दूब
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वह जम गई थी
घर के आँगन में
चाहे - अनचाहे
वगैर निकोनी
वगैर खाद - पानी
कुचलाती रही
पाँव तले
पर
बाँधे रही माटी
आँगन की
कभी सूख जाती
कभी लहलहाती
नहीं की प्रयास कभी
लता की तरह बढ़कर
मापने की ऊँचाई
हवेली की
शायद इसीलिए
पाती रही जगह
पूजा की थाली में
लोग बेखबर थे
उसके वजूद से
जब बंटने लगा
घर-आंगन
वह लगी मांगने
अपना हिस्सा
बस यहीं से हुआ शुरू
जूल्म का किस्सा
वह मुलायम दूब
बन गई नागफनी
चुभने लगी
सबकी आँखों में ।
------ कुमार सत्येन्द्र
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