मनुआ आज ही गाँव से लौटा था । दुआ-सलाम के बाद मैने गाँव का हाल-चाल पूछा । मायूसी चेहरे पर तैर गई । क्षीण स्वर में बोला - " ठीके ठाक है बाबूजी ! लगभग एक चौथाई घरों में ताले लटक चुके हैं ।"
" क्यों ? ...क्या वहाँ भी यू.पी. के कैराना वाली बात है ? "
" मतलब ? "
" मतलब ....एक तबके के डर से दूसरे तबके के लोग .....।"
" नहीं - नहीं बाबूजी ! खेती - किसानी से परिवार चलाना मुश्किल हो गया है ....पानी - पटवन के लिए भगवान भरोसे ..अगर किसी तरह फसल उपज गई ......तो फसल का उचित दाम नहीं मिलता.....लोग क्या करें वहाँ रहकर ....शहरों में भाग रहे हैं । "
" तो आंदोलन क्यों नहीं करते ....सरकार पर दबाव क्यों नहीं बनाते ? "
" सोचने का फुर्सत हो तब न बाबूजी ! पहले मोदी जी और अब योगी जी की माला जप रहे हैं । देश - दुनिया की सारी खबरें इन दो महामानवों (?) के आगे तुच्छ और बेकार हैं । मैने जब कई राज्यों में किसानों की आत्महत्या की चर्चा की ....तमिल किसानों का दिल्ली में जंतर - मंतर पर भूख हड़ताल की बात कही ....राजस्थान में किसानों के आंदोलनों और उनकी जीत की बात कही... तो कहने लगे कि ई सब मोदी जी को डिरेल करने के लिए हो रहा है । "
" फसलों के उचित मूल्य नहीं मिलने पर भी कोई आक्रोश नहीं ! "
" नहीं बाबूजी .... जाति और धर्म की चर्चा से बाहर वो निकल हीं नहीं पाते । उन्हें पूरा विश्वास है कि नई सरकार उनके स्वर्ण युग की वापसी करायेगी । ....वहाँ किसानों की समस्याओं से ज्यादा चर्चा आरक्षण की है ...मंदिर - मस्जिद और लव - जिहाद की है ...गौ रक्षा की है । "
" तो गाँव वीरान होता जा रहा है ! ...किसान के बेटे यहाँ शहरों में ठेका और दिहाड़ी मजदूर बनने को अभिशप्त हैं ....दरबानी करेंगे , पर किसानी नहीं । "
" बाबूजी ! धर्म का असर अफीम से भी ज्यादा होता है , ई मैने देख लिया । "
" वह कैसे ? "
" जब मैने उन लोगों को महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री और स्टेट बैंक के चेयरमैन की बात बताई , तो कुछ लोग कहने लगे कि ठीके बात है ....ऋण नहीं माफ होना चाहिए ....कुछ ने तो सब्सिडी हटाने की भी बात की । "
" तो तुमने क्यों नहीं बताया कि सरकारों द्वारा पूंजीपतियों के लाखों करोड़ रुपए के ऋण और कर प्रति वर्ष माफ होते हैं ! "
" बताया बाबूजी ....तो वो सब हँसने लगे और बोले कि ई सब विरोधियों द्वारा फैलाया गया झूठ है । बाबूजी ! अभी गाँव के किसानों के सिर पर हिन्दूत्व का भूत सवार है ...उन्हें लगता है कि समस्या की जड़ में विधर्मी और कम्युनिस्ट लोग हैं ...एक बार उनसे निपट लिया गया तो ई सरकार विकास की रोशनी हर घर तक पहुँचाएगी ।
" अच्छा , तो अफीम का असर है ....वरना तीन साल हो गए ....क्या फसलों का दाम लागत का डेढ़ गुणा हुआ ?....नहीं न ! ....ऊपर से डीजल का दाम साल मे कई दफे बढ़ा दिया गया । "
" लेकिन बाबूजी , नशा आखिर नशा ही है ...इसे तो आज न कल उतरना ही है । "
मैने लम्बी साँस लेते हुए कहा -- " सब कुछ गंवा के होश में आए तो क्या हुआ ...। खैर , हमारा काम है लोगों को जगाना । ....अरे हाँ , मैं तो भूल ही गया था ...कल शहीद दिवस मनाने की तैयारी करनी है ...चलो पार्टी दफ्तर चलें । "
मार्क्सवादी राजनैतिक अर्थशास्त्र! सवाल ये उठता है कि मार्क्सवादी राजनैतिक अर्थशास्त्र ही क्यूँ? जवाब है कि मार्क्सवादी राजनैतिक अर्थशास्त्र हमें पूँजीवादी व्यवस्था का शोषण, विकास और उसके संकट को समझने में मदद करता है। यह समाज के आर्थिक आधार का अध्ययन करता है और इसीलिए उनके लिए ज़रूरी है जो सामाजिक बदलाव के लिए संघर्ष करते हैं। बुर्ज़ुआ अर्थशास्त्र, जो कि हमारे विश्वविद्यालयों में पढ़ाया जाता है, की तरह मार्क्सवादी अर्थशास्त्र ये दिखावा नहीं करता कि वह सभी सामाजिक व्यवस्थाओं की विश्वव्यापी आर्थिक नियमों की खोज करने की कोशिश करता है। मार्क्सवादी विश्लेषण के अनुसार हर उत्पादन के तरीक़े का अपना विशिष्ट नियम होता है। इसी कारण मार्क्सवादी विश्लेषण के इस विज्ञान को हम राजनैतिक अर्थशास्त्र कहते हैं। इस विषय पर मार्क्स से लेकर लेनिन ने बहुत कुछ लिखा है परंतु हम आसान तरीक़े से राजनैतिक अर्थशास्त्र के निम्नलिखित चार सवालों तक ही खुद को सीमित रखेंगे - 1. पूंजीवादी अर्थव्यव्स्था वह उत्पादन का तरीक़ा है जहां पूँजीपति वर्ग उत्पादन के साधनों के मालिक होते हैं वो उत्पादन के लिए म...
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