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मनुआ - 37

मैं जब मनुआ के घर पहुंचा तो वह बहुत खुश नजर आया । पूछा तो कहने लगा - " बाबूजी ! कल मार्कस बाबा के बारे में जो सुना , वो अभी भी कनवा में गूंज रहा है । गजबे पढ़ाकू थे ....ऊ का कहते हैं ....दरशन शास्तर से लेके अरथशास्तर तक सभे का विदवान ...और सबसे बड़की बात तो ई कि दुनिया के बदले की छटपटाहट ! ...बाबूजी ! हमरा लेखे तो दुनिया में अबतक कोई ऐसा इंसान हुआ हीं नहीं , जो सौ - डेढ़ सौ साल पहिले हीं लिख दिया कि आगे ऐसा ऐसा होगा ! "
" का कहा ....नहीं हुआ है ....! अरे ,  हुआ है । हमरे हियाँ तो ऐसे ऐसे रीसी - मुनि हुए हैं , जो भूत - भविष - बर्तमान तीनों बता देते थे ..।" -- पांडे ने तड़ से हस्तक्षेप किया , जिसने अभी आते - आते मनुआ की आखिरी बात सुन ली थी ।
" ईहो आप ठीके बोले पांडे भइया ! ...अपने धरम गरंथ तो ई सब से अंटा पड़ा है ...अभी कले न हमरे त्रिपुरा के मुख्यमंत्री बोलिन है कि हमरे हियाँ महाभारते काल में ....ऊ का कहते हैं ....हँ , इंटरनेट और सेटेलाइट - फेटेलाइट सभे था ....! "
" कउनो गलत कहिन है का ....नहीं था तो महल में बैठल - बैठल लड़ाई के आँखों देखा हाल धृतराष्ट्र को कैसे बताया जा रहा था ? "
" ऊहे तो हम भी कह रहे हैं भइया , कुले चीज रहते हमलोग ओके बिकसित न कर पाये ....ऊ कुल ग्रंथवे में पड़ल रह गया .....। "
" दूर बुड़बक , ऊ ग्रंथवा रहा कहाँ .....ऊ तो कुल मलेच्छवन सब आक्रमण करके , लूट - पाट के ले भागा । वोही ग्रंथवा के मथ - मथ के ऊ सब हमलोग से आगे निकल गया । "
" ई बात ! ...आँय भइया , एक ठो बात बताइए कि ऊ सब गर्ंथवा में ज्ञान - बिज्ञान सभे था हीं , तो हमलोग ऐसा हरवा - हथियार काहे न बना लिये थे कि ऊ सब को मारके खदेड़ देते ? "
" अब एकरो कौनो कारण तो होयबे करेगा .....हम उतना न जानते हैं .....बाकी बिद्वान लोगन से पूछोगे तो ऊ बताइए देंगे ....का सर जी , आप ही कुछ बताइए न । "

पांडे ने पासा मेरी ओर फेंक दिया । मैंने मुस्कुराकर उसकी बात को टाल दिया -- " इस बारे में मैं बिलकुल अज्ञानी हूँ भाई । "
पांडे ने मुझ पर कटाक्ष करते हुए कहा  - " हँ तो आपलोगन को मार्कस - लेलिन के पढ़े से फुरसत मिले तब न , अप्पन देश के गरंथ पढ़िएगा ! "
" कोई बात नहीं भइया , ई सरकार तो खांटी देसी है ....ईहे बचल गरंथवा के मथवा के कुल ज्ञान - बिज्ञान निकलवायेगा । ..... बाकी ई बात पल्ले नहीं पड़ता भइया कि अप्पन देश में हरवा - हथियार , तोप - जहाज बनावे के बजाय ईहो सरकार बिदेशी समान खरीदे में लगी है ...ई काहे ? "
" अरे भकचोन्हर , ईहो नहीं बुझा रहा है ....सैंकड़ों बरस से हमरे देश को गुलाम बना के ई मलेच्छवन सब हमलोगों के दिमाग को भोथरा दिया ....बाद में सत्तर साल  ई नेहरू - गंधिया के परिवार लूटता रहा ....अब तू चारे साल में का चाहता है कि एके ब एक हम सिरमौर बन जाएं ? .... बाकी चिंता मत कर ई सरकार और दस - पंद्रह साल रह गई तो देश विश्वगुरु बन के रहेगा । "
" हँ ....ई आप ठीक बोले पांडे भइया ....ऊ तो अभिये से दिखाई दे रहा है ....ऊ एक ठो कहाउत है न ....कि पूत के पांव पलनवे में दिख जाता है .....। ई सरकार ने चार साल में ऐसा तरक्की किया है कि पूछो मत ....पूरी दुनिया में तेल के भाव गिर रहा है , तो हमरे हियाँ ऊपरे चढ़ रहा है ....गैस के वोही हाल है ....बैंकवा सब में कैश गायब है ...अनपढ़ के का कहें , पढ़ल - लिखल करोड़ों के तदाद में सड़क पर मारल - फिरत हैं .......। "
" ऐ मनुआ , अब चुपकर .... रजनीति मत बतियाव , समझा .....का चाहते हो कि सत्तर साल का धूर - गनउरा चारे साल में सफा हो जाए ..... तू लोग बिरोध में अन्हरा गया है ..... इनका लोग के बिकासे न दिखाई दे रहा है ....बाकी लोग बेवकूफ है ....जो हर चुनाव में ईहे पार्टी को जिता रहा है .......। " --- कहते हुए पांडे जी चलते बने । मनुआ मेरी ओर देखकर मुस्कुरा दिया ।

हम फिर 8मई को पेट्रोल - डीजल के मूल्य में हुई वृद्धि के खिलाफ होने वाले धरना - प्रदर्शन की चर्चा करने लगे ।

--- कुमार सत्येंद्र

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