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मनुआ - 33

मैं जब मनुआ के घर पहुँचा तो घर के अंदर से काफी ऊँची आवाजें आ रही थीं , मानो कोहराम मचा था । मैं बाहर हीं ठिठक कर खड़ा हो गया ।
" कलमुहाँ , बंडा , निपूता ! मेहरारू के छोड़ के भागे वाला करमजरा ! ऊ का जाने कि घर - परिवार कैसे चलता है ...बतबनवा , लबरा ! ...का तो चाय बेंचता था ..गरीबी देखा है ...सब झूठ ..( रोने की आवाज ) .....। "
" अरे , चुप रहो न ...अब ई रोवे - गावे से कौनो फायदा है ...के कहे रहा कि पैसा एने - ओने छुपा के रखना ...अँय....आ  फिर रख के भूला जाना ...ओकरे दोस है ...आ तुम्हरा नहीं है ....हम पूछते रह गए कि अवरू कहीं नोटवा रखी है तो दे दो ...भँजा दें ...बाकि तुमको तो हमरो पर बिसवास नहीए न है ...अब भुगतो ....पँच - पँच सौ के दू नोट याने पूरा एक हजार ...बाप रे बाप ...एतना पइसा कागज बना के रख दीहीस ...।"
" हम रख दिये कि ऊ निपूता ...करेजखउका कर दीहीस ...ओह के पूछो न ...गरीब - गुरबा के लूट के केकर घर भर दीहीस ...हम्मर पसेना के कमाई माटी में मिला के ओकर करेजा ठंढा हो गया न ....। "
" अरे , ऊ तोरा तो का पूरा देशे के चौपट कर दीहीस है ...बाकि तुमसे हम पूछते रह गए कि कहीं चोरा - लुका के रखी है तो याद करो , अभी टैम है ...न बाद में कुछो न होगा ...लेकिन कैसा रंगा तेरा ...हमरा पर तो ....।"
" हँ..हँ..हँ ...तोरा पर न बिसवास रहा ...जब भी माय लुगा - फटा ला हमको पइसा देती थी ...तुम छीनिए लेते थे....ई बार हमने तुमसे छुपाके अइसा रख दिया कि ....हाय रे करम ! हमहूँ भुला गए .....। "
" एही सब बात हमरा ठीक न लगता है ...झूठ काहे बोलती हो ...हम कभी छीने हैं तुमसे पइसा - कौड़ी ...अँय ..कि तुम खुद ही देती रही हो ...। "
" तो का करती...तोहर कमाई में  तो सब दिन आगे लगल रहता है ...बाल - बच्चा के रकटा के मार देतीं तब न ...ई बार सोचे कि अब जमा करके अपना ला एक ठो बनारसी खरीदेंगे ...बाकि हाय रे करम ! अईसन कुजगहा रख दिये कि खुद हीं ....। हाय रे मुँहझौंसा ! तोर गद्दी में आग लग जाए ....। "
" अरे , चुप रहो न ...अब रोवे - गरियावे से का फायदा ...और तू तो बेकारे न ओके गरिया रही हो ...हमरे लाख मना करने पर भी कूद के ओके भोट दीहीस  थी ...कहती थी  सो अबहूँ हमको याद है ....न ..न ..हम तो कमले पर बटन दबायेंगे ...तोर टूटपूंजिया पार्टी के ई बार नहीं देंगे ..कबहूं नहीं जीतता है और भोटवो बरबाद होता है ..। "
" ईहे तो रोना है ...ई बाईसमौना , भोट लेके चोट कर दीहीस ...टीभिया पर बोलता था कि अमीरन के नीन न आएगी और गरीब चैन से सुतेंगे ...आ हो उल्टा रहा था ...गरीबे लोग भोर - भिनसर से पहर भर रात तक लैन में लगता था और अमीरे चकल्लस काटता था ....हमरा तो तभिए लगा था कि हो न हो ई में कुछ चाल है ई बंडलबजवा का ....।"
" अरे , तुम्हरा का गया है , जो एतना नाक बजा रही है ...ई नोटबंदिया तो केतने की नोकरी खा गया ...केतने का फैक्टरी बंद हो गया ...बेपार चौपट हो गया ...तू हजारे रुपिया में बाप - मइया कर रही है ...सुकर मनाओ कि हम्मर कंपनिया न बंद हुआ और न तो आज हम सब भी सड़के पर होते .....। "
भीतर से फिर रोने - सिसकने की आवाज आने लगी । एक - एक पाई जोड़कर रखने वाले के लिए एक हजार रुपया बहुत बड़ी रकम होती है । मैने सोचा कि इस परिस्थिति में मनुआ भी सामान्य नहीं हीं होगा । अतः मुझे वापस जाना चाहिए । मैं वगैर उससे मिले लौट आया ।

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