जब मैं मनुआ के घर पहुँचा तो देखा कि वह पांडे से बहस मे उलझा हुआ है । मनुआ - " त साहेब को के रोक रहा है पांडे भइया , ऊ जनम पतरिया बाँच काहे नहीं देते ...कांग्रसियन को बखस काहे रहिन है भाई ? "
" अरे , देखना ...केहू न बखसाएगा ...बस सही टाइम पर साहेब अप्पन चाल चलेंगे । "
" त अभी खाली जुमलाबाजिए करेंगे ....तीन साल हो गया ...बाकि वो ही ढकवा के तीन पात ...एगो काम अइसन नाहीं कीहिन है , जेकर कि जिकिर किया जाए ...जउन कांग्रेस से मुक्ति की बात करते रहे , ओकरे नीतिया के आउर बढ़ - चढ़ के लागू कर रहिन है । "
" ई नोटबंदिया जे कीहिन , पाकिस्तान मे ऊ जे सर्जीकल एस्ट्राइक कीहिन ... ई कुल कांग्रेस की नीति है ...आ.. सउंसे संसार मे देश के डंका अइसा बजाइन है कि आज सब देशों ने हमारा लोहा मान लिया है ...बड़ी - बड़ी कंपनिया हियाँ पूंजी लगावेला दौड़ल आ रही है....ई तुमको नहीं लौकता है का ? "
" सब लौक रहा है भइया , ई त आप ठीक बोले ....सगरो घूम - घूम के इहे त कहिन है कि आओ भाई आओ ...हम तुम्हें सस्ती जमीन देंगे... सस्ता कच्चा माल देंगे ....सस्ता मजदूर देंगे ...आउर ओही मे लगे हैं ....ऊ का कहते हैं , पब्लिक सेक्टर के कल - करखाना के बेंच के ईहे बजटवा मे पचहतर हजार करोड़ जुटावे की घोषणा कीहिन है । जहाँ तक ई नोटबंदिया का सवाल है त जो कीहिन है , ओकर फल त सउंसे देशे भुगत रहा है । "
" अब तुम कुछो कहो , लेकिन साहेब जब से आइन है , देश मे एगो नया जोश भर दीहिन है ...देशभक्ति का लहर दउड़ा दीहिन है ...जे गलत - सलत इतिहास अँग्रेज आउर मार्क्स के चेला लोग लिखिन थे , ऊ भी साहेब सुधार रहिन है । "
" अब सही लैन पर आए हो भइया ! त ई सब करके इतिहास से अप्पन दामन पर लगल दाग मिटा रहिन है ...लेकिन भइया , सच सच होता है आउर झूठ झूठे होता है ...झूठ को हजारो बार सच लिखो , ऊ कबहूं सच नहीं बन सकता है । अब मान लो कि हमरा दादा कउनो कारण से चोर बन गए थे आ हम इतिहास के कितबिया मे लिख दें कि ऊ बहुत ईमानदार आउर महान समाजसेवी थे , त का ई सच बदल जायेगा कि ऊ चोर थे ? ....नहीं न । "
" त का हम चोर कहके मरलो पर उनकी ईज्जत उछालें ? "
" अप्पन पूरवज के अच्छाई - बुराई के बारे मे सही जानकारी होगी पांडे भइया , तभी न हम ओकर सही मूल्यांकन करेंगे आउर ओकरा से सबक लेंगे । "
" सबक लेवे का मतलब का है कि हम दुश्मन का गुणगान करें ? ...ओकरे प्रशस्ति पत्र लिखें आउर अप्पन बाल बच्चों को पढ़ायें ? "
" त झूठा इतिहास पढ़ा कर हम कउन उनका भला कर देंगे पांडे भइया ? "
" अरे सच्चा - झूठा का होता है ... लिखे वाला लोग कउनो अप्पन आँख से देखिन है का ? "
" नहीं भइया , लेकिन ऊ लोग बहुत तरह के साक्ष्य के आधार पर इतिहास लिखते हैं , कउनो अपनी मरजी से जे चाहें ऊ नहीं लिख सकते आउर लिख भी दें त ओकरा केहू मान्यता नहीं देगा । "
" ठीक है भाई , ओइसे हम त ईहे कहेंगे कि पहली बार कउनो सरकार बनी है , जो कि देश की परवाह करती है । "
" खाली कहे से नही न होगा पांडे भइया !..का परवाह करती है ...न त मजदूर की मजूरी बढ़ी ...न किसान को फसल का उचित दाम मिल रहा ....दुनियाभर के नौजवान बेकारी से जूझ रहिन है ...सीमा के सुरक्षा मे लगा जवान भी अपना दुखड़ा सुनाइए रहा है ...छात्र सब अलगे परेशान हैं ...आ ईहे कुल मिलके न देश बनता है भइया ...त ई सरकार कउना देश की परवाह कर रही है ?"
