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मनुआ - 28

जब मैं मनुआ के घर पहुँचा तो माहौल कुछ गंभीर सा था । मनुआ और पांडे किसी गंभीर मसले में उलझे हुए थे । पांडे का मुँह सिकुड़कर " टुइंयां " के समान दीख रहा था । न कल वाली खुशी थी और नहीं वह चमक । मेरी उपस्थिति कहीं उनकी निजता में खलल न पैदा कर दे , सोचकर मैने कहा -- " लगता है , गलत समय पर आ गया ...। "
" अरे नहीं सर जी ! आप बिलकुल सही समय पर आए हैं ।" -- पिअराये चेहरे पर फीकी हँसी लाते हुए पांडे ने तपाक से मुझे रोका । मनुआ ने भी सहमति जताई और पांडे से मुखातिब हुआ -- " हँ...तो फिर का हुआ ? "
" अब सर जी आ गये हैं तो पूरी बात बता देता हूँ । ...हम्मर एक ठो भतीजा है सर जी , जो हमरे साथ रहता है । ससुरा पढ़ाई - लिखाई तो किया नहीं , सो हमने उसको अखबार बाँटने के धंधे में लगा दिया । अच्छा ही कमा - धमा लेता है ...सुबहवा में दू घंटा अखबार बाँटके दस बजे एक ठो सेठ के दूकान में सेल्सगीरी करे चल जाता है ...मिलाजुला के अप्पन घर परिवार चला लेता है ...का मनुआ , तुम तो जानबे करते हो ? " मनुआ ने हामी भरी ।
" ...ओके तीन - चार दिन बुखार लग गया , सो पाँच दिन अखबरवा नहीं बाँटिस ....छठा दिन जब बाँटते हुए एक ठो सेठ के घर पहुँचिस , त एके देखते सेठानी आग बबूला हो गईन और अखबरवा फेंकते हुए बोलिन कि महीना में पाँच दिन देना है तो तू अखबार बंद कर दो । इसको तो ठकमुरकी मार दीहिस ...बोला कि ई का कहती हैं मैडम , ईहे पाँच दिन बुखार के कारण हम नहीं आ पाये हैं , बाकि हरेक दिन तो देबे किये हैं ....त ऊ और जोर जोर से ओके डाँटने लगी और झूठा , ठग , लोभी ....कतने तरह के गारी देने लगी ....सर जी , आखिर ई भी तो है बाभन का बच्चा ...मुँहाथेथी करने लगा ...तभी एकाएक सेठवा भीतरे से आया और तड़ तड़ चार - पाँच थप्पड़ ओकर गाल पर जड़ दिया और ढकेल के घरवा से भगा दिया ...बोला - जाओ , एको पैसा नहीं दूँगा ...जिस बाप के पास जाना है , जाओ ...। " -- कहते - कहते पांडे की आवाज भर्रा गई ।
" ...ऊ कहउतिया साँचे है सर जी ...कि अबरा के मौगी सबका भौजी । अब का कहें ...जवान लड़िका , ओकरो खून गरमा गया ...बाकि मन मसोस के रह गया । जब घरे आया त भोंकार पार के रोने लगा .... कहने लगा कि हम गरीब हैं त का हमरा इज्जत - आबरू न है ....। "
" अरे तो ऊ थाना में जाके केस काहे न किया पांडे भइया ...आखिर ईहो त कानून बेवस्था का हीं मामला है न ? "
" अरे ...ओही दरद त सुनाने आए हैं तुमको और सलाह लेने कि अब हम का करें ?...हँ त आगे का हुआ सो सुनो । हम ओके ईहे सलाह दिये कि थाना जाके सनहा कर दो । ...गुस्सा में तो था हीं , ओहे गोड़े थाना चल दीहिस । हमरो न रहा गया सो पाछे - पाछे हम भी पहुँचे थाना । ....अब ऊहाँ का हुआ ...कैसे बताएँ मनुआ । ऊ कादो गुसाईं जी कहीन है न कि समरथ के नहीं दोष गुसाईं ...बस ऊहे हुआ । हम पहुँचे त देखे कि हम्मर भतीजवा सिटपिटायल एगो कोना में खड़ा है और दरोगा जी कोई से फोन पर बतिया रहे हैं ....हाँ..हाँ सेठ जी , अरे हम कौनो नाहीं बूझते हैं का ...अरे भाई ...आपकी शराफत पर हमें कोई शक नहीं है ...हूँ ...हूँ...ठीके कह रहे हैं ....हँ जी ...करोड़ों के कारोबार में सब हिसाब - किताब ठीक रहता है और ईहे एक महीना के अखबारे का हिसाब ...