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मनुआ - 31

जब मैं मनुआ के घर पहुँचा तो वह पांडे से किसी घटना का जिक्र कर रहा था ।
" कल्हे की बात है भइया ! हमरे साहेब कहीन कि खादी भंडरवा तुम्हरे घर के तरफ है , सो उहाँ से एगो झंडा खरीद के लेते आना । उहे खातिर हम कल उहाँ पहुँचे ..तो देखे कि दू ठो आदमी झंडा खरीद रहा है ।एक आदमी खाकी वर्दी में था सो हमको लगा कि थाना का सिपाही है । जब बैजवा दिखाई पड़ा तो ऊ पर एस बी आई लिखल था ।ऊ लोग सिलिक का झंडा देख रहे थे । सेल्समैनवा अकेले था सो हम चुपचाप खड़े रहे । ऊ लोग पसंद कर लिये । ओकर दाम था - 1440 /- रू.। जब रशीदवा कटाने लगा त वर्दीधरिया धीरे से बोलिस कि रशीदवा 1600/- का काटो । हम त भकुआ के ओकर मुँह देखे लगे । सेल्समैनवा बोलिस कि ई नहीं हो सकता है सर और जदि हम सोलह सौ का रशीद काटेंगे तो हम उतना हीं पैसा लेंगे ...काहे कि ई सरकारी दूकान है ...रशीद वोला रकम हमको जमा करना पड़ेगा । जानते हो भइया ...ऊ दूनो बेशरम कहने लगे कि तो कच्चा रशीद दे दो ..आ नहीं तो कार्बन हटाके ऊपर नीचे रकम बदल दो । बाकि ऊ नहीं तइयार हुआ ...तो उदास होके ऊ लोग पूरा पइसा दीहीन । जब ऊ लोग चल गया त सेल्समैनवा हमसे बोलिस --" देखे न भइया ...ईहाँ राष्ट्रीय झंडा के खरीद - बिकरी में भी लोग दलाली खाते हैं ....ई देश के भगवाने मालिक हैं ....। " हमरा मुँह से बस अतने निकला भइया  कि जउन देस के संतरी से मंतरी तक लूटिए रहा है , ऊ कहियो बिकास ना करी । "
" निरास मत हो मनुआ ....अब अप्पन मोदी जी हैं ...कुछ दिन ठहर न , ई सबलोग जेहल जाएगा । "
मनुआ जोर से हँसा -- " का पांडे भइया , मजाक करेला हमहीं मिले थे का , अँय .....? "
पांडे समझ गया कि अब मनुआ सरकार  पर करारा प्रहार करेगा , सो चुपचाप उठकर चल दिया । मनुआ मेरी ओर देखकर मुस्कुरा दिया ।

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