मैं मनुआ के घर पहुँचा तो वहाँ कुछ लोग आज के अति ज्वलंत विषय पर बातचीत में मशगूल थे ।कोई कह रहा था --" अरे भाई , ऊ गलत कह रहे हैं । जी एस टी का पूरा माने है - गऊ सुरक्षा टैक्स । ई सरकार के पराथमिकता में गऊ माता हैं ....। "
दूसरा -- " धत् बुड़बक ! कल मोदी जी का भसनवा नहीं सुना का ? ...ऊ का कहीन.....जी एस टी ..माने गुड और सिंपुल टैक्स ....। अरे भाई , पहिले के टैक्सवा बहुत लंझार था न , ओकरे सिंपुल कर दीहिन ...। "
तब तक कोई तीसरा बीच ही मे कूद पड़ा -- " अरे , ऊ का कीहीन है ...ई तो मनमोहने सिंह बनाइन थे ....बाकि ऊ घड़ी ईहे लोगवा एतना न विरोध कीहीन कि उनकोलागू करे के हिमते न हुआ .....। "
" हँ ..तो हिम्मते के तो बात है बबुआ ! " -- पांडे से रहा नहीं गया तो वह भी बहस में कूद पड़ा -- " ईहे तो हम कहते हैं कि ई है मरद का बच्चा , जो कुछ करता है सीना ठोक के करता है ....कोई केतनो विरोध करे ...सब के रगड़ के रख देता है । "
मनुआ ने बात के टूटे छोर को पकड़ते हुए -- " अरे पांडे भइया , ईहो कोई कहे के बात है ...ऊ तो हमलोग नोटबंदियो घड़ी देखे थे कि भसनवा देते - देते ई मरद के बच्चा कैसे भोंकार पार - पार बचवन जइसन रोईन थे ... हँ तो ई बताइए कि जीएसटिया के माने का है । "
मेरे मुँह से अचानक ही निकल गया -- " गुड्स ऐण्ड सर्विसेज टैक्स ....यानी वस्तु एवं सेवा कर ...। "
" अब चाहे जे हो माने , बाकि ईहै बहुत करांतिकारी कदम... सब विरोधी चारो खाना चितान गिरे हुए हैं ...बोलिए बंद है " --- पांडे ने चहकते हुए कहा ।
" नोटबंदियो में तो यही कहा जा रहा था ...जाली नोट खतम होगा .....काला धन या तो पकड़ाएगा या जर के कोइला हो जाएगा ....आतंकवदियन और नसलइटवन के तो कमरे टूट जाएगा ....बाकि हुआ का ...दांव उलटा पड़ गया ...वैसे हीं ई से भी कुछो न होगा ....। "
" तू न मनुआ भकचोन्हरे रह गया ....अरे ऊ से जो हुआ , ऊ तुमको का मालूम ...और एकर का फायदा - नुकसान है ...ऊ तो अभिए से दीख रहा है ....जेतना टैक्स चोर बेपारी है , सबका हाड़ काँप रहा है ...रोजे बाजार बंदी और जुलूस । "
" पांडे भइया , एतना जानकारी है तो हमें भी समझा न दीजिए कि एकरा लागू होने से हमको का फायदा होगा ...हमरा समान काम के समान वेतनवा मिलने लगेगा ...किसान सब के फसल के उचित दाम मिलने लगेगा ....शिक्षा और स्वास्थ पर सरकार ज्यादा खर्चा करने लगेगी ...का अइसन हो जाएगा कि हम ताली बजा के नाचें ? ...कुछ तो बताइए । "
तभी भीड़ से कोई बोला - " जे बा से , टीभिया पर एगो साहब बोल रहीन थे कि जिन्स के दाम तो बढ़ेगा , बाकि महँगाई नहीं बढ़ेगा ...अब ई हम्मर छोट बुद्धि में नहीं घुसा कि समान का दाम तो बढ़ेगा , लेकिन....। "
" हँ ..तो सब हमरे सब को बुझा जाएगा तो ऊ लोग ओतना बेकारे न पढ़ीन है । अब जे हो ....हमरा तो साहेब पर पूरा विश्वास है । --- कहते हुए पांडे उठा और एक दो तीन ।
उसके जाते हीं लोग मेरी ओर मुखातिब हुए । मनुआ ने पूछ दिया - " इसके बारे में आप ही कुछ बताइए न बाबूजी ! "
" देखो भाई , इसे समझना उतना आसान भी नहीं है । पहली बात तो यह कि इसका पूरा खाका अभी किसी पेपर में नहीं छपा है । नारे के रूप में जो प्रचार हो रहा है , वह है -- एक राष्ट्र , एक कर , एक बाजार । अब इस एकीकरण से किसे क्या लाभ होगा , यह तो वक्त हीं बताएगा । बहरहाल हम तो यही जानते हैं कि अप्रत्यक्ष कर की उगाही जिस भी तरीके से हो , भुगतान तो उपभोक्ता को हीं करना पड़ता है । "
" माने कि छुरी खीरा पर गिरे या खीरा छुरी पर कटना तो खीरवे को है ...। " --- मनुआ के बात पर सभी लोग हँसने लगे ।
## पहचान की राजनीति बनाम वर्गाधारित राजनीति। ## पहचान की राजनीति का मतलब क्या है ? उत्तर आधुनिकता की ही तरह पूंजीवादी सिद्धांतों से निकली पहचान की राजनीति मार्क्सवाद का विकल्प होने का दावा करती है। यह मानती है कि राजनीति और भौतिक परिस्थितियों के बीच कोई रिश्ता नहीं होता। यह एक ऐसे समाज की परिकल्पना करती है जो तमाम तरह के शोषण और आपसी शत्रुता पर टिका है। इसमें यह सोच निहित है कि जातीयता, धर्म, नस्ल या लैंगिकता आदि से जुड़े शोषण व आपसी शत्रुता का भौतिक परिस्थितियों से कोई रिश्ता नहीं होता। यह पूरी तरह से व्यक्तिगत तौर पर महसूस किया जाता है। पहचान एक व्यक्ति द्वारा उसके उत्पीड़न के अनुभव के आधार पर बनती है और पूरी तरह से आत्मपरक और स्वायत्त होती है। यह किसी भी समाज के वर्ग विभाजन पर आधारित विश्लेषण को अस्वीकार करता है। पहचान की राजनीति के अनुसार समाज में मुख्य विभाजन है -- व्यक्तिगत रूप से उत्पीड़न सहन करने वालों और बाकि सभी उनलोगों के बीच जिन्होंने उत्पीड़न का अनुभव नहीं किया है। उदाहरण के लिए पहचान की राजनीति के सिद्धांतों के अनुसार जातिगत उत्पीड़न का अनुभव करने वाला एक दलित मजदूर...
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