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मनुआ - 32

मैं और मनुआ कुछ घरेलू बातों को शेयर कर रहे थे कि पांडे आता दिखा । नजदीक आने पर मनुआ ने पाँयलगी की और पूछा -- " कई दिनों तक दरशन नहीं दिये पांडे भइया ..सब खैरियत तो है । "
" अरे , खैरियत का खाक रहेगा ...एने अतना बारिस हुई कि हमरी गलिया में दू दिन पवनाला बहता रहा ...तू तो जनबे करता है ...पुरना बाँध तलबवा का निकास हमरी गलिये से होके है न ...। "
" लो भइया , रजवा को सोना के दुःख ...अब तो मेयर से लेके परधानमंत्री तक सभे तोरे आदमी है , फिर भी ...? "
" अरे है तो बनबे न करेगा ....मेयरवा आइस था ...सब देख - सुन के बोलिस कि एकरा खातिर मैप - तैप बन गया है ...बड़का पोरजेक्ट न है ....मोटा फंड चाहिए ....पास होते काम शुरु हो जाएगा । "
" आ ..ऊ का कहते हैं , समार्ट सिटिया का का हुआ भइया ? ..ऊ लिस्टवा में तो अप्पन शहर भी था न , ई बार साहबो चुप्पी साध लीहीन -- न समार्ट सिटी के बावत बोलिन और न बुलेट टरेनवा के बारे में कुछ कहीन ...पिछले साल स्टार्ट अप इंडिया पर खूबे जोर दीहीन थे ...अबकी ऊहो गायब ...। "
साहेब का नाम सुनते हीं पांडे जैसे उन्मादित हो जाता है । उसने सीना फुलाते हुए कहा -- " का मनुआ , लाल किला पर से साहेब जो भसनवा दीहीन थे , ऊ सुना कि नहीं ? ...कुछो कहो बाबू , गजबे का बकता हैं साहब ...तनिको लय नहीं टूटता है ...आतमबिश्वास से भरल भासन दीहीन थे...पैसा कौड़ी का हिसाब तो जइसे ठोरे पर था .... कतना काला धन पकड़ाया...कतने लोग कर चोरी कर रहीन थे....केतना फरजी कंपनिया पकड़ाई ....सब बोल दीहीन ....। "
" ई बात तो है भइया ...झूठ हो या साँच , बोले में इचको न हकलाते हैं साहेब .... टरेनिंग में कउनो कमी नहीं रहा है ...आखिर बरसों परचारक जो रहीन हैं ...आपे बताओ कि रिजरब बैंक कह रहीस है कि अभी नोटबंदिया में जमा नोटवा गिनयबे न किया है और साहेब बता रहीन है कि तीन लाख से जादे नोट , जे कि परचलन में न था , ऊ जमा हो गया...काला धन पकड़ा गया ...अरे भाई , ई जब पते न है कि केतना रुपया जमा हुआ तब ई सब डाटा साहेब के कौन पकड़ा दीहिस  ! "
" दुत् बुड़बक ! तू भी बात के बतंगड़ बनाते रहता है । अरे , ई कुल टौप सिकरेट रहता है । साहेब सरकार हैं तो सबके भले न मालूम हो , उनको तो सबकुछे मालूम है ...अब देखना ...ई जे टैक्स चोरवन है , उनको कइसे पेरते हैं ...। "
" ऊ तो हम देखबे करेंगे भइया..बाकि ई दूनों पड़ोसियन पर काहे चुप्पी साध लीहिन ? "
" दूर भकचोन्हर ! ...ईहे ला तू परेसान है । अरे , ई कुल कूटनीति न है ...वैसे भी अब पइसे जब पावर है , तो पहिले जरूरत है कि देस के खूब बिकास करल जाओ ...न सुना है -- कर लो दुनिया मुठ्ठी में । ईहे से साहेब अभी सड़क और रेल के जाल बिछाने में लगे हैं ...। "
" बिकसवा तो देखिए रहे हैं भइया ....कि हमनी सब के नौकरियो पर आफत है .....किसान सभे आत्महत्या कर रहीन है ...हस्पताल में ई हाल है कि दवा और औक्सीजन के कमी से कई दरजन बच्चा दम तोड़ दीहिन ...हँ उनका लोग का बिकास जरूरे हो रहा है...ऊ का नाम है -- अडानी और अंबानी जी के ...ई देशभगत काना बाबा भी एने खूबे जोर लगाइन है और सुनते हैं कि खूबे बटोर रहीन है ...। "
" का करोगे मनुआ ....अब किसी का तकदीर तो न न फोड़ लोगे ? ...ई कुल उनके मेहनत और भाग का फल है....। "
" हह..हा...हा .. मेहनत ! का भइया ...ई लोग मेहनत करते हैं और हमनी मजूर - किसान आलसी लोग हैं ...दिनभर टांग पसार के हरामखोरी करते हैं ....अच्छा मजाक है भइया ! " --- मनुआ ने हँसते हुए कहा । पांडे अब निकल लेने में भलाई समझा , सो बोलते हुए उठा  --" गीता में किशुन भगवान बोलिए दीहीन है -- करम करो और फल की चिंता मत करो ...समय पर तुम्हरे करम का फल जरूरे मिलेगा ....। " पांडे चला गया तो मनुआ मेरी ओर देखकर हँसा और बोला --" इनको समझाना और अंडमान पैदल जाना बरोबर है बाबूजी ....। "

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