आज फिर मनुआ पांडे के साथ बहस मे उलझा हुआ था , जब मैं पहुँचा ।मनुआ कुछ तैश मे था - " अइसा बोलके साहेब दुनिया को का मैसेज दे रहिन है ? ईहे न कि हमरे देश मे खूबे भ्रष्टाचार है , झूठे लोग भरे हुए हैं ...ईहाँ तक कि उनके खिलाफ चुनाव लड़े वाला लोग देश के दुश्मन हैं । "
" ई कब बोलिन है ....तू लोग खाली झूठे बोलते हो का ? "
" ई झूठ न है भइया ....कल्हे मणिपुर मे बोलिन है कि ऊहाँ सबलोगे भ्रष्ट है .... वइसे देख त भ्रष्टाचार कहंवा न है ...मध्यप्रदेश मे व्यापम जइसन घोटाला पर त आज तक एगो शबद न बोलिन है ...आउर कहिन है कि जे लोग सीमा पार के षडयंत्रकारियों का समर्थन कर रहे हैं , उनको मत चुनना ...एकर का मतलब है ? "
" हँ ..त ई मे ऊ का गलत बोलिन है .... हाले मे ऊहाँ ..दिल्ली के कउनो कौलेज मे फिर अतंकवदियन सब मीटिंग - विटिंग कर रहिन थे ...लेकिन अब पहिले वाली बात नहीं न है ...ऊ का कहते हैं , जे एन यू मे जे हुआ था , ओह के दुहराने नहीं दिया जाएगा । "
" अरे भइया , जे एन यू मे सब ईहे लोग का षडयंत्र था ...नहीं , त आजतक कोई पकड़ाया काहे नहीं ? ....जिसको पकड़े थे ...ऊहो सब छूटिए गए ...कउनो सबूत नहीं दे सके । "
" लेकिन ई लोग से खतरा त है न ....फिर इनको छूट काहे दिया जाए । "
" कउन चीज का छूट ! देश के समस्या पर बिदवान लोग बिचार - विमरश करते हैं त ई मे का गलत है ...अरे उनकर बात त सुन भाई ...गलत लगे तू भी अप्पन बात कह ... बाकि ई का कि लइकन लहका के उपदरव मचवा दो ...कौलेज मे तोड़ फोड़ कर के आयोजन रोकवा दो ...ई त सीधे सीधे तानाशाही है भइया । ...आ उधर लंदन मे जब कोई जेटली जी से पूछिस कि दिल्ली के कालेज का मामला का है ... त बोलिन कि यदि आपको विश्वास है कि आपको अपने भाषण मे देश की सम्प्रभुता पर हमला करने की आजादी है ,तो उसके जवाब के लिए भी तैयार रहना होगा । "
" हँ..., त ठीके त बोलिन ....जइसन करनी वइसन भरनी । "
" अरे भइया , जब भषणवे न हुआ त का मालूम कि लोग का बोलने वाले थे ....आउर जब भाषण का जवाब भाषण है त लात - मुक्का आ ईंटा - पत्थर काहे चला रहे हो ? ....बात से जवाब दो न । "
" हँ त अब ई समझो कि अब कउनो कमजोर सरकार न है कि लोग मनमानी कर के निकल जायेंगे । "
" त सरकार एक्शन लेवे न ...ई गुंडागर्दी काहे करवा रही है ? ....आउर .इनका से जुड़ल लोग जे पाकिस्तान के आई एस आई खातिर जसूसी करते पकड़ाइन है ....उनका ऊपर का कारवाई कर रहिन है ?....एकर जाँच ठीक से करायें न , त इनकर पार्टी आउर परिवार के बड़का - बड़का लोग भीतरे चल जायेंगे । "
" ई कुल झूठ है ... लोग पकड़ाइन है बाकि उनका ई लोग से कउनो संबंध न है ...अरे अइसा होता त पकड़ते ही काहे ।"
" अरे भइया , ई त नहिए पकड़ाते ....यदि ई लोग को पता चल जाता त सब खेल हो जाता...लेकिन ऊ त सुरक्षा से जुड़ल खुफिया एजेंसी रहा ....गड़बड़ी देखिस और तड़ से पकड़ लीहिस । "
" ई बात है त ऊ ससुर लोग गए काम से ! "
" लेकिन एकर जाँच होय के चाहीं न , हो सकता है कि ई सब तलाब के छोटका मछरिया हों आउर बड़की मछरिया बच जाय । "
" ऊ त साहेब करयबे करेंगे ......।"
" जरूरे करायेंगे ! जइसे कि व्यापम का कराइन है ....ललित मोदी कांड का कराइन ....। अरे , जउन लोकपाल के लेके दिल्ली मे ओतना ड्रामा हुआ , ऊहो आजतक नहीं बनाइन ...जबकि ऊ आंदोलन से जुड़ल एगो नेता इनकर मंत्री है आउर एगो इनकर राज्यपाल । ई खाली झूठ - मूठ जुमलाबाजिए करते फिर रहे हैं ...। "
" अब तू ढेरे बोल रहे हो मनुआ ! साहेब के बारे मे हम कुछो गलत - सलत नहीं सुन सकते । " --- पांडे गुस्से मे उठा और चल दिया । मैंने मनुआ की ओर गर्व से देखा ।वह मंद - मंद मुस्कुरा रहा था ।
मार्क्सवादी राजनैतिक अर्थशास्त्र! सवाल ये उठता है कि मार्क्सवादी राजनैतिक अर्थशास्त्र ही क्यूँ? जवाब है कि मार्क्सवादी राजनैतिक अर्थशास्त्र हमें पूँजीवादी व्यवस्था का शोषण, विकास और उसके संकट को समझने में मदद करता है। यह समाज के आर्थिक आधार का अध्ययन करता है और इसीलिए उनके लिए ज़रूरी है जो सामाजिक बदलाव के लिए संघर्ष करते हैं। बुर्ज़ुआ अर्थशास्त्र, जो कि हमारे विश्वविद्यालयों में पढ़ाया जाता है, की तरह मार्क्सवादी अर्थशास्त्र ये दिखावा नहीं करता कि वह सभी सामाजिक व्यवस्थाओं की विश्वव्यापी आर्थिक नियमों की खोज करने की कोशिश करता है। मार्क्सवादी विश्लेषण के अनुसार हर उत्पादन के तरीक़े का अपना विशिष्ट नियम होता है। इसी कारण मार्क्सवादी विश्लेषण के इस विज्ञान को हम राजनैतिक अर्थशास्त्र कहते हैं। इस विषय पर मार्क्स से लेकर लेनिन ने बहुत कुछ लिखा है परंतु हम आसान तरीक़े से राजनैतिक अर्थशास्त्र के निम्नलिखित चार सवालों तक ही खुद को सीमित रखेंगे - 1. पूंजीवादी अर्थव्यव्स्था वह उत्पादन का तरीक़ा है जहां पूँजीपति वर्ग उत्पादन के साधनों के मालिक होते हैं वो उत्पादन के लिए म...
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