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पुस्तक समीक्षा

पुस्तक समीक्षा                   
                        हाशिए पर पड़े लोगों के दिल में सुलगती आग को रचनात्मक स्वर देती
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कहानियां
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हिंदी कथा साहित्य में कहानी संग्रह  “पुटुस के फूल “ से अपनी जोरदार उपस्थिति दर्ज कराने और “ पराये लोग “ से स्थापित होने वाले सशक्त कहानीकार श्री प्रहलाद चन्द्र दास का तीसरा कहानी संग्रह “ आग ही आग “ साहित्यिक हलके में आज चर्चा के केंद्र में है .
पुस्तक का नाम ही इस बात का द्योतक है कि इसमें संकलित कहानियों में आग अपने किसी न किसी रूप में मौजूद है . लेखक ने भी अपने निवेदन में आग के कई रूपों की चर्चा करते हुए लिखा है – “ एक सामाजिक प्राणी के रूप में लेखक भी इसके कई रूपों से रु– ब – रू हुआ , भूख और दुःख की आग , प्रतिरोध और प्रतिशोध की आग , अपमान और लांछन की आग , मन और तन की आग , धधकती हुई आग , सुलगती हुई आग और माचिस की छोटी सी तिल्ली में कैद चुपचाप पड़ी आग भी . “
शायद इसीलिए “ अग्नि शिखा “ इस संग्रह की प्रतिनिधि व पहली कहानी है . दलित , शोषित , वंचित शिखा का एक साजिश के तहत ऊँची जाति के कुछ लोगों द्वारा इस तरह शोषण होता है कि उसकी जिंदगी नरक सी हो जाती है . वह दिन व दिन उनके बंधन में जकड़ती चली जाती है . वह मुक्ति के लिए छटपटाती है , किन्तु उनके मजबूत बंधन को तोड़ नहीं पाती . वह प्रतिशोध की आग में जलने लगती है और अंततः उन दुराचारियों से बदला लेकर फरार हो जाती है . बचपन में धर्म और अध्यात्म में रुचि रखने वाली शिखा परिस्थितिवश एक धार्मिक गुरु की शिष्या बन जाती है और अपना सर्वस्व उनके चरणों में रखकर पूर्ण समर्पण कर देती है और इस तरह उनकी मृत्यु के पश्चात उनकी उत्तराधिकारिणी भी बन जाती है .जीवन भर उपेक्षा और शोषण का दंश झेलती रही शिखा परम आदरणीया साध्वी, अग्निशिखा बन कर धन-दौलत और मान–सम्मान सब कुछ प्राप्त कर लेती  है .
कहानी के इस अंत पर एक प्रश्न अवश्य खड़ा होता है कि  जीवन भर जिन बुराईयों और शोषण का शिकार वह होती रही , उनके खिलाफ लड़ने की बजाए वह पलायन क्यों कर जाती है ? जवाब पाठक को  ढूँढना है .
महान रुसी कथाकार अन्तानेव चेखव ने अपने एक साक्षात्कार में कहानी लेखन के सम्बन्ध में कहा था कि कोई भी कहानी किसी घटना के किसी खास बिंदु का विस्तार होती है . प्रह्लाद जी की कहानियां इस कथन की पुष्टि करती नजर आती हैं .उनकी यह खासियत है कि वे छोटी सी छोटी घटना को भी एक रोचक और अर्थपूर्ण कहानी में परिणत करने की सामर्थ्य रखते हैं . जैसे “ मन का चोर “ . यह कहानी मनोविज्ञान की भाव – भूमि पर गढ़ी हुई प्रतीत होती है . किन्तु इसके कई पाठ हो सकते हैं . मध्यवर्गीय समाज में धन और प्रतिष्ठा के लिए जो आपाधापी मची है , भागम भाग हो रहा है , उसने  व्यक्ति और परिवार , यहाँ तक कि पति एवं पत्नी के बीच भी एक रिक्तता पैदा कर दिया है .मन की ख्वाहिशें पूरा करने के चक्कर में तन की ख्वाहिशें भी अधूरी रह जा रही हैं .कहानी में घटनाक्रम बड़े ही स्वाभाविक ढंग बदलते हैं . कहीं कोई बनावटीपन नहीं दिखता . घर के अन्दर का एकांत और बाहर का खुशनुमा मौसम कुछ ऐसे हालात पैदा करते हैं कि दो युवा मन सारे बन्धनों को तोड़ कर सारी हदें पार करने की स्थिति में पहुँच जाते हैं .दुर्घटना (?) होते – होते रह जाती  है और दोनों की  शुचिता पर भी कोई आंच नहीं आती .दोनों का दिल आत्मग्लानि से भर जाता है . कौन कितना गलत या सही था , यह प्रश्न भी लेखक पाठक के लिए छोड़ देता है ,
