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कैसे कह दूँ

कैसे कह दूँ.......

देखा कल
तुम्हारी तस्वीर
पल भर भी
नहीं टिकी रह सकी
मेरी नजर
झुक गई लाज से

उफ्फ .......    !
कितना मासूम !
कितना निष्कलुष !

जैसे हवा में उड़ती
सेमल की रूई
जैसे पंखुड़ियां खोलती
कोई अधखिली कली
जैसे अंखुआए दाने से निकली
दुनिया को निहारती
दो पीली - हरी पत्तियाँ
जैसे सावन की शोख - चंचल बदली

बड़ी - बड़ी आँखें
विहँसती - खिलखिलाती
कुछ कहने को बेताब
कितनी थी चमक
कितनी चपलता
कितने अरमान
कितने सपने
न जाने कितने रंग

तभी कहीं से
उछलता आया एक प्रश्न
क्या नहीं हूँ मैं आपकी हीं बिटिया ....?

बिंध गया मैं
हो गया लहूलुहान
भागा बदहवास
प्रश्न मेरे पीछे - पीछे
फिर बढ़ने लगी
उनकी तादाद
कुछ सासाराम से आए
कुछ कठुआ से
कुछ भागलपुर - उन्नाव से
मैंने चाही मूंदनी
अपनी आँखें
घुस गए वे
मेरी पलकों में
समा गए मेरे
रोम - रोम में

मेरे होठ फड़फड़ाए
अस्फुट स्वर में
निकले कुछ शब्द

कह दूँ......!
कैसे कह दूँ...!
तुम मेरी बेटी नहीं
कि तुम हिंदू
मैं मुसलमान
कि तुम मुसलमान
मैं हिंदू
कि तुम दलित
मैं बाम्हण
कि तुम बाम्हण
मैं दलित ,

नहीं - नहीं
अभी खूंटी पर
नहीं टाँगी है मैंने
अपनी आत्मा
अभी जिंदा है
मेरे भीतर का मनुष्य
नहीं बना हूँ अबतक
किसी भीड़ का हिस्सा

फिर कैसे कह दूँ
तुम मेरी बिटिया नहीं....!
कैसे कह दूँ ......!
कै...से....क...ह.....दूँ.........!

----कुमार सत्येन्द्र

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