मैं मनुआ के घर पहुँचा ही था कि पांडे खुशी से चिल्लाते हुए आया - " मनुआ भाई ! आज मैं बहुत खुश हूँ ....बहुत - बहुत खुश हूँ ! "
" का हुआ पांडे भइया ....समान काम के लिए समान वेतनवा लागू हो गया का हो ? "
" अरे , ऊ नहीं .....।"
" त हमनी के नोकरी अब परमामेंट ....। "
" अरे, न भाई .....। "
" अच्छा ! ...त बबुआ के नोकरी लग गई है .....तब त मिठाई खिलाना होगा भइया ! "
" अरे , ऊ से भी बड़का काम हुआ है भाई ...। "
" अच्छा ...अच्छा ...त ई न काहे कहते हो कि एकंउटवा मे पनरह लाख आ गया ...। "
" अरे, ऊ त अयबे करेगा .....ओकरे त उपाय हो रहा है । "
" अच्छा ....त घरे से चाचा चिठ्ठी भेजिन है .....किसान सभीन के लोनवा माफ हो गया का ? "
" ऊहो होगा भाई ....बाकि अभी ई दूसर खुशखबरी है । "
" त भइया , अब आप ही बता दो कि कउना बात से अतना खुश हो ? "
" नहिए न बूझा ....अरे हमलोग यू . पी . जीत गये ...ऊहो बंफर सीट से .....अब देखना ...देश कइसे दिन दुगुनी आउर रात चौगुनी तरक्की करता है .....! "
" अच्छा त ई बात से एतना खुशी .....! ठीके कहते हो भइया , अब विकसवा की गाड़ी सरपट दउड़ेगी ....हमनी के जे श्रम कानून है , ऊ अब जल्दिए बदल जायेगा...हायर - फायर आउर बढ़िया से होगा ....हड़ताल - वड़ताल त किस्सा - कहानी के चीज हो जाएगा... किसान आउर आदिवासी अप्पन जमीन से आउर आसानी से बेदखल होंगे ...ऊ जे जमीनवा छीने वोला कनूनवा है , अब पूरा बदल जाएगा ....ई जेतना पब्लिक सेक्टर के कल - करखानवा है ....सब पर समझ कि तलवार लटक गया ....ई कूल पराईवेट हो जाएगा ..। "
" अब जो होगा ..सब ठीके होगा ! सरकार त हम्मर पार्टी की बन गई न ! तू देखना ...अब कइसे सबका साथ ...सबका विकास होता है .... हर हर मोदी ....घर घर मोदी ! " ---- नारा लगाते हुए पांडे चला गया । मनुआ ने बुझे हुए स्वर मे पूछा - " बाबूजी ! ई लोग का भरम कब टूटेगा ? "
" जब हम लगातार इनके बीच काम करते रहेंगे और इनके हित के लिए संघर्ष करते रहेंगे । ....चुनौतियों से घबराना नहीं है भाई ! आगे और भी कठिन समय आने वाला है । पर इतना जान लो कि आर्थिक मंदी का सारा बोझ सरकार आम जनता पर ही डाल रही है और आगे भी डालेगी । अगर हम जाति और धर्म के चक्रव्यूह को भेद कर वर्गीय संघर्ष को तेज करेंगे तो ये सब हमारे साथ जुड़ जायेंगे । "
" ऊ त आप ठीके कहते हैं बाबूजी ! ऊ एक ठो कहाउत है न , ...भूखे भजन न होय गोपाला ! " --- कहकर मनुआ हँस दिया । हम 8 अप्रैल को राँची में होने वाली रैली की योजना बनाने लगे ।
## पहचान की राजनीति बनाम वर्गाधारित राजनीति। ## पहचान की राजनीति का मतलब क्या है ? उत्तर आधुनिकता की ही तरह पूंजीवादी सिद्धांतों से निकली पहचान की राजनीति मार्क्सवाद का विकल्प होने का दावा करती है। यह मानती है कि राजनीति और भौतिक परिस्थितियों के बीच कोई रिश्ता नहीं होता। यह एक ऐसे समाज की परिकल्पना करती है जो तमाम तरह के शोषण और आपसी शत्रुता पर टिका है। इसमें यह सोच निहित है कि जातीयता, धर्म, नस्ल या लैंगिकता आदि से जुड़े शोषण व आपसी शत्रुता का भौतिक परिस्थितियों से कोई रिश्ता नहीं होता। यह पूरी तरह से व्यक्तिगत तौर पर महसूस किया जाता है। पहचान एक व्यक्ति द्वारा उसके उत्पीड़न के अनुभव के आधार पर बनती है और पूरी तरह से आत्मपरक और स्वायत्त होती है। यह किसी भी समाज के वर्ग विभाजन पर आधारित विश्लेषण को अस्वीकार करता है। पहचान की राजनीति के अनुसार समाज में मुख्य विभाजन है -- व्यक्तिगत रूप से उत्पीड़न सहन करने वालों और बाकि सभी उनलोगों के बीच जिन्होंने उत्पीड़न का अनुभव नहीं किया है। उदाहरण के लिए पहचान की राजनीति के सिद्धांतों के अनुसार जातिगत उत्पीड़न का अनुभव करने वाला एक दलित मजदूर...
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