संग्रह की सारी कहानियाँ बहुत ही साधारण ढंग से शुरु होती हैं , किन्तु परत दर परत खुलती जाती हैं . भाषा और शैली बड़ी ही सरल और सहज हैं . कथ्य और वर्णन की सहजता कहानियों में रोचकता और जिज्ञासा पैदा करती हैं और पाठक अनायास ही उनके प्रवाह में बह जाता है . चरित्रों के निर्माण में भी लेखक काफी सजग दिखता है . लेखनी इतनी सधी हुई कि हम इन चरित्रों को कभी विस्मृत कर ही नहीं सकते . “ अग्निशिखा “ की शिखा हो या जगत सिंह , “ मोहरे “ का दलित मास्टर शिवचरण हो या घनु बाबू , “ सांघा “ का किसना हो या “ धंसान “ का परमा या “ अगिन जरे के काठ “ का सोमरा . चूंकि इनके पात्र हमारे बीच से लिए गए होते हैं , आये दिन हमारी भेंट इनसे होती रहती है .इन कहानियों की एक और विशेषता यह है कि लेखक इनमे अनावश्यक पात्र की रचना नहीं करता है और अगर किसी पात्र की छोटी सी भूमिका हो भी तो उसे संज्ञा के बजाये सर्वनाम के रूप में ही प्रयोग करता है . कहानियों में पात्रो की संख्या तो सीमित है ही , भाषा में भी काफी चुस्ती है . संवाद छोटे छोटे और सारगर्भित हैं . अनावश्यक विस्तार से बचा गया है . इसीलिए कहानियाँ बोझिल नहीं हुई हैं .
ग्रामीण पृष्ठभूमि से उठाई गई ये कहानियां दलितों ,आदिवासियों , स्त्रियों  और समाज में हाशिए पर पड़े सर्वथा वंचितों द्वारा मुक्ति के लिए चल रहे साहसिक संघर्ष का यथार्थपूर्ण ढंग से चित्रण करती हैं .समाज में व्याप्त आर्थिक व सामाजिक विषमताओं,विसंगतियों और विरोधाभासों को लेखक की पैनी निगाह ढूंढ निकालती है और उन्हें कहानी के ताने बाने में पिरोकर  परत दर परत खोला जाता है . इन कहानियों की शिल्प की एक विशेषता यह है कि बड़े ही नपे –तुले शब्दों में , महज एक ही पंक्ति में बड़ी सी बड़ी बात कह दी गई है . गंवई मुहावरों  और लोकोक्तियों का प्रयोग लेखक का अपनी माटी से लगाव-जुड़ाव को प्रतिविम्बित करता है .
                       संग्रह की सभी कहानियों की न सिर्फ भाव-भूमि अलग-अलग है. बल्कि हर एक में अलग-अलग मुद्दे को भी उठाया गया है . जहां “ झापांग “ और “ योगी बाबा का आश्रम “ धार्मिक अंधविश्वास एवं पाखण्ड पर चोट करते हैं  वहीँ “ धंसान “ कहानी कोयला खदानों में व्याप्त लूट,श्रमिकों का शोषण तथा उस लूट एवं शोषण को अंजाम देने के लिए बने  नेताओं,नौकरशाहों और व्यवसायियों के  गठजोड़ का पर्दाफाश करती है. “ मोहरे “ में सवर्णों द्वारा दलितों को राजनीतिक मोहरा बनाने के खेल को उजागर किया गया है. अपने गाँव और समाज की तरक्की के सपने पाले हुए मास्टर शिवचरण राजनीति में प्रवेश करता है . विधायक और मंत्री भी बन जाता है , किन्तु घनु बाबू द्वारा विछाये जाल में उलझकर रह जाता है. जब उसकी आँखें खुलती हैं ,वह उनसे मुक्त होने का संकल्प करता है.