न..न..खूब डाँटे हैं कि झूठमूठ का आरोप लगाया त भीतर कर देंगे ...अच्छा जी ...हाँ ..हाँ...दे दीजिएगा ...बेचारा गरीब बाम्हण है ...हाँ ..हाँ..भेज देता हूँ । दरोगवा फोन रखिस और एह के बुला के बोलिस कि ....जादे सयाना मत बनो ....चला आया मुँह उठा के थाना में ...झूठा मुकदमा करने ..स्साले जादा सयाना बने न तो तुम्हीं को ....जाओ , सेठ जी को बोल दिया है ...जो तू कहेगा , ऊ दे देंगे ...मुँह का ताक रहा है ...भागो यहाँ से । ...का कहें मनुआ,  देख - सुन के ईहे लगा कि ई दुनिया में सब कुछ पैसा है बबुआ ...गरीब चाहे कौनो जात के हो , ओकर जिनगी बेकारे है ....। "
" उसके बाद का हुआ पांडे भइया ? ऊ जाके पैसा ले लीहिस कि.....? "
" थनवा से निकलते हमरा देखिस और डबडबायल ...मुँह फेर के चल दीहिस । अब ईहे तो राय लेने हम इधर तुम्हरे पास आए हैं कि का किया जाए ? "
" देखो पांडे भइया ...डर - डर के जीना है तो जाके सेठवा से पइसा ले लो और नहीं तो हम पाँच आदमी चलते हैं थाना ...कैसे ऊ दरोगा सनहा नहीं लिखेगा , हम भी देखते हैं । " --- मनुआ का चेहरा भी तमतमा गया ।
" ऊ तो ठीक है भाई , बाकि तुमलोग जाओगे त ई मामला कहीं राजनीतिक न हो जाए , ई भी एक ठो डर है । सुने हैं कि ऊ सेठवा बिधायक जी के जात के है ..का जाने रिश्तेदारे न हो ...और अभी ऊहे लोगन की सरकार है ...आगे - पाछे बहुते सोचना पड़ता है भाई .....। "
" का कहते हैं पांडे भइया ...कल तक तो ई कहते कहते आपके मुँह में फेफड़ी पड़ल था कि कई जुग के बाद आपकी सरकार बनी है और आज कह रहे हैं कि ऊ लोगन की सरकार ....। --- हँसते हुए मनुआ ने कहा ।
" अरे भाई , वैसे देखो तो सरकार हमलोगों की हइये है , लेकिन तनी बारीकी में जाओ तो ....अब देखो न अपना विधायक जौन जात के है , मुख्यमंत्री ऊहे जात के ...और तो और परधानोमंत्री भी कादो ऊ हे जात के ....। "
" ईहे तो हमलोग कहते हैं भइया कि धरम और जात के नाम पर भोट देना और सरकार बनाना बंद करो ...ई सब हम गरीब लोगन के बाँटे वाला चाल है ....ई धन सेठवन के चाल को समझो भइया ...कबतक भुलावे में रहोगे ? "
" देखो मनुआ , हम तुमको कभी खराब आदमी कहे हैं  आँय....हम्मर नजर में त तू सच्चा , ईमानदार और निपक्ष आदमी है , तभी तो तेरे पास आते हैं ...लेकिन सब ठीक होते हुए भी एक ठो भारी गड़बड़ी है ....।"
" ऊ का पांडे भइया ? "
पांडे ने मेरी ओर कनखी से देखा और धीरे से कहा --- " ईहे कि तू कोमनिस्ट है ....ईहे तो सब गुड़ गोबर कर दीहिस । "
मनुआ पहले तो हँसा , फिर गंभीर हो गया  -- " पांडे भइया ! जे के आप गड़बड़ी कह रहे हो न , ओही हम्मर सबकुछ के आधार है ....ई कुल अच्छाई जे आप हमरा में गिना दिये ...हलांकि अइसन कुछ न है , हम भी तो मानुसे न हैं , गलतियां हमसे भी होती हैं ....फिर भी यदि तनीमानी अच्छाई हमरा में है , ऊ एही से है कि हम कमुनिस्ट हैं ...।
" ऊ तो ठीके है मनुआ ....अच्छा , अभी जाके भतीजवा से पूछते हैं कि ऊ का चाहता है ...फिर तुमसे मिलेंगे । " ---- कहते हुए पांडे उठा और चल दिया । मैंने मनुआ की ओर गर्व से देखा । वह मंद - मंद मुस्कुरा रहा था और पांडे को जाते हुए देख रहा था ।

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