" अब तुमको न बुझा रहा है त हम का करें ! "
" हमको नहीं ,आपको नहीं बुझा रहा है पांडे भइया ,....आप जे ईशरवा कर रहे हैं न ...हम खूबे बूझ रहे हैं ...लेकिन ई हमनी खातिर लालीपॉप है ...फिर वोही धरम का भरम ! ...ईसे ऊपर उठिए पांडे भइया ...न त ई साहेब हमनी के लूट लूट के अंबनिया - अडणिया के घर भर देगा । "
" ऊ त हइए है ...लेकिन अप्पन धरम खातिर सभे जान दे रहा है त हम काहे न सोचें । " --- कहते हुए पांडे उठा और चल दिया । मनुआ ने मेरी ओर मुस्कुरा कर देखा ।
मैने कहा - " जानते हो मनुआ , पांडे में एक बहुत बड़ा गुण है । "
" सो क्या बाबूजी ?"
" वह यह कि वह बहस करता है और बार - बार तुम्हारे पास आता है , यह जानते हुए भी कि तुम उसके विरोधी विचार के हो ।"
" मतलब ? "
" मतलब कि उसे बहस और विचार - विमर्श मे विश्वास है यानी कि जनतंत्र मे उसकी आस्था है । "
मनुआ मेरी ओर देख कर मुस्कुरा दिया ।
मार्क्सवादी राजनैतिक अर्थशास्त्र! सवाल ये उठता है कि मार्क्सवादी राजनैतिक अर्थशास्त्र ही क्यूँ? जवाब है कि मार्क्सवादी राजनैतिक अर्थशास्त्र हमें पूँजीवादी व्यवस्था का शोषण, विकास और उसके संकट को समझने में मदद करता है। यह समाज के आर्थिक आधार का अध्ययन करता है और इसीलिए उनके लिए ज़रूरी है जो सामाजिक बदलाव के लिए संघर्ष करते हैं। बुर्ज़ुआ अर्थशास्त्र, जो कि हमारे विश्वविद्यालयों में पढ़ाया जाता है, की तरह मार्क्सवादी अर्थशास्त्र ये दिखावा नहीं करता कि वह सभी सामाजिक व्यवस्थाओं की विश्वव्यापी आर्थिक नियमों की खोज करने की कोशिश करता है। मार्क्सवादी विश्लेषण के अनुसार हर उत्पादन के तरीक़े का अपना विशिष्ट नियम होता है। इसी कारण मार्क्सवादी विश्लेषण के इस विज्ञान को हम राजनैतिक अर्थशास्त्र कहते हैं। इस विषय पर मार्क्स से लेकर लेनिन ने बहुत कुछ लिखा है परंतु हम आसान तरीक़े से राजनैतिक अर्थशास्त्र के निम्नलिखित चार सवालों तक ही खुद को सीमित रखेंगे - 1. पूंजीवादी अर्थव्यव्स्था वह उत्पादन का तरीक़ा है जहां पूँजीपति वर्ग उत्पादन के साधनों के मालिक होते हैं वो उत्पादन के लिए म...
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