“ स्मृति-शेष “ उजड़ते हुए खेत-खलिहान और वीरान होते गाँव की कहानी है.औद्योगिकीकरण और शहरीकरण ने न केवल गांवों की शक्ल , बल्कि  सोच भी बदल दी  है. दिन व दिन अलाभकारी होती जा रही खेती से अब कोई किसान नहीं जुड़ा  रहना चाहता है . माटी को माँ की तरह पूजने वाले  किसान चिमनी-भट्ठा वालों को अब माटी बेंच रहे हैं.चिमनियों से निकलते धुएं ने धरती की कोख को बंजर कर दिया है. अब किसान शहरीकरण के लिए छीनी जा रही जमीन को बचाने की जगह अधिक से अधिक मुआवजे की लड़ाई लड़ना चाहता है.नवउदारवादी नीतियों का प्रभाव इस कहानी में बहुत ही स्पष्ट तरीके से सामने आता है.
                   “ सांघा “ कहानी उस क्षेत्र में सदियों से चली आ रही एक सामाजिक प्रथा  को केंद्र में रखकर लिखी गई है. इस प्रथा को सवर्ण समाज द्वारा हेय दृष्टि से देखा जाता है , जबकि इसमें नारी-मुक्ति और नारी-सशक्तिकरण के तत्व दिखाई पड़ते हैं.सवर्णों द्वारा इसे पिछड़ी मानसिकता से जोड़ कर देखा जाता है. किन्तु , जब गाँव के बाबू साहब की शिक्षित और दिल्ली में नौकरीपेशा से जुडी पोती अपने जीवन साथी को किन्ही कारणवश तलाक देकर दूसरी शादी करती है तो,सभी हतप्रभ रह जाते हैं.यद्यपि ऐसी ही शादियाँ सांघा के नाम से संज्ञायित होती हैं  , बाबू साहब उसे सांघा मानने से इनकार करते हैं और ऐसा बोलने पर किसना को डपटकर चुप करा देते हैं.
संग्रह की आखिरी कहानी “ अगिन जरे के काठ “ सशत्र राजनीतिक आन्दोलन के सन्दर्भ में कई प्रश्न खड़ी करती है. लगातार गुटों में विभाजित होता यह आन्दोलन मानो  अपना लक्ष्य और दिशा दोनों ही खो दिया है. लेखक कोई स्थापना नहीं देता , किन्तु उसकी सफलता पर संदेह अवश्य व्यक्त करता है.
इस तरह देखें तो,संग्रह की सारी कहानियाँ अपने आप में विशिष्ट हैं.भाव,भाषा,विचार और शिल्प के स्तर पर स्थानीयता की पुट ने इन्हें असाधारण विशिष्टता प्रदान की है और लेखक यथार्थ बोध कराने में सफल हुआ है .सामाजिक सरोकारों से जुडी होने के कारण ये कहानियाँ हमारे अन्तः को स्पर्श करती है और सोचने-विचारने को बाध्य करती हैं.
स्थानीय भाषा के शब्दों के समावेश के बावजूद ये कहानियाँ स्थानीयता व आंचलिकता को लांघती हैं , क्योंकि उनके भाव , विचार और मुद्दे सार्वभौमिक हैं. क्षेत्र और पात्र के नाम,रीति-रिवाज,गीत-संगीत,भाषा-बोली आंचलिक होने से ये कहानियाँ और भी विश्वसनीय तथा सम्प्रेषणीय बन पड़ी हैं.
अपनी माटी और अपने लोगों के प्रति असीम स्नेह एवं उनके साथ जीवंत संपर्क लेखक की लेखनी को अतिरिक्त ऊर्जा प्रदान करते हैं और एक नईं पहचान के साथ वह पाठक के बीच अपनी जगह बनाता है. हाशिए पर पड़े लोगों के जीवन में गहरी पैठ किये वगैर ऐसी कहानियों की रचना असंभव है और यही कहानीकार और उसकी कहानी को विशिष्टता प्रदान करता है. इस तरह हम कह सकते हैं कि इन कहानियों के रचनाकार ने हिंदी कथा साहित्य में बहुत ही सार्थक हस्तक्षेप किया है और अपनी एक अलग पहचान कायम की है.

-------- कुमार सत्येन्द्र, चास, बोकारो

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