई हुआ । एतने मे किसी ने पुलिस को फोन कर दिया आउर पुलिस आ धमकी । "
" अच्छा हुआ , तो पुलिस ने बदमाश लड़कों को ....।"
" ईहे त न हुआ बाबूजी , लफंगवन त नौ दो ग्यारह हो गए आउर दूसरे ही सबको पुलिस पकड़ लीहिस । अब समझिए कि ऊ सबके माय - बाप परेशान । फिर हम सब लोग ऊहे रात के थाना गए ...बड़ी देर तक चिरौरी करे के बाद ऊ सब को छुड़ा पाए । "
इस बीच पांडे भी आकर बैठ चुका था और मनुआ की बात सुन रहा था । उसके चुप होते ही पांडे शुरु हो गया - " अरे भाई , परब - त्योहार मे ई सब होता ही रहता है ...ऊ त खैर मनाओ कि कउनो का कान - कपार न फूटा । "
" का कहते हो पांडे भइया ! परब - तयोहार मे ईहे सब ...अरे परब - तयोहार मे त हरख - उलास होना चाहिए...सबके बीच परेम होना चाहिए । लेकिन ई बजार आउर बेपार सब चउपट कर दीहिस है ...अब त धार्मिक गुरु लोग भी बेपार शुरु कर दीहिन है ।"
" देखो मनुआ , धरम के खिलाफ एको लबज हम बर्दाश्त नहीं करेंगे ....हँ ..कान खोल के सुन लो । "
" अरे पांडे भइया , धरम का मरम भी जानते हो कि बस अप्पन स्वारथे जानते हो ! सब धरम का मरम एके है - परेम , दया आउर त्याग ....क्रोध आ हिंसा के त कउनो जगहे न होना चाहीं । लेकिन ऊ का है न कि अब सब धरम खाली भरम बन के रह गया है ...अप्पन - अप्पन दूकान ...अप्पन - अप्पन भगवान ! संत - सन्यासी , मोलबी - पादरी सब के रहन - सहन देखो न ....कितनी ऊ का कहते हैं , लक्जरियस है ! "
" अब देखो , ईहे सब हम नहीं सुनना चाहते हैं ...ईश निंदा सुने से बहुत पाप लगता है ....। "
" फिर वोही भरम ! ई ईश निंदा न है भइया , ई है धार्मिक ढकोसला के निंदा ...ई गुरु लोग धार्मिक आडंबर आउर अंधविश्वास के पट्टी हमनी के आँख पर बान्ह के अप्पन दूकान चमका रहिन है आउर हम सब के भाग आ भगवान के चक्कर मे डाल के मालिक लोगन के करनी पर परदा डाल रहिन है । "
" अब चुप कर भाई ....हे भगवान , सही मे घोर कलजुग आ गया ...। " --- कहते हुए पांडे उठा और तेजी से चल दिया । मैंने हँसते हुए मनुआ से पूछा - " धर्म के बारे मे इतनी बारीकियाँ कहाँ से जाना भाई ? "
" बाबूजी ! ऊ का है न कि कबो - कबो फुरसत मिलता है त अप्पन जनवादी लेखक संघ के बैठकवा मे जाके बइठ जाते हैं ....ऊ लोग के बीच भी खूबे गियान के बात होती है । " ---- मनुआ के कहने के ढंग पर मुझे हँसी आ गई और हम दोनों हँसते हुए पार्टी दफ्तर की ओर चल दिये ।
मार्क्सवादी राजनैतिक अर्थशास्त्र! सवाल ये उठता है कि मार्क्सवादी राजनैतिक अर्थशास्त्र ही क्यूँ? जवाब है कि मार्क्सवादी राजनैतिक अर्थशास्त्र हमें पूँजीवादी व्यवस्था का शोषण, विकास और उसके संकट को समझने में मदद करता है। यह समाज के आर्थिक आधार का अध्ययन करता है और इसीलिए उनके लिए ज़रूरी है जो सामाजिक बदलाव के लिए संघर्ष करते हैं। बुर्ज़ुआ अर्थशास्त्र, जो कि हमारे विश्वविद्यालयों में पढ़ाया जाता है, की तरह मार्क्सवादी अर्थशास्त्र ये दिखावा नहीं करता कि वह सभी सामाजिक व्यवस्थाओं की विश्वव्यापी आर्थिक नियमों की खोज करने की कोशिश करता है। मार्क्सवादी विश्लेषण के अनुसार हर उत्पादन के तरीक़े का अपना विशिष्ट नियम होता है। इसी कारण मार्क्सवादी विश्लेषण के इस विज्ञान को हम राजनैतिक अर्थशास्त्र कहते हैं। इस विषय पर मार्क्स से लेकर लेनिन ने बहुत कुछ लिखा है परंतु हम आसान तरीक़े से राजनैतिक अर्थशास्त्र के निम्नलिखित चार सवालों तक ही खुद को सीमित रखेंगे - 1. पूंजीवादी अर्थव्यव्स्था वह उत्पादन का तरीक़ा है जहां पूँजीपति वर्ग उत्पादन के साधनों के मालिक होते हैं वो उत्पादन के लिए म...
Comments
Post a Comment