मैं मनुआ के साथ बैठा दिल्ली की राज्य सरकार द्वारा स्वीकृत न्यूनतम वेतन पर चर्चा ही कर रहा था कि पांडे आ धमका । उसका चेहरा कुछ लटका हुआ था । देखते हीं मनुआ ने प्रणाम किया और उदासी का कारण पूछा -- " का हुआ भइया ...उदास काहे हैं ? "
" पहिले तू न बताओ कि तीन दिन से कहंवा गायब था ? रोजे आ आ के लौट रहे थे । " --- पांडे ने बैठते हुए कहा ।
" अइसा है न भइया कि ऊहाँ पेटरवार मे गियान बिग्यान समिति का कार्यशाला था , वोही मे तीनों दिन जाते रहे । "
" ई कवन समिति है हो , कबहूँ सुना नहीं ? ... हम त अब तक बाजार समिति , गऊ रछा समिति , धर्म रछा समिति एही कुल जानते थे ....ई कउनो नया समिति बनी है का ? कउन धर्म के लोग ... "
" सब धरम के लोग हैं भइया ...काहे कि एकरा मे सबका हित है .... आ ई जात - धर्म ...जात - धर्म ...तनिक एह से ऊपर उठिये पांडे भइया ! हम किसान के बेटा थे आउर अब मजदूर हो गये हैं .. आगे का होगा , कुछ न मालूम ....अब त अप्पन हक - अधिकार के बारे में सोच । "
" ठीक है भाई , लेकिन ई समिति के परचार अभी न है ...हालिए में बनी है का ? "
" न भइया ...है त ढेरे दिन से .....। "
" अच्छा - अच्छा ....कउनो समाजिक काम करती त न लोग - बाग जानते । "
मनुआ ने हँसते हुए कहा - " न भइया ! ई त सुद्ध समाजिके काम करती है .... लोगन को उनका अधिकार आउर कर्तव्य बताती है ....सरकार जे नियम - कानून जनता खातिर बनाती है न ..ओहे कुल समझाती है । "
" कउन कउन अधिकार ...तनिक हमको भी बताओ । "
" ऊ का कहते हैं ...पाँच ठो अधिकार. है न ... काम का अधिकार , भोजन का अधिकार , स्वास्थ का अधिकार , वन अधिकार आउर शिक्षा का अधिकार । "
" ई कुल सबके खातिर है कि खाली एस. सी ./ एस.टी . के ...। काहे कि सब कुछ त ओही सबके खातिर होता है न ! "
" अइसा न है भइया ...बी.पी.एलवा में खाली वोही लोग हैं का ...हँ वन का अधिकार त आदिवासिए लोग के लिए है । लेकिन अधिकार के कानून बने से का होगा भइया ...लागू भी होना चाहिए न । "
" ई हे त हम कहते हैं ..स्वास्थ का अधिकार है बाकि स्वास्थ केन्द्र मे न डागडर है , न दवाई ...शिक्षा का अधिकार है ...बाकि स्कूल के न त ढंग के भवन है , न शिक्षक ...एकर का मतलब ? "
" ईहे त समझना है भइया कि अइसा काहे है ....आउर आप जान लीजिए कि बिना लड़ाई के कउनो अधिकार नहीं मिलने वाला ....ओकरा खातिर जरूरी है कि हमलोग अप्पन एकता बनावें । "
" पढ़ाईए के त चिंता है भाई ...बेटा अब मैट्रिक पास कर जायेगा ...अब आगे का करेगा ....कौलेज मे पढ़ावे का खर्चा कहँवा से जुटायेंगे ! "
" ऊ त अब हमनी के भूल ही जाना है भइया ...कालेज की पढ़ाई महंगी त हइये है , अब सरकार आउर महंगी करती जा रही है ....समझिए कि शिक्षा का निजीकरण आउर बाजारीकरण हो रहा है ...जेकरा पास पैसा होगा , ऊ पढ़ेगा ।"
" त ई कुल त गरीब के मारहीं के उपाए है न ! सरकार का सोचती है कि हमनी के एही तरह बेवकूफ बनाती रहेगी ! "
" बनाएगी आउर हम बनेंगे ...काहे कि ऊ हम्मर नबज पकड़ लीहिस है । धरम आउर जाति के , त कहीं छेत्र आ भासा के नाम प हमनी को लड़ाती रहेगी आउर उधर अप्पन काम करती रहेगी । "
" अब तुम्हरी बतिया कुछ - कुछ सच लगने लगी है मनुआ ! लगता है कि हम सभीन को एक होना ही पड़ेगा । बाकि एक ठो बात है ...ऊ का कहते हैं , अप्पन जात - धरम त हम कबहूं न छोड़ेंगे भाई ! "
" छोड़ने को के कहता है भइया ....बाकि दूसर के जात - धरम से घिरना भी त न कीजिए न ! ..अप्पन अप्पन जात - धरम मानिए , लेकिन साझा हित जे है , ओकर लड़ाई त साझा होके लड़िए ! "
" ठीक है ...अबकी जब तुम , ऊ का कहते हैं , गियान बिग्यान समिति के कार्यक्रम मे जाओगे त हमको भी ले चलना ! नमवा से त अच्छे बुझा रहा है , तनिक कमवा त देखें ! " -- कहते हुए पांडे उठा और चल दिया ।
मैने मनुआ से कहा - " लगता है ...पांडे को भी समझ में आने लगा । "
" अभी हम कुछो न कहेंगे बाबूजी , ऊ कब पल्टी मार देंगे , कहना मुश्किल है । " मनुआ की बात पर मुझे हँसी आ गई । हम दोनो हँसने लगे ।
मार्क्सवादी राजनैतिक अर्थशास्त्र! सवाल ये उठता है कि मार्क्सवादी राजनैतिक अर्थशास्त्र ही क्यूँ? जवाब है कि मार्क्सवादी राजनैतिक अर्थशास्त्र हमें पूँजीवादी व्यवस्था का शोषण, विकास और उसके संकट को समझने में मदद करता है। यह समाज के आर्थिक आधार का अध्ययन करता है और इसीलिए उनके लिए ज़रूरी है जो सामाजिक बदलाव के लिए संघर्ष करते हैं। बुर्ज़ुआ अर्थशास्त्र, जो कि हमारे विश्वविद्यालयों में पढ़ाया जाता है, की तरह मार्क्सवादी अर्थशास्त्र ये दिखावा नहीं करता कि वह सभी सामाजिक व्यवस्थाओं की विश्वव्यापी आर्थिक नियमों की खोज करने की कोशिश करता है। मार्क्सवादी विश्लेषण के अनुसार हर उत्पादन के तरीक़े का अपना विशिष्ट नियम होता है। इसी कारण मार्क्सवादी विश्लेषण के इस विज्ञान को हम राजनैतिक अर्थशास्त्र कहते हैं। इस विषय पर मार्क्स से लेकर लेनिन ने बहुत कुछ लिखा है परंतु हम आसान तरीक़े से राजनैतिक अर्थशास्त्र के निम्नलिखित चार सवालों तक ही खुद को सीमित रखेंगे - 1. पूंजीवादी अर्थव्यव्स्था वह उत्पादन का तरीक़ा है जहां पूँजीपति वर्ग उत्पादन के साधनों के मालिक होते हैं वो उत्पादन के लिए म...
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