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शांता बाई

शांता ताई
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तुम लौट गई
शांता ताई !
आश्वासन के एक और पुलिंदे के साथ
लिखित वादे का दस्तावेज
अपनी मुठ्ठी में दबाए
अपने पैरों के छालों को
सहलाते हुए
जीत की चमक
आँखों में संजोए हुए
और
वादाखिलाफी होने पर
पुनः आ धमकने की चेतावनी देकर

तुम लौट गई
शांता ताई !
मुंबई को हीं नहीं
संपूर्ण देश को
विरोध का ककहरा सिखाकर
दुर्दिनों में भी
अपने हक के लिए
लड़ने का जज्बा दिखाकर
लुटेरों के मुँह पर
तमाचा जड़कर

तुम लौट गई
शांता ताई !
शहरी शुतुरमुर्गों के सामने
पेशकर
अनुशासन का अद्भुत जलवा
जलती अंतड़ियों से फूटती
संगीत की स्वरलहरी
जन - युद्ध के गीत
थके पाँव की थिरकन के साथ
पपड़िआए होठों पर
खिली नैसर्गिक मुस्कान
भाईचारे का बेमिसाल उद्धरण
जिम्मेदारी का पूरा अहसास
और अशेष जिजीविषा

तुम लौट गई
शांता ताई !
इधर कई सवाल
हवा में लगे तैरने
कौन था तेरा रहनुमा
किसके विरासत ढो रहे हो तुम
गाँधी की टोपी
किंतु लाल रंग
लाल परचम
आंबेडकर के फोटो के संग ,
लगाए जाने लगे
हजारों टोपियों - परचमों
बैनरों के दाम
कई देशों के
उछलने लगे नाम
विदेशी पोशाक वाले
विदेशी चंदे पर पलने वाले
इतने बदहवास हुए
कि नहीं दिखा उन्हें
मुंबई के वो लाखों हाथ
जो बांट रहे थे
रोटी - पानी और दवाइयाँ
सहला रहे थे
अपने अन्नदाता की बिवाइयां

तुम लौट गई
शांता ताई !
अपने गाँव
जंगलों - पहाड़ों के बीच
उगाने नई फसलें
संजोने नए हौसले
करने साकार
वर्षों पहले
बुने गए
गोदावरी पारुलेकर के सुनहरे सपने

शांता ताई !
मैने नहीं देखा उन्हें
पर ,
तुम्हें देखकर लगता है
तुम सा हीं होगी
" जब इंसान जाग उठा " की रचयिता
गोदावरी पारुलेकर
तुमसे मिलकर लगता है
वह पुनर्जीवित हो गई
वही जज्बा
वही तेवर
वही आन - बान और शान
टुकड़खोर ट्रोल ,
क्या जाने किसे कहते हैं स्वाभिमान !

शांता ताई !
तुम्हें लाखों सलाम ! लाखों सलाम !

---- कुमार सत्येन्द्र

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