Skip to main content

ताकि नाटक जारी रहे

ताकि नाटक जारी रहे
-------------------------
मैं ईमानदार हूँ
नहीं - नहीं
वे बेईमान हैं
चूंकि वे बेईमान हैं
मैं ईमानदार हूँ

वे देश के विरोधी हैं
नहीं - नहीं
वे मेरा विरोधी हैं
वे मेरा विरोधी हैं
इसलिए देश के विरोधी हैं
क्योंकि मैं देश हूँ

मेरी इच्छाएँ अनंत हैं
नहीं - नहीं
इच्छाएँ अनंत होती हीं हैं
अनंत आकाश है
मैं आकाश हूँ

यह सच है
नहीं - नहीं
यह झूठ नहीं है
सच कुछ नहीं होता
झूठ भी कुछ नहीं होता
दोनों सापेक्ष हैं

आप नहीं मानते !
मैं भी नहीं मानता
मानना जरूरी भी नहीं

नेपथ्य में हलचल है
स्टेज पर मैं हूँ
नेपथ्य आभासी है
स्टेज वास्तविक

नाटक जारी है
दर्शक अचंभित हैं
नहीं - नहीं
दर्शक मूर्छित हैं
उनकी आँखों में सपने हैं
उनके सपनों में मैं हूँ

सपना उन्होंने नहीं देखे
मैने बो दिए हैं
उनकी आँखों में
वे सपनों के पीछे भागते हैं
मैं सपनों के आगे भागता हूँ
वे मेरे पीछे भागते हैं

यही सच है
और यही झूठ भी
झूठ सच और सच झूठ
होता रहेगा
परदा गिरने तक
या मूर्छा टूटने तक

पर जगे हुए लोग
मेरे विरोधी हो सकते हैं
नहीं नहीं
जगे हुए लोग
मेरे विरोधी हैं ही
सो नहीं टूटने दूँगा
उनकी मूर्छा
ताकि नाटक जारी रहे ।

     ----- कुमार सत्येन्द्र

Comments

Popular posts from this blog

मार्क्सवादी राजनीतिक अर्थशास्त्र

मार्क्सवादी राजनैतिक अर्थशास्त्र!  सवाल ये उठता है कि मार्क्सवादी राजनैतिक अर्थशास्त्र ही क्यूँ? जवाब है कि मार्क्सवादी राजनैतिक अर्थशास्त्र हमें पूँजीवादी व्यवस्था का शोषण, विकास और उसके संकट को समझने में मदद करता है। यह समाज के आर्थिक आधार का अध्ययन करता है और इसीलिए उनके लिए ज़रूरी है जो सामाजिक बदलाव के लिए संघर्ष करते हैं। बुर्ज़ुआ अर्थशास्त्र, जो कि हमारे विश्वविद्यालयों में पढ़ाया जाता है, की तरह मार्क्सवादी अर्थशास्त्र ये दिखावा नहीं करता कि वह सभी सामाजिक व्यवस्थाओं की विश्वव्यापी आर्थिक नियमों   की खोज करने की कोशिश करता है। मार्क्सवादी विश्लेषण के अनुसार हर उत्पादन के तरीक़े का अपना विशिष्ट नियम होता है। इसी कारण मार्क्सवादी विश्लेषण के इस विज्ञान को हम राजनैतिक अर्थशास्त्र कहते हैं।  इस विषय पर मार्क्स से लेकर लेनिन ने बहुत कुछ लिखा है परंतु हम आसान तरीक़े से राजनैतिक अर्थशास्त्र के निम्नलिखित चार सवालों तक ही खुद को सीमित रखेंगे - 1. पूंजीवादी अर्थव्यव्स्था वह उत्पादन का तरीक़ा है जहां पूँजीपति वर्ग उत्पादन के साधनों के मालिक होते हैं वो उत्पादन के लिए म...

हो वर्ष नव

हो वर्ष नव हो हर्ष नव हो ‌‌सृजन नवल हो गीत नया  नव ताल - सुर संगीत नया  नूतन जीवन  हो रंग नया  नव नव विहंग नव नव कलरव नव पुष्प खिलें नव नव पल्लव  हो वर्ष नव हो हर्ष नव हालात नए ललकार नई कर ले स्वीकार  मत मान हार  उम्मीद नई  संकल्प नया  प्रज्ज्वलित कर एक दीप नया  हो तम  विनाश हो तम विनाश हो वर्ष नव हो हर्ष नव --- कुमार सत्येन्द्र

मार्क्सवादी राजनीतिक अर्थशास्त्र

पूँजीपति के मुनाफ़े का सफ़र. अंतिम भाग  हमने ये तो स्थापित कर लिया कि पूँजीपति अपना मुनाफ़ा ना तो कच्चे माल और ना ही उत्पादित वस्तुओं के ख़रीद बिक्री में कमाता है। वह मुनाफ़ा कमाता है उत्पादन के दौरान। लेकिन कैसे? इसको समझने से पहले मैं आपको वापस मार्क्स के दास कैपिटल से एक और शब्द को समझाता हूँ। वह शब्द है “श्रम शक्ति” या “labour power”.  पूँजीपति मज़दूरों से उनके श्रम शक्ति को ख़रीदता है और बदले में उनको मज़दूरी देता है। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि मज़दूरी = श्रम शक्ति।  आपने कभी ये सोचा है कि किस प्रक्रिया से मज़दूरों की न्यूनतम मजदूरी तय होती है। इसे तय करने वाली कमिटी एक लम्बे प्रक्रिया के बाद यह कैल्क्युलेट करती है कि मज़दूर को महज़ अपनी ज़िंदगी जीने के लिए कितना मज़दूरी दी जाए। ये कोई नई बात नहीं है। इतिहास में भी सर्फ़ और ग़ुलामों को उत्पाद का उतना ही हिस्सा दिया जाता था जिस से वो महज़ ज़िंदा रहें। उनका हिस्सा परम्परागत तरीक़े से तय किया जाता था जब कि आज के आधुनिक युग में मजदूरों की मज़दूरी श्रम के डिमांड और सप्लाई पर निर्भर करती है। हालाँकि मज़दूर एक साथ आकर अपनी...