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मनुआ - 21

मैं मनुआ के साथ बैठा दिल्ली की राज्य सरकार द्वारा स्वीकृत न्यूनतम वेतन पर चर्चा ही कर रहा था कि  पांडे आ धमका । उसका चेहरा कुछ लटका हुआ था । देखते हीं मनुआ ने प्रणाम किया और उदासी का कारण पूछा  -- " का हुआ भइया ...उदास काहे हैं ? "
" पहिले तू न बताओ कि तीन दिन से कहंवा गायब था ? रोजे आ आ के लौट रहे थे । " --- पांडे ने बैठते हुए कहा ।
" अइसा है न भइया कि ऊहाँ पेटरवार मे गियान बिग्यान समिति का कार्यशाला था , वोही मे तीनों दिन जाते रहे । "
" ई कवन समिति है हो , कबहूँ सुना नहीं ? ... हम त अब तक बाजार समिति , गऊ रछा समिति , धर्म रछा समिति  एही कुल जानते थे ....ई कउनो नया समिति बनी है का ? कउन धर्म के लोग ... "
" सब धरम के लोग हैं भइया ...काहे कि एकरा मे सबका हित है .... आ ई जात - धर्म ...जात - धर्म ...तनिक एह से ऊपर उठिये पांडे भइया ! हम किसान के बेटा थे आउर अब मजदूर हो गये हैं .. आगे का होगा , कुछ न मालूम ....अब त अप्पन हक - अधिकार के बारे में सोच । "
" ठीक है भाई , लेकिन ई समिति के परचार अभी न है ...हालिए में बनी है का ? "
" न भइया ...है त ढेरे दिन से .....। "
" अच्छा - अच्छा ....कउनो समाजिक काम करती त न लोग - बाग जानते । "
मनुआ ने हँसते हुए कहा - " न भइया ! ई त सुद्ध समाजिके काम करती है .... लोगन  को उनका अधिकार आउर कर्तव्य बताती है ....सरकार जे नियम - कानून जनता खातिर बनाती है न ..ओहे कुल समझाती है । "
" कउन कउन अधिकार ...तनिक हमको भी बताओ । "
" ऊ का कहते हैं ...पाँच ठो अधिकार. है न ... काम का अधिकार , भोजन का अधिकार , स्वास्थ का अधिकार , वन अधिकार आउर शिक्षा का अधिकार । "
" ई कुल सबके खातिर है कि खाली एस. सी ./ एस.टी . के ...। काहे कि सब कुछ त ओही सबके खातिर होता है न ! "
" अइसा न है भइया ...बी.पी.एलवा में खाली वोही लोग हैं का ...हँ वन का अधिकार त आदिवासिए लोग के लिए है । लेकिन अधिकार के कानून बने से का होगा भइया ...लागू भी होना चाहिए न । "
" ई हे त हम कहते हैं ..स्वास्थ का अधिकार है बाकि स्वास्थ केन्द्र मे न डागडर है , न दवाई ...शिक्षा का अधिकार है ...बाकि स्कूल के न त ढंग के भवन है , न शिक्षक ...एकर का मतलब ? "
" ईहे त समझना है भइया कि अइसा काहे है ....आउर आप जान लीजिए कि बिना लड़ाई के कउनो अधिकार नहीं मिलने वाला ....ओकरा खातिर जरूरी है कि हमलोग अप्पन एकता बनावें । "
" पढ़ाईए के त चिंता है भाई ...बेटा अब मैट्रिक पास कर जायेगा ...अब आगे का करेगा ....कौलेज मे पढ़ावे का खर्चा कहँवा से जुटायेंगे ! "
" ऊ त अब हमनी के भूल ही जाना है भइया ...कालेज की पढ़ाई महंगी त हइये है , अब सरकार आउर महंगी करती जा रही है ....समझिए कि शिक्षा का निजीकरण आउर बाजारीकरण हो रहा है ...जेकरा पास पैसा होगा , ऊ पढ़ेगा ।"
" त ई कुल त गरीब के मारहीं के उपाए है न ! सरकार का सोचती है कि हमनी के एही तरह बेवकूफ बनाती रहेगी ! "
" बनाएगी आउर हम बनेंगे ...काहे कि ऊ हम्मर नबज पकड़ लीहिस है । धरम आउर जाति के , त कहीं छेत्र आ भासा के नाम प हमनी को लड़ाती रहेगी आउर उधर अप्पन काम करती रहेगी । "
" अब तुम्हरी बतिया कुछ - कुछ सच लगने लगी है मनुआ ! लगता है कि हम सभीन को एक होना ही पड़ेगा । बाकि एक ठो बात है ...ऊ का कहते हैं , अप्पन जात - धरम त हम कबहूं न छोड़ेंगे भाई ! "
" छोड़ने को के कहता है भइया ....बाकि दूसर के जात - धरम से घिरना भी त न कीजिए न ! ..अप्पन अप्पन जात - धरम मानिए , लेकिन साझा हित जे है , ओकर लड़ाई त साझा होके लड़िए ! "
" ठीक है ...अबकी जब तुम , ऊ का कहते हैं , गियान बिग्यान समिति के कार्यक्रम मे जाओगे त हमको भी ले चलना ! नमवा से त अच्छे बुझा रहा है , तनिक कमवा त देखें ! " -- कहते हुए पांडे उठा और चल दिया ।
मैने मनुआ से कहा - " लगता है ...पांडे को भी समझ में आने लगा । "
" अभी हम कुछो न कहेंगे बाबूजी , ऊ कब पल्टी मार देंगे , कहना मुश्किल है । " मनुआ की बात पर मुझे हँसी आ गई । हम दोनो हँसने लगे ।

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