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मनुआ - 17

जब मैं मनुआ के घर पहुँचा तो उसे बहुत ही परेशान पाया । देखते ही बोला - " बाबूजी ! कल रतिए से होश मे नहीं हैं...ऊ का हुआ कि कल सरसती जी के मूर्ति का भसान था ...भसान समझते हैं न ...ऊ का कहते हैं ...विसरजन था । पहिले जे पूजा खाली स्कूलिया मे होती थी , अब गलिए - गलिए लड़िकन कर रहिन है । त कल संझिया मे ओकरे जुलूस निकलल रहिस ..अरे जुलूस का था बाबूजी ....बस समझिए कि लड़िकन का लफंगई था ..ई कउनो पूजा-पाठ का तरीका है कि तीन - चार दिन खूब जोर - जोर से लाऊडस्पीकर पर असलील गाना आउर कनफोड़वा मुजिक बजाव ,...हमरा त बुझाता है कि अइसन बाताबरन मे सरसती आयेंगी का , उलटे भाग जायेंगी ।"
" आखिर हुआ क्या भाई , तुम क्यों परेशान हो ? "
" हुआ ई बाबूजी कि जुलूसवा मे गाना के धुन पर लड़िकन सब उछल - कूद कर रहिन थे ..ईहे बीच दू ठो लड़िकन आपसे मे भीड़ गए ....आउर देखते - देखते लड़िकन का दू ठो ग्रुप हो गया । "
" फिर...? "
" फिर का जम के ईंटा -ढेला चला । पूजा के नाम पर खूबे लफंगई हुआ । एतने मे किसी ने पुलिस को फोन कर दिया आउर पुलिस आ धमकी । "
" अच्छा हुआ , तो पुलिस ने बदमाश लड़कों को ....।"
" ईहे त न हुआ बाबूजी , लफंगवन त नौ दो ग्यारह हो गए आउर दूसरे ही सबको पुलिस पकड़ लीहिस । अब समझिए कि ऊ सबके माय - बाप परेशान । फिर हम सब लोग ऊहे रात के थाना गए ...बड़ी देर तक चिरौरी करे के बाद ऊ सब को छुड़ा पाए । "
इस बीच पांडे भी आकर बैठ चुका था और मनुआ की बात सुन रहा था । उसके चुप होते ही पांडे शुरु हो गया - " अरे भाई , परब - त्योहार मे ई सब होता ही रहता है ...ऊ त खैर मनाओ कि कउनो का कान - कपार न फूटा । "
" का कहते हो पांडे भइया ! परब - तयोहार मे ईहे सब ...अरे परब - तयोहार मे त हरख - उलास होना चाहिए...सबके बीच परेम होना चाहिए । लेकिन ई बजार आउर बेपार सब चउपट कर दीहिस है ...अब त धार्मिक गुरु लोग भी बेपार शुरु कर दीहिन है ।"
" देखो मनुआ , धरम के खिलाफ एको लबज हम बर्दाश्त नहीं करेंगे ....हँ ..कान खोल के सुन लो । "
" अरे पांडे भइया , धरम का मरम भी जानते हो कि बस अप्पन स्वारथे जानते हो ! सब धरम का मरम एके है - परेम , दया आउर त्याग ....क्रोध आ हिंसा के त कउनो जगहे न होना चाहीं । लेकिन ऊ का है न कि अब सब धरम खाली भरम बन के रह गया है ...अप्पन - अप्पन दूकान ...अप्पन - अप्पन भगवान ! संत - सन्यासी , मोलबी - पादरी सब के रहन - सहन देखो न ....कितनी  ऊ का कहते हैं , लक्जरियस है ! "
" अब देखो , ईहे सब हम नहीं सुनना चाहते हैं ...ईश निंदा सुने से बहुत पाप लगता है ....। "
" फिर वोही भरम ! ई ईश निंदा न है भइया , ई है धार्मिक ढकोसला के निंदा ...ई गुरु लोग धार्मिक आडंबर आउर अंधविश्वास के पट्टी हमनी के आँख पर बान्ह के अप्पन दूकान चमका रहिन है आउर हम सब के भाग आ भगवान के चक्कर मे डाल के मालिक लोगन के करनी पर परदा डाल रहिन है । "
" अब चुप कर भाई ....हे भगवान , सही मे घोर कलजुग आ गया ...। " --- कहते हुए पांडे उठा और तेजी से चल दिया । मैंने हँसते हुए मनुआ से पूछा - " धर्म के बारे मे इतनी बारीकियाँ कहाँ से जाना भाई ? "
" बाबूजी ! ऊ का है न कि कबो - कबो फुरसत मिलता है त अप्पन जनवादी लेखक संघ के बैठकवा मे जाके बइठ जाते हैं ....ऊ लोग के बीच भी खूबे गियान के बात होती है । " ---- मनुआ के कहने के ढंग पर मुझे हँसी आ गई और हम दोनों हँसते हुए पार्टी दफ्तर की ओर चल दिये ।

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