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कविता

संभलो वत्स !
**********
मैं सदा से खड़ी हूँ
एक परछाई की तरह
तुम्हारे पार्श्व में ,
कभी उजाले में
पूर्ण दृष्टिगोचर
कभी अंधेरे में
लुप्त प्राय ।

वह किताब
जो लिखी थी तुमने
दशकों पहले
दबी रहती है
मेरी मुट्ठी में ,
जिसके हर्फों ने
बनाया है तुम्हें भी
उस ऊँचे आसन का हकदार
जहाँ पहुँच सकी थी
भगवतिया देवी
अपने गोबर सने हाथ
और कीचड़ सने पाँव के साथ ।

पर आसन की ऊष्मा
और दौलत की चकाचौंध ने
कुछ ऐसा किया
कि तुम भूलने लगे मुझे
और मेरी मुट्ठी में दबी
किताब के शब्दों को ,
उधर कुछ लोग
खेलने लगे शब्दों से
देने लगे नया अर्थ ,
जिन शब्दों को गढ़ने में
नहीं थी उनकी कोई भूमिका
लगे करने उन्हें पुनर्परिभाषित
पर, तुम्हारी नजर चिपकी रही
ऊँचे आसन से
और उन्होंने
लिख दी नई इबारत
सबके मानस - पटल पर ।

मिट गया
झूठ और सच का फर्क
आस्था की हुई जीत
हार गया तर्क
वर्षों से मेरे आँचल में टंका
साझी विरासत का
वह टिमटिमाता सितारा
टूट गया
और स्याह हो गए
चंद पन्ने
उस किताब के
जो आज भी दबी है
मेरी मुट्ठी में
पर, तुम मशगूल रहे
सियासी खेल में

गगनभेदी नारों के बीच
डूब गईं मेरी चीखें
लग गए दीमक
ऊँचे आसन के खम्भों में
खबरची लगे बिकने ,
निष्पक्ष तराजू का पलड़ा भी
लगा झुकने ,
आसन की ऊष्मा
वहाँ तक जा पहुँची
पर, तुम्हारी नजर
बँधी रही उस सिंहासन से

उधर मेरी जयघोष के साथ
बिकने लगे मेरे अंग
मैं टूटती रही
मैं बिकती रही
मेरी मुट्ठी में दबी किताब के पन्ने
फड़फड़ाते रहे ,
असीमित अधिकार
भला कौन करे प्रतिकार !
भयभीत हूँ मैं
कल बदल न जायें
इस किताब के कई सारे पन्ने
जकड़ न ले कोई जंजीर
मेरे पाँव

अगर ऐसा हुआ
तो सच कहती हूँ वत्स !
तुम पहुँचा दिये जाओगे
उसी अँधेरे खोह में
जहाँ सदियों पड़े रहे थे तुम
जब सदियों रोती रही थी मैं

उठो...जागो... संभलो वत्स !
बचा लो
मेरे अस्तित्व को
और मुट्ठी में दबी
इस किताब को ,
क्योंकि ,
यह है तो तुम हो
तुम हो तो मैं हूँ ।

----- कुमार सत्येन्द्र

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