आज जब मैं मनुआ के घर पहुँचा तो उसे घर के बाहर खड़ा पाया , जैसे वह कहीं जाने की तैयारी में हो । मुझे देखते हीं बोला -- " अच्छा हुआ बाबूजी , आप भी आ गए । "
" क्या बात है , कहाँ जा रहे हो ? "
" बात तो कउनो खास नहीं है बाबूजी ...पांडे भइया एने दू- तीन दिन से नहीं दीखिन हैं ....शंका हो रहा है कि कहीं तबीयते न खराब हो गया हो । उन्हीं को देखने जा रहे हैं ...बाबूजी ! आप भी चलिए न । "
मनुआ का आग्रह टालना आसान नहीं था । पांडे भले हीं मनुआ के विचारों का विरोधी था , किन्तु दोनों में अगाध प्रेम भी था । हम दोनों पांडे के घर की ओर चल दिए । पहुँचे तो पता चला कि घर में नहीं है ....पास हीं बने किसी नवनिर्मित " मत्स्य भगवान " के मंदिर में पूजा करने गया है । हम दोनों उसी ओर चल दिए । पास हीं था । कभी कभी उधर से गुजरते समय हमें अपनी श्वांस रोकनी पड़ती थी । उस जगह कभी एक तालाब हुआ करता था , जिसमे मोहल्ले भर के लोग कचरा फेकते थे .....धीरे - धीरे वह भरता गया.... तालाब अब मैदान में तब्दील हो गया था......सुबह - शाम लोग दिशा - फरागत भी करने लगे थे । अब वह किसी कोण से तालाब नहीं रह गया था । इधर देश में चले स्वच्छता अभियान के कारण वहाँ दिशा - फरागत बंद हो गया था ।
जब हम वहाँ पहुँचे तो देखा कि आनन - फानन में बाँस की चँचरी और फूस की पलानी से एक झोपड़ीनुमा मंदिर बना दिया गया है , जिसके ऊपर भगवा झंडा लहरा रहा है । भीतर एक चबूतरे पर मत्स्य भगवान की एक बड़ी सी तस्वीर रखी है और पूजा - अर्चना हो रहा है । हम बाहर खड़े पांडे का इंतजार करने लगे । आरती के साथ हीं शंख - नाद हुआ और मत्स्य भगवान की जय ....हर हर महादेव के बाद जय श्री राम के गगनभेदी नारे के साथ पूजा - अर्चना संपन्न हो गया । इस बीच पता नहीं क्यों , मेरी कल्पना में वह पुराना तालाब , पानी से लबालब भरा हुआ , जिसमें रंग - बिरंगी छोटी - बड़ी मछलियाँ स्वच्छंद तैरती हुई होती थीं , उभर आया ...जीवित मछलियों के कब्र पर निर्जीव मत्स्य भगवान के मंदिर की स्थापना ! क्या अजीब विडंबना है !
तभी पांडे प्रसाद बाँटते हुए बाहर हम तक पहुँच गया और चौंकते हुए बोला -- " मनुआ ...तुम ! ...और सर जी आप ! ...अच्छा हुआ आप लोग आ गए ...इतनी जल्दबाजी में ई कुल हुआ कि हम उदघटनवा में आप लोगन को बुलाइए नहीं पाए । "
मनुआ फटी - फटी आँखों से कभी मंदिर और कभी पांडे की ओर देख रहा था । उसने लोगों के जाने का इंतजार किया । जब पांडे अकेले रह गया तो बोला -- " ई सब का है पांडे भइया ? हमरा त माथा चकरा रहा है ई कुल देखके । "
" तू नास्तिक है न , त तू धरम - करम को कइसे समझेगा आँय ....कभी मत्यस्य पुरान का नाम सुना है ? ...नहीं न , ...कबहूं टाइम दो त पूरी कथा सुना देंगे ....अब हीं एतने जान लो कि ई जे मत्स्य भगवान हैं न , ई भगवान बिषणु के औतार हैं ...। "
" जदि अइसा है त लोग एके मार के ...भून - भान के खाते काहे हैं ...खासकर ई अप्पन मिथिला और बंगाल में त ई रोजे के भोजन में शामिल है । "
" ईहे न हुआ है मनुआ ...हम अप्पन धरम और संसकीरति भूला दिए थे .. बाकि अब ई सब बर्दास्त से बाहर हो गया है ....सरकारो अब एकर खूबे खयाल रख रही है ...लौक न रहा है ...भर सावन भोला बाबा के रंग में संउसे देस रंगा जा रहा है ....चारो तरफ लाखों लोग कांवर कान्हा पर लेके....ढोल - मंजीरा , आउर उसको का कहते हैं ....हँ ..डीजे , बड़े - बड़े डीजे बजावइत ...बोल बम के धुन पर नाचइत - गावइत बाबा के दरबार में हाजिरी लगा रहीन है ....जल चढ़ा रहीन है ....। "
