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एक विश्लेषण चुनाव का

काँग्रेस मुक्त भारत = काँग्रेस युक्त बी.जे.पी.
एक बार उपर्युक्त विचार भी था आया मेरे मन में । फिर पाँचो राज्यों के चुनाव नतीजों पर दृष्टिपात किया । कुछ देर बाद एक अलग ही दृश्य दिखा । राष्ट्रीय दलों की जीत और क्षेत्रीय दलों की हार ! ट्रेंड बदला है । पता नहीं यह विश्लेषण कितना सही है । लेकिन लगता तो यही है कि जनता में क्षेत्रीय दलों ने अपनी विश्वसनीयता खो दी है या फिर केन्द्र की आर्थिक नीतियों के अनुकरण के कारण जनता ने सोचा कि जब इन्हीं नीतियों से ही विकास होना है तो क्यों न इन नीतियों के निर्माताओं को ही राज्य का बागडोर सौंप दिया जाए ! वैकल्पिक आर्थिक , सामाजिक और सांस्कृतिक नीतियों की अनुपस्थिति ने यथास्थिति बनाए रखने में योगदान दिया है । रहा सहा कसर तथाकथित सोशल इंजीनियरिंग ने पूरा कर दिया । जनता जातीय और सांप्रदायिक विमर्श से ऊब चुकी है और आर्थिक विमर्श , जो कि जन जीवन को सबसे अधिक प्रभावित कर सकता है , न के बराबर हो रहा है । वरना आत्महत्या करता किसान और दर दर भटकता नौजवान व मजदूर उनके ही तलवे सहलाने को मजबूर न होते , जो उन्हें रोज दुत्कारते , फटकारते और लतियाते हैं । राजनीतिक चिन्तकों से अपेक्षा है कि वे इस पर गहन चिन्तन करेंगे और आर्थिक नीतियों का विकल्प लेकर जन - जन तक पहुँचने की ईमानदार कोशिश करेंगे।

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मार्क्सवादी राजनीतिक अर्थशास्त्र

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