Skip to main content

शांता बाई

शांता ताई
********

तुम लौट गई
शांता ताई !
आश्वासन के एक और पुलिंदे के साथ
लिखित वादे का दस्तावेज
अपनी मुठ्ठी में दबाए
अपने पैरों के छालों को
सहलाते हुए
जीत की चमक
आँखों में संजोए हुए
और
वादाखिलाफी होने पर
पुनः आ धमकने की चेतावनी देकर

तुम लौट गई
शांता ताई !
मुंबई को हीं नहीं
संपूर्ण देश को
विरोध का ककहरा सिखाकर
दुर्दिनों में भी
अपने हक के लिए
लड़ने का जज्बा दिखाकर
लुटेरों के मुँह पर
तमाचा जड़कर

तुम लौट गई
शांता ताई !
शहरी शुतुरमुर्गों के सामने
पेशकर
अनुशासन का अद्भुत जलवा
जलती अंतड़ियों से फूटती
संगीत की स्वरलहरी
जन - युद्ध के गीत
थके पाँव की थिरकन के साथ
पपड़िआए होठों पर
खिली नैसर्गिक मुस्कान
भाईचारे का बेमिसाल उद्धरण
जिम्मेदारी का पूरा अहसास
और अशेष जिजीविषा

तुम लौट गई
शांता ताई !
इधर कई सवाल
हवा में लगे तैरने
कौन था तेरा रहनुमा
किसके विरासत ढो रहे हो तुम
गाँधी की टोपी
किंतु लाल रंग
लाल परचम
आंबेडकर के फोटो के संग ,
लगाए जाने लगे
हजारों टोपियों - परचमों
बैनरों के दाम
कई देशों के
उछलने लगे नाम
विदेशी पोशाक वाले
विदेशी चंदे पर पलने वाले
इतने बदहवास हुए
कि नहीं दिखा उन्हें
मुंबई के वो लाखों हाथ
जो बांट रहे थे
रोटी - पानी और दवाइयाँ
सहला रहे थे
अपने अन्नदाता की बिवाइयां

तुम लौट गई
शांता ताई !
अपने गाँव
जंगलों - पहाड़ों के बीच
उगाने नई फसलें
संजोने नए हौसले
करने साकार
वर्षों पहले
बुने गए
गोदावरी पारुलेकर के सुनहरे सपने

शांता ताई !
मैने नहीं देखा उन्हें
पर ,
तुम्हें देखकर लगता है
तुम सा हीं होगी
" जब इंसान जाग उठा " की रचयिता
गोदावरी पारुलेकर
तुमसे मिलकर लगता है
वह पुनर्जीवित हो गई
वही जज्बा
वही तेवर
वही आन - बान और शान
टुकड़खोर ट्रोल ,
क्या जाने किसे कहते हैं स्वाभिमान !

शांता ताई !
तुम्हें लाखों सलाम ! लाखों सलाम !

---- कुमार सत्येन्द्र

Comments

Popular posts from this blog

हो वर्ष नव

हो वर्ष नव हो हर्ष नव हो ‌‌सृजन नवल हो गीत नया  नव ताल - सुर संगीत नया  नूतन जीवन  हो रंग नया  नव नव विहंग नव नव कलरव नव पुष्प खिलें नव नव पल्लव  हो वर्ष नव हो हर्ष नव हालात नए ललकार नई कर ले स्वीकार  मत मान हार  उम्मीद नई  संकल्प नया  प्रज्ज्वलित कर एक दीप नया  हो तम  विनाश हो तम विनाश हो वर्ष नव हो हर्ष नव --- कुमार सत्येन्द्र

मार्क्सवादी राजनीतिक अर्थशास्त्र

मार्क्सवादी राजनैतिक अर्थशास्त्र!  सवाल ये उठता है कि मार्क्सवादी राजनैतिक अर्थशास्त्र ही क्यूँ? जवाब है कि मार्क्सवादी राजनैतिक अर्थशास्त्र हमें पूँजीवादी व्यवस्था का शोषण, विकास और उसके संकट को समझने में मदद करता है। यह समाज के आर्थिक आधार का अध्ययन करता है और इसीलिए उनके लिए ज़रूरी है जो सामाजिक बदलाव के लिए संघर्ष करते हैं। बुर्ज़ुआ अर्थशास्त्र, जो कि हमारे विश्वविद्यालयों में पढ़ाया जाता है, की तरह मार्क्सवादी अर्थशास्त्र ये दिखावा नहीं करता कि वह सभी सामाजिक व्यवस्थाओं की विश्वव्यापी आर्थिक नियमों   की खोज करने की कोशिश करता है। मार्क्सवादी विश्लेषण के अनुसार हर उत्पादन के तरीक़े का अपना विशिष्ट नियम होता है। इसी कारण मार्क्सवादी विश्लेषण के इस विज्ञान को हम राजनैतिक अर्थशास्त्र कहते हैं।  इस विषय पर मार्क्स से लेकर लेनिन ने बहुत कुछ लिखा है परंतु हम आसान तरीक़े से राजनैतिक अर्थशास्त्र के निम्नलिखित चार सवालों तक ही खुद को सीमित रखेंगे - 1. पूंजीवादी अर्थव्यव्स्था वह उत्पादन का तरीक़ा है जहां पूँजीपति वर्ग उत्पादन के साधनों के मालिक होते हैं वो उत्पादन के लिए म...

पहचान की राजनीति

## पहचान की राजनीति बनाम वर्गाधारित राजनीति। ## पहचान की राजनीति का मतलब क्या है ? उत्तर आधुनिकता की ही तरह पूंजीवादी सिद्धांतों से निकली पहचान की राजनीति मार्क्सवाद का विकल्प होने का दावा करती है। यह मानती है कि राजनीति और भौतिक परिस्थितियों के बीच कोई रिश्ता नहीं होता। यह एक ऐसे समाज की परिकल्पना करती है जो तमाम तरह के शोषण और आपसी शत्रुता पर टिका है। इसमें यह सोच निहित है कि जातीयता, धर्म, नस्ल या लैंगिकता आदि से जुड़े शोषण व आपसी शत्रुता का भौतिक परिस्थितियों से कोई रिश्ता नहीं होता। यह पूरी तरह से व्यक्तिगत तौर पर महसूस किया जाता है। पहचान एक व्यक्ति द्वारा उसके उत्पीड़न के अनुभव के आधार पर बनती है और पूरी तरह से आत्मपरक और स्वायत्त होती है।  यह किसी भी समाज के वर्ग विभाजन पर आधारित विश्लेषण को अस्वीकार करता है। पहचान की राजनीति के अनुसार समाज में मुख्य विभाजन है -- व्यक्तिगत रूप से उत्पीड़न सहन करने वालों और बाकि सभी उनलोगों के बीच जिन्होंने उत्पीड़न का अनुभव नहीं किया है। उदाहरण के लिए पहचान की राजनीति के सिद्धांतों के अनुसार जातिगत उत्पीड़न का अनुभव करने वाला एक दलित मजदूर...