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मनुआ - 24

मैं और मनुआ मंदसौर की गोली कांड और उसकी प्रतिक्रिया में देश के विभिन्न हिस्सों मे हुए प्रतिरोध सभाओं तथा पूरे देश में फैल रहे किसान आंदोलनों पर चर्चा हीं कर रहे थे कि पांडे आ पहुँचा । शायद उसने हमारी बातें सुन ली थी सो आते हीं बोला - " ई कुल कंग्रेसियन के आग लगावल है । सत्तर साल में पहली बार एगो अतना ईमानदार और कर्मठ नेता देस को मिला है ...ओकरो सब मिल के डिस्टरब कर रहे हैं । अरे भाई , ऊ कौनो जादूगर है , जे कि तीने साल में सत्तर साल के बिगाड़ल सुधार देगा ...आँय ? तनिक धीरज रखो । जइसे कइएक छेत्र में सुधार हुआ है , खेती और किसानी को भी सुधारा जायेगा , बाकि ई सब धकिया के गद्दी पर बैठेला बेचैन है ....मरवा दीहिन 5 - 6 ठो नौजवान के फोकट में ...किसान के नाम पर । "
" का भइया , एतना अंधभक्त मत बनिए ! पहिला बात कि जेकर एतना गुणगान कर रहे हैं , ऊ अबतक कउन सा तीर मारे हैं ...जरा बता दीजिए ....उल्टे जो कुछ भी पटरी पर था , सब बेपटरी होके छितरा गया है । कउन छेत्र में ..कहाँ ....का बदलाव कीहीन है ....नया नया सूट पहिन के नया नया देश घूमे के सिवा का कीहीन है ....हाँ एक काम कीहीन है ...गाय - गोबर के राजनीति करके समाज के भाईचारे को कच्चे चबा दीहीन है । "
" अरे चुप बुड़बक , तुम्हरे कहने से होगा ...आँय...काम न कीहीन है तो अइसहीं इस्टेट पर इस्टेट जीत रहे हैं ....दुनिया लोहा मान लीहिस , बाकि तुमलोग ......। "
" हाँ भइया , दुनिया काहे न लोहा मानेगा ! सोना के थाली में हीरा उपहार मुफ्ते में मिलेगा तो किसी को जहर लगेगा ...लेकिन एकर बाद भी विदेशी पूंजी नहीं आ रहा ... उद्योग के लिए , खान - खनिज के लिए आदिवासियों और किसानों से जमीन छीन के औने - पौने में दे रहे हैं ....सारे कानूनों की धज्जिया उड़ा दीहीन है...श्रम कानून तो अब खाली कागजे पर रह गया है , लेकिन तो भी कोई फायदा न हुआ , विकास दर नीचे ही लुढ़क रहा है ...। "
" अरे छोड़ विकास दर के ...ई सब ठीक हो जाएगा । पुराना ढांचा तोड़ के नया बनाने में टाईम तो लगेगा न । अभी बहुते सुधार करना है ....तुम लोग तनिक शांत रहो ...साहेब कउनो पचास साल नहीं माँगे हैं ...बस दस साल दे दो ....काम करने दो ....देश का पुराना गौरव लौट आयेगा ....। "
" यानी कि तबतक किसान आत्महत्या करते रहें , नौजवान रोजगार खातिर सड़क पर चप्पल घिसते रहें , मजदूर भूखे मरते रहें ....का भइया ! ई का हो गया है आपको .....बिलकुले अन्हरा गए हैं । विकास का सब चक्का पंक्चर हो गया है और आप हैं कि झूठ - मूठ के मुरेठा बान्ह के चौधरी बने के ढोंग कर रहे हैं । "
" अरे हम नहीं , तू विरोध में अन्हरा गया है ....तुमको नहीं लौक रहा है ....दरअसल में गड़िया का रफ्तरवे एतना तेज है कि तुम्हरी अँखिया चौंधिया जा रही है । "
" ठीके न है ....विश्व बैंक के मुताबिक चल रहे हैं...खेती - किसानी चौपट कर दो कि लोग रोजी - रोजगार खातिर शहर में दौड़ जायें ताकि ऊहाँ सस्ता मजदूर मिल जाए ...सब क्षेत्र में पराइवेट पूंजी आ रहा है और उसको सस्ता मजदूर का दरकार है .... अब तो अप्पन साहेब रेलवे स्टेशन तक गिरवी रख रहे हैं ...वर्ल्ड क्लास स्टेशन जो बनाना है ...। "
" त का चाहते थे कि सब स्टेशनवा वैसे ही गंदा - गलीज रहे ..... स्वच्छता अभियान चल रहा है न ....आ सरकार के पास पूंजिए न है तो पराइवेट में देना ही पड़ेगा ...। "
तभी पांडे का मोबाइल फोन बजने लगा । बातचीत का क्रम टूट गया । हमलोग कुछ सुन नहीं पा रहे थे , किन्तु चेहरे के बदलते हुए रंग से ऐसा आभास हो रहा था कि कहीं कुछ गड़बड़ है ....।
" हूँ ...हूँ .....सुन रहे हैं ...ई कुल त होते रहेगा ...हँ ....काम के जुगाड़ में लगे रहिए ....अनुभव और जोग्यता है त ...हँ ...उतार - चढ़ाव जिनगी में होते रहता है .....ठीक है ...खुश रहिए । " -- कहते हुए पांडे ने फोन बंद किया । मनुआ से न रहा गया , पूछ ही दिया - " का हुआ पांडे भइया ....किसका फोन था ? "
" ऊ...पूना से हमरे ...दमाद जी का था.... । "
" का हुआ भइया ... ऊ तो , का कहते हैं , कोई बढ़िया कंपनी में थे ....? "
" हूँ ....बाकि एने कंपनी का हालत कुछ गड़बड़ा गया है । ऊ न सुने हो कि आई.टी. सेक्टरवा में मंदी आ गया है ...ऊहे में कुछ लोग छँटा रहे हैं ...। "-- पांडे ने अंटकते अंटकते कहा ।मतलब साफ था कि उनके दमाद का पत्ता साफ हो गया था । चूंकि माहौल कुछ मातमी हो गया था , सबलोग खामोश थे । पांडे सिर झुकाए पैर के नाखून से मिट्टी कोड़ रहा था । अचानक वह उठा और चुपचाप चल दिया । मनुआ मेरी ओर देखकर धीरे से मुस्कुरा दिया और बोला - " विकास.....।"

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