हम तो गुजरा हुआ कल हैं
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उपेक्षा हीं अपेक्षित था
इसलिए
थोड़ा प्यार
और सम्मान पाकर ही
चहचहा उठते हैं हम
चिड़ियों की तरह ,
लहलहाने लगते हैं
हफ्तों बाद सिंचित
सूखते - पिअराते पौधों की तरह ।
सूचना मत देना
आने की
अचानक हीं
आ धमकना
अपने फुर्सत के क्षण में
कभी भी
किसी वक्त ।
इंतजार करना
असह्य होता है
आँखें पथरा जाती हैं
राह तकते - तकते ,
न आने पर
दिल बैठ जाता है
अनेक आशंकाएं भी
घेर लेती हैं
ठीक ही तो है ,
दूर रखना बच्चों को
हम भदेस , गँवार से
क्या सीख पायेंगे वो हमसे
हमारी अटपटी भाषा
हमारे गँवई विचार
हमारा हास्यास्पद व्यवहार
नहीं - नहीं ,
हमारे परिवेश से
दूर हीं रखना
उन्हें रहना है
इक्कीसवीं सदी में
जाना है बाईसवीं सदी में
सर्वथा नूतन संस्कार के साथ
जो परोसे जाते हैं
हर शाम
टी.वी. चैनलों पर,
हमें क्या
हम तो गुजरा हुआ कल हैं
बीता हुआ पल हैं ।
---- कुमार सत्येन्द्र
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