" ठीके कह रहे हो पांडे भइया ...बहुते नीक काम हो रहा है ....बोल बम के नारा और डीजे के धुन में एतना गुण त जरूरे है कि हम सब भुला जायें कि कल जे टमाटर ट्रक के ट्रक सड़क पर फेंका रहा था ...आज काहे सौ - सवा सौ किलो बिक रहा है ...कि हमरा बाल - बच्चा पढ़ियो - लिख के काहे एने - ओने डोलल चल रहा है ...कि ई का हुआ कि हमरा रिजरब बैंक नोटबंदिया में जमा होयल पइसा के गिनती करे में फेल हो रहा है ....कि नोटबंदिया के मारल लाखों लोग फिर से रोजी - रोजगार खातिर भटक रहे हैं ....और ओने मलिकार लोगन के हजारो करोड़ करजा माफ हो रहा है ....बाकि किसान का करजा माफ करे में सरकार का दिवाला पिटाने का खतरा हो जा रहा है ....। "
" दूर बुड़बक , तू त हरमेसा एके गीतिया गाते रहता है ....अरे ई कुल से भारी खतरा से देस परेसान है ...पढ़ल - लिखल , कौलेजिया लड़िकन सब के मन से देसभक्ति गायब है आउर ओने दूनों ओर से सीमा पर दुसमन दीठ गड़ाए हुए है ...अरे जब देस बचेगा त ई कुल घरेलू समस्या हम सब मिल बइठ के ठीक कर लेंगे ...। "
" अच्छा - अच्छा , ईहे ला कल एगो बिदवान पोरफेसर बोलिन है कि युनिभरसिटिया के गेटवा पर एक ठो टैंक लगवा देना चाहिए , ताकि छात्रों में देसभक्ति हिंलोड़ मारे लगे .....अतने न पांडे भइया , सुने हैं कि कउनो संस्था के परमुख कहीन है कि देस के सबलोगन को रोज नहा धो के पाँच ठो मंतर के जाप करे के चाहीं ...ऊसे दुश्मन खुद हीं डर जाएगा और सीमा से दूर भाग जाएगा .....। "
" बिलकुले सही सुने हो मनुआ , अपने धरम ग्रंथ में एक से एक अंतर - मंतर लिखल है ....मोहनी मंतर से लेके मारक मंतर तक ...सैंकड़ों हैं .....। "
" ए भइया , अब हम्मर मथवा फिर से चकराय लगा ...हम त आए थे ई देखने कि आप कहीं बिमार - उमार त नहीं हैं .....सो देख लिये । अब चलते हैं ....चलिये बाबूजी ...बाकि जाइत - जाइत एक ठो सलाह ....ईहे मंदिरवा के बगल में बराहो भगवान के मंदिर बनवा लीजिएगा । "
पांडे हँसते हुए - " अरे तू का सलाह देगा ...ई त पहिलहीं से हम्मर पिलान में है .....। "
" चलिए बाबूजी , अब पांडे भइया के ऐक्टरी - फैक्टरी के नोकरी से का मतलब .......। "
" अरे मनुआ , अइसन कुछ मत कर देना कि हम्मर नोकरिए चल जाये ....ई कुल त ऊपर - झापर है , असल कमाई त ऊहे है भाई .....। "
पांडे ने हँसते हुए कहा और मंदिर की ओर चल दिया ।
मार्क्सवादी राजनैतिक अर्थशास्त्र! सवाल ये उठता है कि मार्क्सवादी राजनैतिक अर्थशास्त्र ही क्यूँ? जवाब है कि मार्क्सवादी राजनैतिक अर्थशास्त्र हमें पूँजीवादी व्यवस्था का शोषण, विकास और उसके संकट को समझने में मदद करता है। यह समाज के आर्थिक आधार का अध्ययन करता है और इसीलिए उनके लिए ज़रूरी है जो सामाजिक बदलाव के लिए संघर्ष करते हैं। बुर्ज़ुआ अर्थशास्त्र, जो कि हमारे विश्वविद्यालयों में पढ़ाया जाता है, की तरह मार्क्सवादी अर्थशास्त्र ये दिखावा नहीं करता कि वह सभी सामाजिक व्यवस्थाओं की विश्वव्यापी आर्थिक नियमों की खोज करने की कोशिश करता है। मार्क्सवादी विश्लेषण के अनुसार हर उत्पादन के तरीक़े का अपना विशिष्ट नियम होता है। इसी कारण मार्क्सवादी विश्लेषण के इस विज्ञान को हम राजनैतिक अर्थशास्त्र कहते हैं। इस विषय पर मार्क्स से लेकर लेनिन ने बहुत कुछ लिखा है परंतु हम आसान तरीक़े से राजनैतिक अर्थशास्त्र के निम्नलिखित चार सवालों तक ही खुद को सीमित रखेंगे - 1. पूंजीवादी अर्थव्यव्स्था वह उत्पादन का तरीक़ा है जहां पूँजीपति वर्ग उत्पादन के साधनों के मालिक होते हैं वो उत्पादन के लिए म...
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