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मनुआ - 27

मैं और मनुआ कल दिल्ली में जंतर - मंतर पर आयोजित किसान - संसद की चर्चा ही कर रहे थे कि पांडे आ टपका । आज वह बेहद खुश नजर आ रहा था ।

मनुआ ने जिज्ञासावश पूछ दिया -- " का हो पांडे भइया , आज बहुते खुश दीख रहे हो ....का बात ? "
" अइसने बाते है मनुआ , पहली बार कोई सरकार  हम्मर जोतिष बिद्या को इज्जत दीहीस है ....म. प्र. में.....। "
" सरकार ने जोतिष का डिप्लोमा कोर्स शुरु किया है , यही न ? "
" दूर बुड़बक ! बीचे में बात काट दीहीस ....अरे , ऊ तो कबे से शुरु है ...अब ओकर नियोजन हो रहा है ....। "
" नियोजन ! ...मतलब ? "
" हरेक सरकारी हस्पताल और डिस्पेंसरी में एक ठो जोतिषी की बहाली होगी ....तनखाह - डागडरे जितना मिलेगा ...। "
" अच्छा ! ...तो ऊ वहाँ करेगा का ? "
" बूझो ... नहीं न बूझाया ... हम कहते न हैं कि तू एकदम से भकचोन्हरे रह गया ...अरे भाई , ऊ डागडर बाबू का भीड़ कम करेगा । " --- पांडे ने गर्व से 56 इंची को फुलाते हुए कहा ।
" भीड़ कम करेगा ! सो कैसे भइया ? हम्मर तो सचमुच में माथा चकरा रहा है । " --- मनुआ ने साश्चर्य पूछा ।

पांडे ने जोरदार ठहाका लगाया और बोला -- " तबे न कहते हैं कि अप्पन जड़ से मत कटो .....का तो झूठो के मारक्स - लेलिन करता रहता है ...अरे , अप्पन जोतिष बिद्या को का बूझता है ....हाथ और कपार के रेखा पढ़ के का नहीं बताया जा.सकता है ? "
" अच्छा , तो डागडर बाबू से पहिले जोतिषी बाबू रोगी को जाँचेंगे ......। "
" जाँचेंगे नहीं , पढ़ेंगे ....रोगी के हाथ और कपार पर का लिखा है , ओके पढ़ेंगे ....और अगर जनम कुंडली रहा तो ओके पढ़ेंगे और बता देंगे कि रोग है या कि कौनो गरह - गोचर है ....अब यदि गरह - गोचर है , तो डागडर बाबू की छुट्टी ....। "
" बड़ा तगड़ा इंतजाम हुआ है पांडे भइया ....वोही हम सोंच रहे थे कि आप एतना काहे खुश हैं ....चलिए , आपलोगन के तो पाँचो अंगुली घी में .....। " --- मनुआ ने हँसते हुए व्यंग किया ।
" देखो , होने न लगी जलन । अरे , ई न देख रहा है कि अपने पूरखों की मिहनत से तैयार हुई एक ठो बिदया , जे कि बिलुपित होए के कगार पर था , फिर से जीवित हो रहा है ....अप्पन धरम - संसक्रीति के तो कौनो चिन्ते न है । "
" ई कौनो धरम - संस्कृति की बात न है भइया , ई है पूरा ढोंग और पाखंड की बात । काहे कि एकर न तो कोई बैग्यानिक परमाण है और नहीं ब्याख्या । "
" सब है भाई , बाकि हमलोगों को बूझाएगा तब न । ई बिदया के एह मोट - मोट किताब असहीं थोड़े है । आजतक ओकरा पर कौनो सोधे नहीं हुआ .....अब ई सरकार कुछ ढंग की आई है , देखना एक दिन दुनिया हमरी इस बिदया का लोहा मानेगी । " --- कहते हुए पांडे उठा और चल दिया ।
मनुआ ने मुस्कुराते हुए मुझसे पूछा -- " बाबूजी ! यह सब का हो रहा है ? सुना है कि विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने गाय के मूत्र और गोबर पर अनुसंधान के लिए वैज्ञानिकों की एक कमिटी भी बनाई है । "
" ठीक हीं सुना है भाई ! ....और जो पांडे ने कहा वह भी सच है । इसी पर किसी कवि ने कहा है -----
" सदी इक्कीसवीं है और हम चौदहवीं में जी रहे हैं ,
   इसीलिए हमारे घर पत्थर के बूत दूध पी रहे हैं  । "

मनुआ ने जोर का ठहाका लगाया ।

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