माँ की पांती
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नन्हे बेटा कहाँ हो तुम
जल्दी से घर आओ तुम
अपना हाल सुनाऊँ क्या
वही दुखड़ा दुहराऊँ क्या
गठिया लेकर जान रहेगी
खाँसी मेरा प्राण हरेगी
मेरी तो है वही कहानी
छोड़ो ये सब बात पुरानी
अपना हाल सुनाओ तुम
टप्-टप्-टप् घर टपक रहा है
कहीं कहीं से दरक रहा है
नरिया-खपरा खरक रहा है
नून - चटहा एक खेत बचा है
आँख में सबकी खटक रहा है
न जाने कब वह भी जाये
आकर उसे बचा लो तुम
ठूँठा पीपल गिरा पड़ा है
बूढ़ा बरगद शांत खड़ा है
छोड़े साथ हैं चिरईं - चुरगुन
घर - आँगन वीरान पड़ा है
लिख रही हूँ जब मैं पांती
बुझा रही है दीया - बाती
आकर इसे जलाओ तुम
दीपन काका नहीं रहे अब
बुधिया काकी नहीं सही गम
पीछे-पीछे हो ली वह भी
आने को कह गई मुझे भी
प्राण है मेरा तुझमें अँटका
बदरी में पानी ज्यों लटका
आकर मुक्त कराओ तुम
नन्हे बेटा कहाँ हो तुम
जल्दी से घर आओ तुम ।
---- कुमार सत्येन्द्र
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