जब मैं मनुआ के घर पहुँचा तो देखा कि वह माथे पर हाथ रखे किसी सोच में डूबा था । वह खुद में इतना खोया था कि मेरे पाँव की आहट से भी उसकी तन्द्रा भंग नहीं हुई । मैंने धीमी आवाज में उसे पुकारा तो वह चौंक पड़ा - " बाबूजी , आप...आप कब आए ? "
" अभी - अभी आया हूँ । पर तुम कहाँ खोए थे , क्या कोई विशेष बात .....? "
" अब का कहें बाबूजी ....नफरत की आग घर के छान - छप्पर तक पहुँच गई है । "
" मतलब .... समझा नहीं ? "
" ऊ जे दिल्ली में जुनैद वाला घटनवा न हुआ है ...ओही समाचार टीभिया पर दे रहा था ...और हम सब परिवार खाना खाते हुए देख रहे थे । देख..सुनके हमरे मुँह से निकल गया कि गजब अनरथ हो रहा है ....तभी तड़ाक से हम्मर लड़कावा कहता है कि ई सब के साथे जो हुआ सो ठीके हुआ है ...ई लोग देश का दुश्मन है.....खाता है हिन्दुस्तान का और गाता है....सुनते हम्मर तो पारा चढ़ गया , बाकि हम समझ गए कि खिसियाने से मामला और बिगड़ जाएगा ....हमें तो ई जानना होगा कि आखिर इसके दिमाग में ई कुल सोच आया कहाँ से ...तो हमने प्यार से पूछा कि बेटा ई बात तुम्हें कौन कहा ?....तो उसने कहा कि ऊ जहाँ जाता है , यही सुनता है कि ई लोग अपना देश ले लिया है तो अब ईहाँ काहे है....हमरा हक काहे मार रहा है ...गऊ माता को मारकर उसका माँस काहे खाता है...। "
" अच्छा ! यह सब वह कहाँ से जाना - सुना ...तुम तो घर में ऐसा नहीं बोलते होगे ? "
" का कहते हैं बाबूजी ! हम सीटू के सिपाही हैं ...हम भला ऐसा बात बोलेंगे ...समाज और देश के तोड़े वाला ! "
" फिर वह ....? "
" ऊहे तो बता रहे हैं बाबूजी.....हमने पुचकारते हुए पूछा ...अरे ई तो हमको नहिए मालूम था , ई सब तुम्हे के बताइन है बबुआ ? ....तो उसने कहा कि सब लोगन कहते हैं ...और स्कूल के मैदान में शाम में जे खेल - कूद होता है , ऊहाँ एक ठो भइया आते हैं ....ऊ हम सब को बैठा के खूब कहानी सुनाते हैं ...ई कुल बात भी ऊहे बताइन है ...बाबूजी ! सुनके हम्मर तो माथा चकरा गया , तब से हम ईहे सोच रहे हैं कि अप्पन लड़िका को कइसे समझायें । "
" समझा भी नहीं पाओगे । मालूम है न , स्कूल की किताबें भी बदली जा रही हैं । नैतिक शिक्षा के नाम पर धर्म की घुट्टी पिलाई जा रही है । इतिहॉस को भी तोड़ा - मरोड़ा जा रहा है । मिथकों को इतिहॉस बताया जा रहा है ।जब उसे स्कूल में यही सब पढ़ाया जाएगा , तो क्या वह हमारी बातों पर विश्वास करेगा ? "
उसने एक लम्बी साँस ली और बोला - " आप ठीके कह रहे हैं बाबूजी , आजकल हवा ही उल्टी बह रही है ...और ई कौनो एक दू दिन में नहीं हुआ है ....कईएक साल से सियासती लोग ईहे काम में लगे हुए थे ...जात - धरम के नाम पर धीरे - धीरे समाज को बाँटने में ऊ लोग सफल हो गए । अब देखिए न गऊ रक्षा के नाम पर , ऊ का कहते हैं ...बीफ खाए के नाम पर , इहाँ तक कि लड़िका चोर के नाम पर साल दू साल में कतने घटना हुई ....लेकिन ओकर विरोध के बजाए लोग ओही के सही ठहराने में लगे हैं । भीड़ के आगे सब बेजुबान हो गए हैं ...कानून - वानून , थाना - कचहरी कुले भीड़ के हाथ में ...ई कौना शासन है बाबूजी ? "
