उम्र गुजरी आस में हो इक मकां,
पर जमीं को बेचकर हम सो गए I
थी ये हसरत घर कभी गुलजार हो,
स्वप्न आँखों में हमारे खो गए I
खून से पुरखों ने सींचा था चमन
हम विरासत में हैं कांटे बो गए I
वे भगाए थे फिरंगी को वतन से,
हमबिस्तर हम उन्ही के हो गए I
पीठ में भोंका, न खंजर याद है,
गेसुओं में हम उसकी खो गए I
---- कुमार सत्येन्द्र
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