" ऐसी बातें और वारदातें कब से शुरू हुई हैं , कुछ सोचा है इस बारे में ? "
मनुआ कुछ सोचते हुए बोला - " ईहे कोई दू - ढाई दशक से .....। "
" और यही वो समय है जब अपने देश में नवउदारवादी नीतियाँ लागू हुई हैं । इन दो दशकों में दो भारत निर्मित हुआ है -- एक चमकता भारत और दूसरा तरसता भारत । "
" तो ई बात है बाबूजी ....मजूर - किसान के पेट पर लात , चोरवन के दूध - भात ...ई जात - पाँत , धरम - मजहब की लड़ाई हम सब के ध्यान बँटावे खातिर की जा रही है ...हमरी एकता तोड़े के साजिश है । ई करिया अँग्रेज लोग फूट डाल के राज करे के नीतिया पर चल रहे हैं ..कहावत भी है -- घर फूटे गँवार लूटे , गाँव फूटे जवार लूटे । ....बाकि अब हम सब भी बूझ गये हैं बाबूजी । आज चारो तरफ किसान अप्पन हक खातिर आंदोलन कर रहे हैं...बीसियो किसान संगठन एकजूट होके 6 जुलाई को म.प्र. के मंदसौर से दिल्ली कूच करने वाले हैं और इधर श्रम कानून में बदलाव के खिलाफ मजदूर युनियन भी सुगबुगाने लगे हैं ....छात्र - नौजवान - महिला सब के पीठ दिवाल से सट गया है ...अब तो पानी नाक से ऊपर पहुँचने लगा है ....। "
" अरे भाई , बाते - बात में हम तो भूल ही गए । आज सीटू दफ्तर में मीटिंग है - जिला सम्मेलन की तैयारी करनी है । "
" अरे हाँ बाबूजी , धत् तेरी के हमहूँ भुलाइए गए थे । चलिए , कहीं देरी न हो जाए । " -- कहते हुए मनुआ उठा और हम दफ्तर की ओर चल दिये ।
मार्क्सवादी राजनैतिक अर्थशास्त्र! सवाल ये उठता है कि मार्क्सवादी राजनैतिक अर्थशास्त्र ही क्यूँ? जवाब है कि मार्क्सवादी राजनैतिक अर्थशास्त्र हमें पूँजीवादी व्यवस्था का शोषण, विकास और उसके संकट को समझने में मदद करता है। यह समाज के आर्थिक आधार का अध्ययन करता है और इसीलिए उनके लिए ज़रूरी है जो सामाजिक बदलाव के लिए संघर्ष करते हैं। बुर्ज़ुआ अर्थशास्त्र, जो कि हमारे विश्वविद्यालयों में पढ़ाया जाता है, की तरह मार्क्सवादी अर्थशास्त्र ये दिखावा नहीं करता कि वह सभी सामाजिक व्यवस्थाओं की विश्वव्यापी आर्थिक नियमों की खोज करने की कोशिश करता है। मार्क्सवादी विश्लेषण के अनुसार हर उत्पादन के तरीक़े का अपना विशिष्ट नियम होता है। इसी कारण मार्क्सवादी विश्लेषण के इस विज्ञान को हम राजनैतिक अर्थशास्त्र कहते हैं। इस विषय पर मार्क्स से लेकर लेनिन ने बहुत कुछ लिखा है परंतु हम आसान तरीक़े से राजनैतिक अर्थशास्त्र के निम्नलिखित चार सवालों तक ही खुद को सीमित रखेंगे - 1. पूंजीवादी अर्थव्यव्स्था वह उत्पादन का तरीक़ा है जहां पूँजीपति वर्ग उत्पादन के साधनों के मालिक होते हैं वो उत्पादन के लिए म...
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